अंशुमान खरे
घरवाली के बोल से अगर आपके बोल नहीं मिलते हैं, तो समझिये घर में आफत के बादल जल्द फटने वाले हैं। आपका घर निकाला भी हो सकता है। मैने श्रीमती जी से बह इतना कह दिया कि शांति के साथ रहने दो…बस उनका गुस्सा फूट पड़ा -‘ ये मुई है कौन शांति जो हमारे घर को तोड़ना चाहती है। ‘
लाख समझाकर हार गया पर शांति के नाम ने जो अशांति फैलाई उसका खामियाजा हाथ पांव तुड़वाकर अस्पताल की सेवा ले रहा हूं। अस्पताल में भी शांति नहीं, कौन सी नर्स सेवा में है, उसका इतिहास भूगोल पता किया जा रहा है। कहीं टूटे फूटे पति की सेवा करने के नाम पर डोरे न डालने लगे। शक का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं है। हम तो मारे डर के नर्स की तरफ देखते भी नहीं हैं। कहीं श्रीमती क सीसीटीवी कैमरे में कुछ ऐसा वैसा न दिख जाए। हंसकर बोलने और हंसने पर शत प्रतिशत पाबंदी… खुदा खैर करे। शांति की खोज में श्रीमती जी ने अपने सारे शागिर्द लगा दिए…नैन मटक्का शांति को ढूढ़ो चाहे जहां से । श्रीमती जी का सारा मायका हमें घेरकर हर समय बैठा रहता है।
आटे, दाल, चावल के कनस्तर बजने लगे पर श्रीमती जी ने ठान ली कि शांति का पतालगाकर ही दम लेंगी।पूरा मायका हर समय हर समय बुरा भला कहने से चूकता नहीं था। हर एक की नजर में मैं एक बिगड़ा हुआ आदमी हूं, जो आखों-आखों बिस्तर पर पड़े पड़े शिकार करता रहता है। श्रीमती जी हर आनेजाने वाले पर अपनी नजर गड़ा कर रखती थीं। उनका मानना था कि गाहे बगाहे शांति मुझसे मिलने जरूर आएगी। भाभियों पर खास नजर रखती थी। जरा सी हंसी सुनी चौकन्नी हो गई-‘देखिए बहन जी, अभी डाक्टर ने बोलने से मना किया है… बाद में मिल लीजिएगा… तबीयत नासाज है…. ज्यादा बोलने से तबीयत बिगड़ने का खतरा है।
दोस्तों को मौका मिल गया-‘अरे भाभीजी इनकी आखों का इलाज कराइए…. जिस किसी को थोड़ा ठीक ठाक समझते हैं, वहीं अटक जाते हैं…. हम लोग कई बार इन्हें मुसीबतों से बचा चुके हैं… पर भैय्या हैं कि गाड़ी चलाते चलाते नयनाफाइटिंग करने लगते हैं….और हां सभी से बगैर सोचे समझे दोस्ती का हाथ बढ़ा दैते हैं। संभलकर रहिएगा भाभीजी… इनकु आदतों से हम सब परेशान हैं।’
बिस्तर पर पड़ा था नहीं तो सक्सेना के बच्चे को वहीं पटककर मारता। खुद की आदतें खराब.. पट्ठा तोहमत मेरे पर मढ़ गया। पड़ोस में रहनेवाले भौकाली मिश्रा जी भौकाल पेल गए-‘महिलाओं के बारे में इनका तरीका नापसंद है… जहां पाते हैं वहीं लस लेते हैं… कई बार हम लोगों ने इन्हें पिटने से बचाया है… पुलिस वाले तो इनपल खास नजर रखते हैं। जब भी कोई महिला गायब होती है… नाम भैय्या का ही सुनने में आता है। पुलिस सबसे पहले आफिस आ धमकती है….. भैय्या से हजार पांच सौ खाए बगैर रुकसत नहीं होती है।’
श्रीमती जी को कौन बताए कि भौकाली मिश्रा जी दो दो बार महिला से छेड़खानी में जेल की हवा खा आए हैं और यहां हमारे बारे में अंग्रेजी बोलकर चले गए और मैं श्रीमती जी की निगाह में सबसे गन्दा आदमी सिद्ध हो गया।
सासूमां के साथ पूरा मायका लगभग रो रहा था कि फूल सी बेटी कोपता होता तो इस लम्पट के साथ तो न ही बांधते चाहे जिन्दगी भर कुवांरी रह जाती।
बिस्तर पर पड़े पड़े अपने बारे में एक से एक बढ़कर विशेषण सुन और गुन रहा था….शांति का नाम पता नहीं कहां प्रकट हो गया….अब शांति के कारण भीषण अशांति।
ठीक होने पर श्रीमती जु की टीम की निगरानी में आफिस जाना हुआ….. सबकी नजरें ऐसे घूर रही थी जैसे दो चार का कत्ल करके आया हूं। अपने करीबी दोस्त यार बात करने से भी डरते थे कि कहीं श्रीमती जी उन पर भी न शक करने लगें।
श्रीमती जी ने घर के बाहर ‘कुत्ते से सावधान’ का बोर्ड लगवा दिया। अब कुत्ता कौन है इस पर बहस करने से कोई फायदा नहीं है। घर में अमन चैन है…. मुंह सीकर बस बैठे बैठे टीवी देखता रहता हूं और शरीर के घावों को सहलाता रहता हूं। खूब आवभगत हो रही है, सुबह चाय से लेकर रात्रि भोजन तक। जैसे बकरे को हलाल के पहले खूब पुचकारा जाता है…. खिलाया पिलाया जाता है वही अपनी भी गति है। खूब खाओ पियो कोई राशनिंग नहीं।पर बोलना सख्त मना है। मैं भी सह कुछ देखते सुनते शान्त रहता हूं।
कहीं किसी की साड़ी की तारीफ कर बैठा तो नया बवाल शुरू। तारीफ वाली चुज देखकर तारीफ करने को न मिले… तो पेट में गैस बनने लगती है। सिर भी चकराने लगता है। श्रीमती जी की किटी की दोस्त किटकिटाकर नमक मिर्च लगाकर श्रीमती जी को सख्त रहने की हिदायत दे जाती हैं जाते जाते -‘बिल्कुल छूट मत देना, नहीं तो इस बार फिर कन्ट्रोल में ही नहीं आएंगे।
घर पर काला चश्मा पहनना पड़ता है, जिससे किसी महिला से आखें न लड़ सकें। बन्धुआ मजदूर बन के रह गया हूं। इस माहौल से कैसे पीछा छूटेगा.. पता नहीं।
जब श्रीमती जी को यह रपट मिल गई कि शांति नामक महिला को मैं जानता नहीं पहचानता नहीं, तब जाकर पिण्ड छूटा। लेकिन खबरदार किया कि फिर कभी ऐसा सुनने में नहीं आना चाहिए। मैं भी कम नहीं…इतने दिनों का जला बैठा था,महरी के काम की तारीफ़ की…दूसरे दिन महरी को हटा दिया। कहने लगीं खुद बरतन,झाड़ू पोछा कर लूगी….लेकिन कामवाली बाई नैन मटक्का के लिए नहीं होगी।







