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    देवानंद की इस फिल्म में अमिताभ बच्चन ने किया था कैमियो रोल ?

    ShagunBy ShagunApril 9, 2025 मनोरंजन No Comments9 Mins Read
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    हिंदी फिल्मों के एक “एवरग्रीन हीरो” जिन्हें देवानंद या देव साहब भी कहा जाता है, ने अपनी फिल्मों में हिट होने का कोई एक तय फॉर्मूला नहीं अपनाया था, बल्कि उनकी सफलता उनके व्यक्तित्व, अभिनय शैली, और दर्शकों से जुड़ने की कला में छिपी थी। फिर भी, उनमे कुछ खास बातें थीं जो उनकी फिल्मों को हिट बनाने में मदद करती थीं। जैसे देवानंद की खास अदा, उनकी तेज-तर्रार डायलॉग डिलीवरी, और सिर को हल्का झटका देने का तरीका दर्शकों को खूब पसंद आता था। उनकी रोमांटिक छवि, खासकर फिल्मों जैसे काला पानी (1958) और गाइड (1965) में, युवाओं को पसंद आयी थी।

    उनकी ज्यादातर फिल्मों में यादगार गाने होते थे। संगीतकार एस.डी. बर्मन और गीतकार साहिर लुधियानवी जैसे दिग्गजों के साथ उनके सहयोग ने ज्वेल थीफ (1967) और हम दोनों (1961) जैसी फिल्मों को हिट बनाया। फिल्म के गाने उनकी कहानियों का अभिन्न हिस्सा होते थे।

    बता दें कि देवानंद ने अपनी फिल्मों में सामाजिक मुद्दों और बोल्ड विषयों को छूने की हिम्मत दिखाई। गाइड में एक गैर-पारंपरिक प्रेम कहानी और हरे रामा हरे कृष्णा (1971) में हिप्पी संस्कृति जैसे प्रयोगों ने उन्हें अलग पहचान दी। वह अपनी प्रोडक्शन कंपनी नवकेतन फिल्म्स के तहत कई फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया। वे स्क्रिप्ट चयन में सावधानी बरतते थे और दर्शकों की नब्ज को समझते थे। उनकी फिल्मों में उनकी जीवंतता और उत्साह साफ झलकता था। वे हर किरदार को पूरे जोश के साथ निभाते थे, जो दर्शकों को बांधे रखता था। हालांकि, यह भी सच है कि बाद के करियर में उनका जादू कम हुआ, क्योंकि वे अपनी पुरानी शैली से बाहर नहीं निकल पाए और बदलते दौर के साथ तालमेल नहीं बिठा सके। फिर भी, उनके सुनहरे दौर में उनकी सफलता का “फॉर्मूला” उनकी अनोखी शख्सियत और सिनेमा के प्रति समर्पण ही था।

    यहाँ एक खास बात और बता दें कि देवानंद की हिट फिल्मों में किशोर कुमार के गानों का योगदान बहुत महत्वपूर्ण रहा, देवानंद की सफलता में कई और कारक थे, जिनमें उनकी अभिनय शैली, रोमांटिक छवि, कहानी का चयन, और संगीत का जादू शामिल था।

    किशोर कुमार ने देवानंद की कई सुपरहिट फिल्मों में अपनी आवाज दी, जैसे काला बाजार (1960), गाइड (1965), ज्वेल थीफ (1967), और हरे रामा हरे कृष्णा (1971)। उनके गाने, जैसे “ख्वाब हो तुम या कोई हकीकत” (तीन देवियां), ओ मेरे राजा (ज्वेल थीफ), और “फूलों के रंग से” (प्रेम पुजारी), न सिर्फ चार्टबस्टर थे, बल्कि फिल्म की कहानी को और आकर्षक बनाते थे। किशोर की आवाज में एक ताजगी और जोश था, जो देवानंद की जीवंत और रोमांटिक छवि के साथ पूरी तरह मेल खाता था।


    26 सितंबर 1923 – 3 दिसंबर 2011


    देवानंद की फिल्मों में संगीत हमेशा एक बड़ा आकर्षण रहा। किशोर कुमार की गायकी ने कई गानों को अमर बना दिया, और ये गाने फिल्म की लोकप्रियता बढ़ाने में अहम रहे। उदाहरण के लिए, गाइड का गाना “दिन ढल जाए” या ज्वेल थीफ का “होठों में ऐसी बात” आज भी लोग गुनगुनाते हैं। ये गाने न सिर्फ फिल्म के दृश्यों को पूरा करते थे, बल्कि रेडियो और रिकॉर्ड्स के जरिए फिल्म की पहुंच को और बढ़ाते थे।

