‘मार्गदर्शक मंडल’ वालों से अनुरोध
तुम हुये पचहत्तर पार मगर
अब भी मरने से डरते हो
सब ठकुर सुहाती कहते हो
और हाँ जू हाँ जू करते हो
जो उम्र मिली वह इतनी है
कोई हमजोली बचा नहीं
घोषित है अब तो ‘मृत्युदण्ड’
इसके ऊपर तो सजा नहीं
अब क्या कोई बिगाड़ लेगा
क्यों सच कहने से बचते हो?
जो मिला हुआ है जीवन में
क्या उससे ज्यादा पाना है
ये उम्र छोड़ देने की है
क्या अब दामन फैलाना है
लम्बा जीने के लालच में
क्यों रोज रोज ही मरते हो
जो यश मिलना था पूर्ण हुआ
जो बचा हुआ मिल जायेगा
क्या अब इससे भी और अधिक
तू झूठ बोल कर पायेगा
इन जग वालों की नजरों में
किस कारण नीचे गिरते हो
तुम हुये पचहत्तर पार मगर
अब भी मरने से डरते हो
– वीरेन्द्र जैन







