गौरव मिश्र
तन्हा बैठा था एक दिन
मैं अपने मकान में
चिड़िया बना रही थी घोंसला
मेरे घर के रोशनदान में।
पल भर में आती थी वो
पल भर में जाती थी।
छोटे छोटे तिनके चोंच में
भरकर लाती थी वो।
बना रही थी वो अपना
नन्हा सा घर न्यारा
चोंच में उसके तिनका था,
ना कोई ईंट ना गारा।
कुछ दिन बाद….
मौसम बदला…
हवा के झोंके आने लगे
नन्हें से दोनों बच्चे
घोंसले में चहचहाने लगे।
पाल रही थी चिड़िया उन्हें,
पंख निकल रहे थे दोनों के
पैरों पर करती थी खड़ा उन्हें।
देखता था मैं हर रोज उन्हें
जज्बात मेरे उनसे कुछ जुड़े
पंख निकलने पर दोनों बच्चे
मां को छोड़ अकेले उड़ गए।
चिड़िया से पूछा मैंने..
तेरे बच्चे तुझे अकेला
क्यों छोड़ गए
तू तो थी मां उनकी
फिर ये रिश्ता क्यों तोड़ गए
चिड़िया बोली…
परिन्दे और इंसान के बच्चे में
यही तो फर्क है
इंसान का बच्चा….
पैदा होते ही
अपना हक जमाता है
न मिलने पर वो मां बाप को
कोर्ट के चक्कर लगवाता है।
मैंने बच्चों को तो जन्म दिया
पर करता मुझे कोई याद नहीं
मेरे बच्चे क्यों रहेंगे साथ मेरे
क्योंकि मेरे पास
कोई जायदाद नहीं..!







