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    विकास के नाम पर जंगलों पर बुलडोजर और बेघर होते निरीह वन्यजीव

    ShagunBy ShagunApril 2, 2025 ब्लॉग No Comments5 Mins Read
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    एक तरफ छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगलों को काटा जा रहा है तो दूसरी तरफ हैदराबाद यूनिवर्सिटी से सटी 400 एकड़ जमीन पर तेलंगाना सरकार बुलडोज़र चला रही है। जंगलों को उजाड़ा जा रहा है। इसके खिलाफ़ प्रदर्शन कर रहे छात्रों को हिरासत में लिया जा रहा है, उन्हें घसीटा जा रहा है। तथाकथित विकास के नाम पर पर्यावरण और हजारों वन्यजीवों का दम घोंटा जा रहा है। क्या यह देश हित में जरुरी है कि जंगलों को उजाड़ा जाये, विकास करने के और भी कई अन्य उपाए हैं जिसे अपनाकर मानव और प्रकृति के बीच संतुलन बनाया जा सकता है –

    हैदराबाद यूनिवर्सिटी से सटी 400 एकड़ जमीन पर तेलंगाना सरकार द्वारा बुलडोजर चलाने और जंगलों को उजाड़ने का कारण सरकार की विकास योजनाएं हैं। तेलंगाना सरकार इस जमीन को औद्योगिक और तकनीकी विकास के लिए इस्तेमाल करना चाहती है, जिसमें एक आईटी पार्क की स्थापना भी शामिल है। सरकार का दावा है कि यह जमीन उसकी संपत्ति है और इसका उपयोग राज्य में निवेश आकर्षित करने, रोजगार सृजन करने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए किया जाएगा। इस योजना के तहत, कांचा गचीबोवली में स्थित इस भूखंड को साफ करने और विकसित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
    हालांकि, इस कदम का विरोध हो रहा है क्योंकि छात्रों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह क्षेत्र जैव विविधता से समृद्ध है और इसमें सैकड़ों प्रजातियों के पेड़-पौधे और वन्यजीव मौजूद हैं। उनका तर्क है कि जंगलों को उजाड़ने से पर्यावरण को गंभीर नुकसान होगा और यह जमीन विश्वविद्यालय के शैक्षिक और अनुसंधान उद्देश्यों के लिए महत्वपूर्ण है। छात्रों का यह भी कहना है कि यह जमीन विश्वविद्यालय की सीमा से सटी हुई है और इसे संरक्षित किया जाना चाहिए। इस विवाद में कानूनी पहलू भी शामिल है, जहां सरकार का दावा है कि जमीन पर उसका अधिकार है, जबकि छात्र और विश्वविद्यालय के कुछ प्रतिनिधि इसे विश्वविद्यालय का हिस्सा मानते हैं।
    इसके चलते, जब बुलडोजर और अन्य मशीनें इस क्षेत्र में काम करने पहुंचीं, तो छात्रों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया, जिसके जवाब में पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। यह मामला अब पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच टकराव का प्रतीक बन गया है।

    आखिर जंगलों को उजाड़कर विकास कितना उचित :

    जंगलों को उजाड़कर विकास करना एक जटिल मुद्दा है, जिसमें पर्यावरण, वन्यजीव, और मानवीय जरूरतों के बीच संतुलन की आवश्यकता होती है। यह कितना उचित है, यह परिस्थितियों, योजना की प्रकृति, और उसके दीर्घकालिक प्रभावों पर निर्भर करता है। आइए इसे दो पहलुओं से देखें—विकास का औचित्य और वन्यजीव पर प्रभाव।

    विकास का औचित्य

    विकास के पक्ष में तर्क यह है कि औद्योगिक और तकनीकी परियोजनाएं आर्थिक विकास को बढ़ावा देती हैं। इससे रोजगार के अवसर पैदा होते हैं, बुनियादी ढांचा मजबूत होता है, और लोगों का जीवन स्तर सुधर सकता है। तेलंगाना सरकार का दावा है कि हैदराबाद जैसे शहर में आईटी पार्क जैसी परियोजनाएं राज्य को वैश्विक तकनीकी केंद्र के रूप में स्थापित कर सकती हैं। हालांकि, यह तभी उचित ठहराया जा सकता है जब वैकल्पिक उपायों, बंजर या पहले से खाली जमीन का उपयोग को प्राथमिकता दी जाए और जंगलों को उजाड़ना अंतिम विकल्प हो। अगर विकास के नाम पर जैव विविधता को अनदेखा किया जाता है, तो यह भविष्य में पर्यावरणीय संकट पैदा कर सकता है, जैसे जलवायु परिवर्तन, मिट्टी का कटाव, और पानी की कमी।

    वन्यजीव पर प्रभाव

    जंगलों को उजाड़ने का वन्यजीव पर गहरा और ज्यादातर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है:

    निवास स्थान का नुकसान: वन्यजीव जैसे पक्षी, कीट, छोटे स्तनधारी, और सरीसृप अपने प्राकृतिक आवास खो देते हैं। हैदराबाद विश्वविद्यालय के आसपास का क्षेत्र कई प्रजातियों का घर है, और जंगल साफ होने से ये जीव या तो मर सकते हैं या शहरों की ओर पलायन कर सकते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है।

    जैव विविधता में कमी: पेड़-पौधों और उन पर निर्भर प्रजातियों के नष्ट होने से पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर होता है। परागण, बीज प्रसार, और प्राकृतिक संतुलन प्रभावित होता है।

    खाद्य श्रृंखला का टूटना: शिकारी और शिकार दोनों प्रभावित होते हैं, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी में असंतुलन पैदा हो सकता है।

    जलवायु प्रभाव: जंगल कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं और ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। इन्हें हटाने से स्थानीय तापमान बढ़ सकता है और प्रदूषण का स्तर ऊंचा हो सकता है, जो वन्यजीवों के लिए और कठिनाई पैदा करता है।

    पलायन या विलुप्ति: जिन प्रजातियों के पास दूसरा ठिकाना नहीं होता, वे स्थानीय रूप से विलुप्त हो सकती हैं।

    संतुलित दृष्टिकोण

    जंगलों को उजाड़े बिना विकास संभव है अगर सरकार सतत विकास (sustainable development) पर ध्यान दे। इसके लिए:
    जंगल से दूर पहले से बेकार पड़ी जमीन का उपयोग करना।

    • हरियाली को संरक्षित करते हुए छोटे पैमाने पर विकास करना।
    • वन्यजीवों के लिए वैकल्पिक कॉरिडोर या संरक्षित क्षेत्र बनाना।
    • पुनर्वनीकरण (reforestation) और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) को सख्ती से लागू करना।

    अंततः, अगर विकास जरूरी है, तो इसे पर्यावरण और वन्यजीवों के नुकसान को न्यूनतम करते हुए करना चाहिए। हैदराबाद के मामले में, 400 एकड़ जंगल को पूरी तरह उजाड़ने के बजाय, सरकार और विरोधियों के बीच बातचीत से कोई बीच का रास्ता निकाला जा सकता है, ताकि न आर्थिक प्रगति रुके, न ही प्रकृति को अपूरणीय क्षति हो।

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