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    पितृपक्ष में कुश का महत्‍व

    ShagunBy ShagunSeptember 12, 2022 Featured No Comments5 Mins Read
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    Post Views: 964

    राम धनि द्विवेदी

    11 सितम्बर से पितृपक्ष शुरू हो चुके है। इसमें सनातनी लोग अपने पितरों का तर्पण करते हैं। तर्पण दोपहर के समय किया जाना चाहिए। तर्पण में सबसे महत्‍वपूर्ण जो चीज होती है,वह है काला तिल और कुश। तिल तो सर्वसुलभ है लेकिन कुश शहरों में उपलब्‍ध नहीं होता। मैं पिता जी और मां को तर्पण करने के लिए जब से दिल्‍ली आया हूं, हर साल कुश की तलाश करता हूं। कभी- कभी पार्क में तो कभी सड़क या हाईवे के किनारे मिल जाता है। एक साल तो मेरी नई सोसायटी में ही इसका एक पौध मिल गया और मेरा काम हो गया। पिछले साल भी पुस्‍ता रोड पर मिल गया था लेकिन इस साल दिक्‍कत हो रही है। सुबह मैं पूरे रास्‍ते और उसके नीचे बंजर इलाके में भी तलाशता रहा लेकिन कहीं नहीं दिखा।

    कास या सरपत तो दिखा लेकिन कुश नहीं मिला। दोनों में बहुत थोड़ा अंतर है। शहर के लोग दोनों को एक ही समझ लेते हैं। लेकिन कास का पौध बड़ा और कुश का छोटा होता है। कास सीधे ऊपर जाता है और कुश छितरा कर उगता है। कास का डंठल मोटा और पत्‍ते चौड़े होते हैं जबकि कुश के पतले। दोनों के पत्‍ते हाथ काट लेते हैं क्‍यों कि उनके सिरे धारदार होते हैं। कास का पत्‍ता अधिक धारदार होता है। दोनों आसपास हो सकते हैं। कुश पवित्र माना जाता है जबकि कास का सामान्‍य पौधा माना जाता है। कुश पूजा आदि में काम आता है और कास या सरपत छप्‍पर छाने में । दोनों के वानस्‍पतिक नाम भी अलग हैं। कुश की जड़ें इतनी कड़ी होती हैं कि पैर में कांटे की तरह गड़ती हैं। चाणक्‍य और चंद्रगुप्‍त की कथा में कुश की जड़ में मठ्ठा डालने की कहानी से सभी परिचित ही हैं। कहते हैं कि इसकी जड़ में मठ्ठा डालने से पूरी तरह नष्‍ट हो जाता है औ दोबारा वहां नहीं उगता। अन्‍यथा सूखी जड़ें भी बारिश का पानी पाकर हरी- भरी हो जाती हैं।

    फोटो: सोशल मीडिया से साभार

    तो आज मैं मार्निंग वाक और कुश की तलाश दोनों एक साथ कर रहा था। कई लोगों ने पूछा भी। अधिकतर तो जानते ही नहीं थे। एक मंदिर के पुजारी से पूछा कि कहां मिलेगा तो बोले कि यहां नहीं मिलेगा। मैने पूछा तो पूजा कैसे करते होंगे महराज तो मुझे घूरने लगे। मैंने कहा कि कुशोत्‍पाटनी अमावस्‍या को कुश नहीं उखाड़ा तो और नाराज हुए। मैनपुरी के एक सेक्‍यूरिटी गार्ड ने बताया कि हरनंदी नदी (हिंडन) के किनारे जा कर देखिए मिल जाएगा। घुटने के दर्द के कारण अधिक दूर जाने की हिम्‍मत नहीं पड़ी। एक आदमी जौनपुर का मिल गया। उसने बताया कि यहां लोग सरपत को ही कुश समझ लेते हैं। मुझे काम पर जाना है नहीं तो ला देता। शाम को देख लीजिएगा, मिला तो लेता आऊंगा। मैने अपने घर कर्मकांड कराने वाले प‍ंडित जी से कहा तो उन्‍होंने व्‍यवस्था करने का अशवासन दिया,साथ ही यह भी कह दिया कि इस बार कुशोत्‍पाटनी अमावस्‍या को कुश नहीं ला पाया। भाद्रपद की अमावस्‍या कुशोत्‍पाटनी अमावस्‍या कही जाती है। जो पिछले महीने 27 अगस्‍त को थी। कर्मकांडी ब्राह्मण इस दिन कुशा मंत्र पढते हुए उखाड़ते हैं। यह कुशा साल भर चलती है और कभी अपवित्र नहीं होती। सामान्‍य तौर पर कुश उखाड़ने की भी विधि है। इसे उत्‍तर की ओर मुंह करके और मंत्र पढ़ते हुए उखाड़ना चाहिए।

