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    अरे साहब… नाम में ही तो सब कुछ रखा है!

    By October 3, 2017 ब्लॉग No Comments7 Mins Read
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    देवेश पांडेय
    अरे… नाम में क्या रखा! जुमला आम तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन वास्तविकता तो यह कि नाम में ही तो सब कुछ रखा है। रावण के दस सिर और बीस भुजायें थीं। वह बड़ा शूरवीर और पराक्रमी होने के अलावा प्रकाण्ड विद्वान था। रावण का अर्थ होता है दहाड़, तेज गर्जना या ऐसी आवाज जिससे आकाश से लेकर पाताज तक गुंजायमान हो जाये। लेकिन रावण को सदैव ही खलनायक,  बुरा और अंधकार के प्रतीक के रूप में ही माना गया है। कोई भी व्यक्तित्व आकर्षक लग सकता है लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस रूप में देखा जाता है नायक या खलनायक। नायक वो जो अच्छे काम करता है और अपनी अच्छाइयों की वजह से आमजन में लोकप्रिय हो जाता है, खलनायक वो जिसकी छवि अपने गन्दे कृतित्व की वजह से आम जनमानस में खराब हो जाती है, लोग उससे भय खाते हों। जिससे लोग भय करते हों भला वो लोगों को क्यों प्रिय होगा। जाहिर है कि  ऐसे व्यक्ति के नाम के नाम पर अपने बच्चों के नाम भी नहीं रखना चाहेंगे। इसी प्रकार मथुरा के राजा उग्रसेन का पुत्र था कंस। कंस का अर्थ होता है अमृत यानि जिसके पान से मनुष्य अमर हो जाते हैं। कंस का अर्थ कांसा भी होता है कांसा भी पवित्र माना जाता है। लेकिन कोई भी अपने बच्चों के नाम कंस रखना पसंद नहीं करता है। अभी तक के प्रमाण बताते हैं कि नाम का काफी हद तक उस मनुष्य के व्यक्तित्व पर असर पड़ता है।
    नाम सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं होता है। वर्तमान परिदृश्य में हमारे देश में नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं दिखायी पड़ता है। अगर नाम का महत्व न होता तो अन्तर्जातीय विवाह करने वाली इन्दिरा जी को महात्मा गांधी अपना नाम क्यों देते? जब गांधी जी इन्दिरा जी को अपनी बेटी कहते थे तो इसका कुछ अर्थ भी होता है। इन्दिरा जी के नाम के आगे अपना नाम  या उपनाम गांधी देने का मतलब था कि इससे दोनों की भवनाएं भी जुड़ीं थीं। ये भावनाएं कितनी शक् ितशाली  थीं, ये पूरा देश देख चुका है। जिस परिवार का गांधी से दूर-दूर तक कुछ भी लेना-देना नहीं था, वो गांधी परिवार बन गया और जिन गांधी नाम का परिवार था वो जाने कहीं खो सा गया है। बहुत साफ है कि रिश्तों से ज्यादा अहमियत भावनाओं और नामों के इस्तेमाल की है। यह देश नाम से चलता है। इस देश में आज भी चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला, भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस और बिस्मिल के नाम आज भी रगों में दौड़ते खून की रफ्तार तेज कर देते हैं। भारत में आज भी तैमूर लंग व मोहम्मद गोरी जैसे विदेशी आक्रांन्ताओं के नाम सुनकर लोगों के दिलों के जख्म हरे हो जाते हैं।
    सैफ अली ख़ान और करीना कपूर ने अपने बेटे का नाम तैमूर रखा तो सोशल मीडिया पर ये बड़ी बहस का विषय बन गया। कई लोगों ने इसे दोनों का व्यक्तिगत मामला कहा तो कई लोगों ने इस बात पर एतराज जताया और कहा कि एक जालिम आक्रमणकारी के नाम पर बेटे का नाम रखना गलत है।
    इतिहासकार मानते हैं कि चुगताई मंगोलों के खान, तैमूर लंगड़े का एक ही सपना था। वो यह कि अपने पूर्वज चंगेज़ खान की तरह ही वह पूरे यूरोप और एशिया में अपनी जीत का परचम लहराये। लेकिन चंगेज़ खान जहां पूरी दुनिया को एक ही साम्राज्य से बांधना चाहता था, तैमूर का इरादा सिर्फ लोगों पर धौंस जमाना था। साथ ही साथ उसके सैनिकों को यदि लूट का कुछ माल मिल जाये तो और भी अच्छा।
