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    गौरैया अभी भी शेष हैं लेकिन अब वह बात कहाँ

    ShagunBy ShagunMarch 20, 2025Updated:March 20, 2025 ब्लॉग No Comments5 Mins Read
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    भारत में, विशेष रूप से, घरेलू गौरैया (Passer domesticus) आज भी कई जगहों पर पाई जाती है, हालाँकि उनकी संख्या में कुछ क्षेत्रों में कमी आई है। शहरीकरण, प्रदूषण और घोंसले बनाने के लिए जगह की कमी जैसे कारणों से उनकी आबादी पर असर पड़ा है। लेकिन ग्रामीण इलाकों और कुछ शहरी बगीचों में वे अब भी चहचहाती नज़र आती हैं। क्या आपने हाल में कहीं गौरैया देखी है? हाल ही में नहीं न !


    गौरैया दिवस पर विशेष (20 मार्च)


    गुम हो रही गौरैय्या

    “गुम होती गौरैया” एक ऐसा विषय है जो पर्यावरण और प्रकृति प्रेमियों के बीच चिंता का कारण बन गया है। घरेलू गौरैया, जो कभी हर आँगन और छत पर चहचहाती थी, अब धीरे-धीरे कई जगहों से गायब होती जा रही है। दरअसल, इसके पीछे कई कारण हैं:

    1. शहरीकरण: कंक्रीट के जंगल बढ़ने से गौरैया के घोंसले बनाने की जगहें कम हो गई हैं। पुराने घरों की जगह ऊँची इमारतों ने ले ली है, जहाँ उनके लिए सुरक्षित कोने नहीं मिलते।
    2. प्रदूषण: हवा और ध्वनि प्रदूषण ने भी उनके रहने की परिस्थितियों को प्रभावित किया है। कीटनाशकों के इस्तेमाल से उनके भोजन, छोटे कीड़े की उपलब्धता भी कम हुई है।
    3. आधुनिक जीवनशैली: पहले लोग अनाज बाहर रखते थे या छत पर सुखाते थे, जो गौरैया के लिए आसान भोजन था। अब पैकेटबंद खाने और साफ-सुथरे घरों ने यह स्रोत भी छीन लिया।

    हालाँकि, कुछ लोग और संगठन गौरैया को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। छोटे-छोटे कदम जैसे घोंसले (नेस्ट बॉक्स) लगाना, पानी और दाने रखना, और जागरूकता फैलाना उनकी वापसी में मदद कर सकता है। क्या आपके आसपास गौरैया दिखती हैं, या आपने उन्हें बचाने के लिए कुछ किया है?

    अब सवाल पैदा होता है कि ढेर सारी गौरैया वापस आएँगी या नहीं?

    ढेर सारी गौरैया वापस आएँगी या नहीं, यह कई बातों पर निर्भर करता है, लेकिन अगर हम सही कदम उठाएँ तो उनकी संख्या बढ़ने की उम्मीद ज़रूर है। प्रकृति में कोई भी बदलाव रातोंरात नहीं होता, और गौरैया की वापसी के लिए हमें धैर्य और लगातार प्रयास की ज़रूरत होगी।

    इस संरक्षण में क्या मदद कर सकता है:

    1. घोंसले की व्यवस्था: अगर हर मोहल्ले में कुछ लोग लकड़ी या मिट्टी के नेस्ट बॉक्स लगाएँ, तो गौरैया को प्रजनन के लिए सुरक्षित जगह मिलेगी।
    2. भोजन और पानी: छोटे दानों (बाजरा, चावल) और पानी के स्रोत रखने से उनकी रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी होंगी।
    3. हरियाली बढ़ाना: पेड़-पौधे लगाने से न सिर्फ़ कीड़े बढ़ेंगे, जो उनका प्राकृतिक भोजन हैं, बल्कि प्रदूषण भी कम होगा।
    4. जागरूकता: लोगों को बताना कि गौरैया हमारे पर्यावरण का हिस्सा हैं और उनकी कमी खाद्य श्रृंखला को प्रभावित कर सकती है।

    भारत में इन जीवों के अस्तित्व पर है खतरा

    भारत में गौरैया के अलावा कई अन्य पक्षी भी लुप्तप्राय की श्रेणी में आते हैं। इनमें से कुछ की स्थिति गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) है, तो कुछ संकटग्रस्त (Endangered) या असुरक्षित (Vulnerable) हैं। यहाँ कुछ प्रमुख लुप्तप्राय पक्षियों के नाम और उनकी स्थिति का ज़िक्र है:
    साइबेरियाई सारस (Siberian Crane)
    स्थिति: गंभीर रूप से संकटग्रस्त

    ये प्रवासी पक्षी साइबेरिया से भारत (खासकर राजस्थान के केवलादेव नेशनल पार्क) आते थे, लेकिन अब इनकी संख्या बेहद कम हो गई है। आर्द्रभूमि का नुकसान और शिकार इसके मुख्य कारण हैं।

    जेरडन कौर्सर (Jerdon’s Courser)
    स्थिति: गंभीर रूप से संकटग्रस्त

    यह दुर्लभ पक्षी आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। जंगल कटाई और मानवीय गतिविधियों ने इसके आवास को नष्ट कर दिया।

    ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (सोहन चिड़िया)
    स्थिति: गंभीर रूप से संकटग्रस्त

    राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में पाया जाने वाला यह भारी-भरकम पक्षी अब विलुप्त होने के कगार पर है। बिजली के तारों से टकराना और घास के मैदानों का खत्म होना इसके लिए बड़ा खतरा है।

    बंगाल फ्लोरिकन (Bengal Florican)
    स्थिति: गंभीर रूप से संकटग्रस्त

    उत्तर-पूर्वी भारत और उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों में पाया जाने वाला यह पक्षी घास के मैदानों के नुकसान और शिकार के कारण संकट में है।

    गुलाबी सिर वाली बत्तख (Pink-headed Duck)
    स्थिति: संभवतः विलुप्त

    यह खूबसूरत बत्तख कभी पूर्वी भारत और बांग्लादेश में पाई जाती थी, लेकिन पिछले कई दशकों से इसे देखा नहीं गया। आर्द्रभूमि का नष्ट होना इसका कारण माना जाता है।

    हिमालयी बटेर (Himalayan Quail)
    स्थिति: संभवतः विलुप्त

    उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला यह पक्षी 19वीं सदी के बाद से नहीं देखा गया। जंगल साफ करने और शिकार ने इसे खत्म कर दिया।

    श्वेतपीठ गिद्ध (White-backed Vulture)
    स्थिति: गंभीर रूप से संकटग्रस्त

    कभी भारत में बहुतायत में पाए जाने वाले ये गिद्ध डाइक्लोफेनाक दवा (जो मवेशियों को दी जाती थी) के प्रभाव से भारी संख्या में मारे गए। अब संरक्षण प्रयासों से इनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है।

    संरक्षण की उम्मीद:
    इन पक्षियों को बचाने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं, जैसे संरक्षित क्षेत्र बनाना, शिकार पर रोक, और आवास को पुनर्जनन। अगर ये प्रयास बड़े पैमाने पर सफल हुए, तो कुछ प्रजातियाँ वापस आ सकती हैं।

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