    हमारे दिवंगत परिजनों को मोक्ष प्रदान करने के लिए नारायण सेवा संस्थान गया में 16 दिनों तक श्राद्ध पक्ष में पितृ तर्पण भगवद् कथा का आयोजन करने जा रहा है.
    आप भी अपने पूर्वजों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर पितृ ऋण से मुक्ति पाएं…https://t.co/JvoAjd1iYK#pitrapaksh pic.twitter.com/98dTcUTLxP

    — Narayan Seva Sansthan (@narayanseva_) September 10, 2022

    पौराणिक कथाओं के अनुसार इस पर अमृत कलश रखने से अमृत की कुछ बूंदे इस पर गिर गईं जिससे इसमें अमृतत्‍व आ गया। इसे पवित्री भी कहा जाता है। इसी से इससे बनी आसनी पर बैठ कर पूजा की जाती है। इसका एक नाम उशीर भी है। संस्‍कृत में इसे दर्भ कहा जाता है। भगवान राम ने इसी की आसनी पर बैठ कर समुद्र से लंका जाने का मार्ग मांगा था—बैठे पुनि तट दर्भ डसाई ।महात्‍मा बुद्ध इसी की आसनी पर बैठ कर तप कर रहे थे जब उन्‍हें बुद्धत्‍व प्राप्‍त हुआ। ऋषि मुनि तो इसी की चटाई पर सोते भी थे। कुश की ही एक प्रजाति को खश भी कहते हैं। इसकी जड़ें गर्मी में खश की पट्टी और कूलर की पट्टी बनाने के काम आती हैं। पानी से भींगने पर यह खासतौर की खुशबू बिखेरता है।यही असली खश की पहचान है। यह खूशबू औषधि का काम करती है और सिरदर्द आद‍ि दूर करने में सहायक होती है। खश का तेल बहुत महंगा होता है। कुश की पत्तियां और जड़ों का बहुत चिकित्सकीय उपयोग है। कहते हैं कि इसकी जड़ें हाथ में बांधने या घर में रखने से भूत बाधा नहीं आती। गर्भिणी महिलाओं के लिए तो यह हर रोग की दवा है।

    शास्‍त्र कहते हैं कि कुश की सिरे से पानी देने से पितरों की तृप्ति होती है। इसलिए तर्पण करते समय इसके अग्र भाग को तोड़ना नहीं चाहिए। इसका अग्र भाग बहुत नुकीला होता है, एकदम सुई की तरह। यह भी इसकी पहचान है। इसी से तेज बुद्धि वाले को कुशाग्र कहते हैं। हर काम सलीके और पूर्णता ये करने वाले को कुशल कहा जाता है। शब्‍दकोश में कुश से निर्गत कई शब्‍द हैं। कुश का अर्थ जल भी हेाता है,इसी से जलाशय को कुशय कहते हैं। कुशा का अर्थ रस्‍सी या लगाम भी होता है। कुशल का अर्थ मंगल समाचार- खैरियत भी होता है। कन्‍नौज का प्राचीन नाम कुशस्‍थल था। द्वारका भी प्राचीन कुशस्‍थली नगर के स्‍थान पर बसी थी। इसी तरह हल का भाल को कुशिक भी (नुकीला होने के कारण) कहते हैं। कुश मुद्रिका कर्मकांड के समय हाथ में पहनी जाती है।इसे पवित्री भी कहते हैं।

    शाम तक ताजा कुश न मिलने पर बाजार में पूजा की दुकान से सूखे कुश को मंगाना पड़ा। उसी की पवित्री भी मिल गई। भगवान इन दुकानदारों का भला करें जो सब चीजें उपलब्‍ध करा देते हैं। एक जगह एक विकल्‍प और दिखा। यदि कुश नहीं मिल पाए तो तर्पण वाले जल में सोने या चांदी की मुद्रिका डाल दें। पूजा कराते समय अनामिका में स्‍वर्णमुद्रिका होने पर पंडित कुश मुद्रिका नहीं पहनाते। सोना तो सोना ही है।

    • लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

    Shagun

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