    चंगेज़ और तैमूर में एक बड़ा फर्क था। चंगेज़ के कानून में सिपाहियों को खुली लूट-पाट की मनाही थी। लेकिन तैमूर के लिए लूट और क़त्लेआम मामूली बातें थीं। साथ ही तैमूर हमारे दिलों में गहरे जख्म छोड़ गया, जिससे पता चलता है कि उन तीन महीनों में क्या हुआ जब तैमूर भारत में था।
    विश्व विजय के मद से सराबोर तैमूर सन 1398 ई. में अपनी घुड़सवार सेना के साथ अफगानिस्तान पहुंचा। जब वापस जाने का समय आया तो उसने अपने सिपहसालारों से मशविरा किया। हिन्दुस्तान उन दिनों काफी अमीर देश माना जाता था। हिन्दुस्तान की राजधानी दिल्ली के बारे में तैमूर ने काफी कुछ सुना था। यदि दिल्ली पर एक सफल हमला हो सके तो लूट में बहुत माल मिलने की उम्मीद थी। तब दिल्ली के शाह नसीरूद्दीन महमूद के पास हाथियों की एक बड़ी फौज थी। कहा जाता है कि उसके सामने कोई टिक नहीं पाता था। साथ ही साथ दिल्ली की फौज भी काफी बड़ी थी। तैमूर ने कहा कि बस थोड़े ही दिनों की बात है अगर ज़्यादा मुश्किल पड़ी तो वापस आ जायेंगे। रास्ते में उन्होंने असपंदी नाम के गांव के पास पड़ाव डाला। यहां तैमूर ने लोगों पर दहशत फैलाने के लिए सभी को लूट लिया और सारे हिन्दुओं को कत्ल का आदेश दिया। पास ही में तुग़लकपुर में आग की पूजा करने वाले यज़दीयों की आबादी थी। आजकल हम इन्हें पारसी कहते हैं। तैमूर कहता है कि ये लोग एक गलत धर्म को मानते थे इसलिए उनके सारे घर जला डाले गये और जो भी पकड़ में आया उसे मार डाला गया। फिर फौजें पानीपत की तरफ निकल पड़ीं। पंजाब के समाना कस्बे, असपंदी गांव में और हरियाणा के कैथल में हुए ख़ून खऱाबे की ख़बर सुन पानीपत के लोग शहर छोड़ दिल्ली की तरफ़ भाग गये और पानीपत पहुंचकर तैमूर ने शहर को तहस-नहस करने का आदेश दे दिया। यहां भारी मात्रा में अनाज मिला, जिसे वे अपने साथ दिल्ली की तरफ़ ले गये। रास्ते में लोनी के किले से राजपूतों ने तैमूर को रोकने की नाकाम कोशिश की। अब तक तैमूर के पास कोई एक लाख हिन्दू बन्दी थे। दिल्ली पर चढ़ाई करने से पहले उसने इन सभी को कत्ल करने का आदेश दिया। यह भी हुक्म हुआ कि यदि कोई सिपाही बेकुसूरों को कत्ल करने से हिचके तो उसे भी कत्ल कर दिया जाये।
    अगले दिन दिल्ली पर हमला करके नसीरूद्दीन महमूद को आसानी से हरा दिया गया। महमूद डर कर दिल्ली छोड़ जंगलों में जा छिपा। दिल्ली में जश्न मनाते हुए मंगोलों ने कुछ औरतों को छेड़ा तो लोगों ने विरोध किया। इस पर तैमूर ने दिल्ली के सभी हिन्दुओं को ढूंढ-ढूंढ कर कत्ल करने का आदेश दिया। अब तैमूर दिल्ली छोड़कर उज़्बेकिस्तान की तरफ रवाना हुआ। रास्ते में मेरठ के किलेदार इलियास को हराकर तैमूर ने मेरठ में भी तकरीबन 30 हज़ार हिन्दुओं को मारा। यह सब करने में उसे महज़ तीन महीने लगे। इस बीच वह दिल्ली में केवल 15 दिन रहा।
    आज के दौर में यह उम्मीद करना जरा बेमानी सा होगा कि भारत के लोग अपनी औलादों का नाम किसी सन्त, फकीर, पैगम्बर, देवता चाहें वो किसी भी धर्म से ताल्लुक रखता हो, किसी देशभक्त या फिर किसी क्रान्तिकारी पर रखेंगे। लेकिन किसी हत्यारे, चोर-डकैत या फिर आक्रांताओं के नाम पर बच्चों का नामकरण किया जायेगा तो भावनाएं तो आहत होंगी ही। जो नामों का शाब्दिक अर्थ बताने की बेवकूफी करते हैं उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिये कि व्यक्तित्वों से नाम बनते हैं नाम से व्यक्तित्व नहीं। चन्द्रशेखर सीताराम तिवारी बोल दें तो शायद ही लोग उस महान व्यक्तित्व को पहचान पायें, लेकिन उस महान आत्मा को चन्द्रशेखर आजाद के नाम से सम्बोधित करते हैं तो लोगों के दिलों दिमाम पर उनका अनुकरणीय व्यक्तित्व कौंध जाता है। इसलिए  हमारे पूर्वज भी कहते थे कि बच्चों का नाम रखने से पहले काफी विचार कर लें, तब नाम रखें क्योंकि नाम में ही तो सब कुछ रखा है।

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