राजनीति का केंद्र धर्म और जाति से इतर मानवता और विकास हो तभी सार्थक होता है लोकतंत्र
आलोक शुक्ला
दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में दशकों तक अस्थिरता और संक्रमण का पर्याय रहे बफर स्टेट नेपाल ने वर्ष 2026 की दहलीज पर कदम रखते ही जिस राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया है, वह न केवल सुखद है बल्कि पड़ोसी लोकतांत्रिक देशों के लिए एक गंभीर आत्म-चिंतन का विषय भी है। एक ओर हिमालय की गोद में बसा यह राष्ट्र अपनी पारंपरिक बेड़ियों को तोड़कर सुशासन, तकनीक और पारदर्शिता के नए प्रतिमान गढ़ रहा है, तो दूसरी ओर लोकतंत्र की जननी होने का गौरव रखने वाला भारत आज भी धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के उसी दलदल में छटपटा रहा है जिसे नेपाल ने पीछे छोड़ने का साहस दिखाया है। नेपाल का यह रूपांतरण महज एक आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह एक वैचारिक क्रांति है जहाँ जनता ने पहचान की राजनीति के ऊपर अस्तित्व के विकास को प्राथमिकता दी है।
नेपाल में इस बड़े बदलाव का प्राथमिक कारण वहां के नागरिकों का पारंपरिक राजनीतिक सिंडिकेट के विरुद्ध संगठित विद्रोह और युवाओं का नीति-निर्धारण के केंद्र में आना है। वर्षों तक राजशाही और माओवादी संघर्ष के बीच पिसने वाली नेपाली जनता ने यह समझ लिया कि सत्ता का चरित्र तब तक नहीं बदलेगा जब तक कि योग्यता को दलीय वफादारी से ऊपर नहीं रखा जाता। इसी जनचेतना का परिणाम है कि नई सरकार ने कार्यभार संभालते ही सबसे पहले 1990 के बाद के सभी उच्चाधिकारियों और नेताओं की संपत्ति की न्यायिक जांच के आदेश दिए। यह एक ऐसा तथ्य है जो किसी भी दक्षिण एशियाई देश के लिए अकल्पनीय रहा है। प्रशासनिक सुधारों के तहत नेपाल ने डिजिटल गवर्नेंस को केवल नारों तक सीमित न रखकर उसे धरातल पर उतारा है, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो गई है। जब तंत्र पारदर्शी होता है, तो समाज का विश्वास सरकार पर बढ़ता है और यही विश्वास नेपाल के इस शानदार बदलाव की मुख्य धुरी है।
समाज और देश पर इसके प्रभावों का विश्लेषण करें तो नेपाल ने अपनी आंतरिक विभिन्नताओं चाहे वह मधेस की मांगें हों या जनजातीय अस्मिता सभी को विकास के धागे में पिरोया है। वहां की नई शिक्षा नीति ने विश्वविद्यालयों को दलीय राजनीति के चंगुल से मुक्त कर दिया है, जिससे मेधावी छात्र अब देश छोड़ने के बजाय होम ग्रोन स्टार्ट अप्स की ओर आकर्षित हो रहे हैं। भविष्य में इसके प्रभाव दूरगामी होंगे। नेपाल न केवल जलविद्युत का सबसे बड़ा निर्यातक बनकर उभरेगा, बल्कि एक आईटी हब के रूप में भी अपनी पहचान स्थापित करेगा। यह स्थिरता नेपाल को विदेशी निवेश के लिए एक सुरक्षित स्वर्ग बना रही है, जो उसे आने वाले दशक में दक्षिण एशिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार करेगी। साथ ही साथ नेपाल की नई जेन जी सरकार ने अपने देशवासियों के चेहरे में मुस्कान की नई दास्तां भी लिखना शुरू कर दिया है।
भारत में राजनीति की पहचान अब इवेंट मैनेजमेंट से है, जहाँ विकास की रेखाएं अक्सर जातिगत समीकरणों की स्याही से खींची जाती हैं। चुनाव आते ही नीतियां पीछे छूट जाती हैं और ध्रुवीकरण का वही पुराना खेल फिर शुरू होता है जहाँ भाई को भाई से अलग करने में ही नेताओं को अपनी विजय दिखाई देती है। हमारे यहाँ अलगाव और फूट की राजनीति एक कला बन चुकी है। जहाँ नेपाल में युवा पलायन रोकने के लिए ठोस आर्थिक नीतियां बनाई जा रही हैं, वहीं भारत में हम अपने युवाओं को अक्सर इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने या सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने के काम में झोंक देते हैं। यह विडंबना ही है कि जिस भारत ने नेपाल को लोकतंत्र का ककहरा सिखाया, आज वही भारत अपने पड़ोसी की राजनीतिक शुचिता के सामने बौना नजर आ रहा है।
भारत के लिए नेपाल का यह उदय एक स्पष्ट संदेश और चेतावनी दोनों है। संदेश यह कि विविधता कभी भी विकास में बाधक नहीं होती, बशर्ते उसे राजनीतिक हथियार न बनाया जाए। नेपाल में भी धर्म, भाषा और भूगोल की विभिन्नताएं हैं, लेकिन वहां के नेतृत्व ने उन्हें राष्ट्रीय गौरव में बदला है, न कि वोट बैंक में। भारत के लिए यह सीखना अनिवार्य है कि सबका साथ-सबका विकास केवल एक चुनावी जुमला बनकर रह जाएगा यदि प्रशासन में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की कमी रही। नेपाल की सफलता यह सिद्ध करती है कि यदि नेतृत्व युवा हो और उसकी दृष्टि वैश्विक हो, तो दशकों पुराने सिस्टम को भी बदला जा सकता है।
नेपाल की नई सरकार की सफलता केवल उनके आंकड़ों में नहीं, बल्कि वहां के लोगों के चेहरों पर दिख रही उस उम्मीद में है जो लंबे अंधेरे के बाद सवेरे की पहली किरण को देखकर जागती है। भारत को अब अपनी बड़े भाई वाली मानसिकता और आंतरिक विभाजनकारी राजनीति के खोल से बाहर निकलना होगा। यदि हम अब भी धर्म और जाति की अफीम चाटकर मदहोश रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब हम केवल अपने गौरवशाली अतीत की कहानियां सुनाते रह जाएंगे और हमारे पड़ोसी भविष्य की इबारत लिख देंगे। नेपाल का यह हिमालयी मॉडल दक्षिण एशिया के लिए एक लाइटहाउस है, जिसकी रोशनी में भारत समेत अन्य पड़ोसी देशों को अपना खोया हुआ लोकतांत्रिक रास्ता पुन: खोजने की आवश्यकता है। राजनीति का केंद्र मंदिर-मस्जिद या जाति और क्षेत्र के बजाय इंसान और उसकी प्रगति होना चाहिए। नेपाल ने यह कर दिखाया है, अब प्रश्न हमारी नीतियां और हमारे साहस पर है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विशेषज्ञ) हैं