    देवानंद का अपना स्टारडम:

    किशोर कुमार के गाने भले ही हिट रहे हों, लेकिन देवानंद की अपनी स्टार पावर और दर्शकों के बीच लोकप्रियता भी कम नहीं थी। उनकी स्टाइल, डायलॉग डिलीवरी, और स्क्रीन प्रजेंस ने उन्हें उस दौर का बड़ा सितारा बनाया। अगर गाने अच्छे होते लेकिन अभिनय या कहानी कमजोर होती, तो शायद फिल्में उतनी नहीं चलतीं। गाइड जैसी फिल्म की सफलता में किशोर के गानों के साथ-साथ देवानंद का शानदार अभिनय और आर.के. नारायण की कहानी भी उतनी ही जिम्मेदार थी।

    किशोर कुमार के अलावा, देवानंद ने संगीतकार एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन, और गीतकार साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी जैसे दिग्गजों के साथ काम किया। यह पूरी टीम का कमाल था कि गाने और फिल्में हिट होती थीं। किशोर की आवाज को सही दिशा देने में इन संगीतकारों का भी बड़ा हाथ था। किशोर कुमार के गानों ने देवानंद की फिल्मों को एक खास मुकाम दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई, खासकर उनकी रोमांटिक और युवा छवि को और मजबूत करके। लेकिन देवानंद की हिट फिल्में सिर्फ गानों की वजह से नहीं, बल्कि उनकी स्टार पावर, कहानी, और पूरी टीम के प्रयासों की वजह से थीं।

    देवानंद के जीवन से जुड़ी कई बड़ी और रोचक घटनाएं हैं, एक सबसे चर्चित घटना के बारे बताते हैं, तो वह है फिल्म “गाइड” (1965) का निर्माण और उसकी सफलता, साथ ही इसके पीछे की उनकी निजी और प्रोफेशनल जिंदगी का उतार-चढ़ाव। यह घटना उनके करियर और व्यक्तित्व दोनों को परिभाषित करती है।

    “गाइड” – एक टर्निंग पॉइंट :

    देवानंद ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी नवकेतन फिल्म्स के तहत “गाइड” बनाई, जो आर.के. नारायण के उपन्यास द गाइड पर आधारित थी। यह फिल्म उनके लिए एक बड़ा जोखिम थी, क्योंकि यह उस दौर की पारंपरिक बॉलीवुड फिल्मों से अलग थी। इसमें एक गाइड (राजू) की कहानी थी, जो एक विवाहित महिला (रोजी, वहीदा रहमान द्वारा अभिनीत) के साथ प्रेम में पड़ता है और बाद में आध्यात्मिक मोड़ लेता है। इस बोल्ड विषय ने कई लोगों को चौंकाया।

    “गाइड” के दौरान देवानंद की जिंदगी में अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ उनकी नजदीकियां भी चर्चा में रहीं। हालांकि, देवानंद ने अपनी आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ में इसे सिर्फ पेशेवर रिश्ता बताया, लेकिन उस समय उनकी शादीशुदा जिंदगी (उनकी पत्नी कल्पना कार्तिक के साथ) और इन अफवाहों ने उनके जीवन में उथल-पुथल मचाई थी। यह घटना उनके रोमांटिक हीरो वाली छवि को और मजबूत करने वाली थी।

    बता दें कि “गाइड” न सिर्फ व्यावसायिक रूप से हिट रही, बल्कि इसे समीक्षकों ने भी सराहा। फिल्म ने कई पुरस्कार जीते, जिसमें देवानंद को फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और वहीदा को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। यह पहली बार था जब देवानंद ने एक गंभीर, जटिल किरदार निभाया, जिसने उनके अभिनय की गहराई को दुनिया के सामने लाया।

    देवानंद ने किया था जीनत अमान को लॉन्च:

    उनकी फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा (1971) में उन्होंने जीनत अमान को लॉन्च किया, जो बॉलीवुड की एक बड़ी स्टार बनीं। इस फिल्म में हिप्पी कल्चर को दिखाना और “दम मारो दम” गाना उस समय क्रांतिकारी था। यह उनके करियर की एक और बड़ी घटना थी।

    देवानंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को हुआ था, और वे स्वतंत्रता संग्राम के दौर से प्रभावित थे। उनकी पहली फिल्म हम एक हैं (1946) में देशभक्ति का संदेश था, जो उनके शुरुआती जीवन की सोच को दर्शाता है।

    उनके भाई चेतन आनंद और विजय आनंद के साथ उनके रिश्ते और बाद में मतभेद भी उनके जीवन की बड़ी घटनाएं थीं। खासकर विजय आनंद ने उनकी कई हिट फिल्मों का निर्देशन किया, लेकिन बाद में दोनों के रास्ते अलग हो गए।

    कभी नहीं किया बिग बी के साथ काम :

    देवानंद और अमिताभ बच्चन ने एक साथ कोई फिल्म में मुख्य भूमिका नहीं निभाई है। दोनों उस दौर के बड़े सितारे थे, लेकिन उनकी जोड़ी किसी फिल्म में साथ नहीं आई। इसका एक कारण यह हो सकता है कि दोनों की अभिनय शैली और छवि काफी अलग थी। देवानंद रोमांटिक और ऊर्जावान हीरो के रूप में मशहूर थे, जबकि अमिताभ बच्चन 70 के दशक में “एंग्री यंग मैन” के रूप में उभरे। इसके अलावा, दोनों के करियर के चरम काल में समय का अंतर भी था।
    हालांकि, एक फिल्म है जिसमें दोनों का नाम जुड़ा, लेकिन वह एक अप्रत्यक्ष संदर्भ में है:

    फिल्म: “देस परदेस” (1978)

    कनेक्शन: यह फिल्म देवानंद ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी नवकेतन फिल्म्स के तहत बनाई थी और इसके निर्देशक उनके भाई चेतन आनंद थे। इसमें अमिताभ बच्चन ने एक छोटा सा कैमियो (guest appearance) किया था। यह कैमियो बहुत संक्षिप्त था और दोनों के बीच कोई सीन साथ में नहीं था। यह फिल्म प्रवासी भारतीयों के जीवन पर आधारित थी, और अमिताभ का कैमियो उनके स्टारडम को भुनाने के लिए शामिल किया गया था।

    बता दें कि देवानंद ने अपनी आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ में अमिताभ बच्चन की तारीफ की थी और उन्हें एक शानदार अभिनेता माना था। दोनों के बीच एक personally सम्मान था, लेकिन स्क्रीन पर उनकी जोड़ी नहीं बनी। ऐसा कहा जाता है कि अगर दोनों साथ काम करते, तो यह बॉलीवुड के लिए एक ऐतिहासिक जोड़ी हो सकती थी, क्योंकि दोनों अपने-अपने दौर के सुपरस्टार थे।

    जब अभिनेत्रियों ने बहन बनने से कर दिया था इंकार :

    देव आनंद अपने रोमांटिक और स्टाइलिश अंदाज के लिए जाने जाते थे। उनकी फिल्मों में उनके साथ काम करने वाली अभिनेत्रियों के साथ उनकी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री हमेशा चर्चा में रहती थी। हालांकि, एक दिलचस्प किस्सा उनकी फिल्म “हरे रामा हरे कृष्णा” (1971) से जुड़ा है, जिसमें एक प्रमुख अभिनेत्री ने उनकी बहन का किरदार निभाने से इंकार कर दिया था।

     

    Dev Anand and Mumtaz

    यह फिल्म देव आनंद के करियर की एक महत्वपूर्ण फिल्म थी, जिसमें उन्होंने न केवल अभिनय किया बल्कि इसे निर्देशित भी किया। फिल्म की कहानी एक भाई-बहन के रिश्ते पर आधारित थी, जहां देव आनंद ने जसबीर “जैज़” का किरदार निभाया, जो अपनी बिछड़ी बहन जेनिस (जो बाद में हिप्पी संस्कृति में शामिल हो जाती है) को ढूंढता है। इस बहन के किरदार के लिए पहले मुमताज को चुना गया था। मुमताज उस समय एक सफल और लोकप्रिय अभिनेत्री थीं, जिन्होंने कई हिट फिल्मों में लीड रोल निभाए थे।

    लेकिन मुमताज ने इस रोल को ठुकरा दिया। इसका कारण था कि वे देव आनंद के साथ रोमांटिक लीड रोल में काम करना चाहती थीं, न कि उनकी बहन का किरदार निभाना। मुमताज ने कथित तौर पर कहा था, “मैं आपकी बहन नहीं बनूंगी।” उस समय मुमताज का करियर चरम पर था, और वे अपनी छवि को एक ग्लैमरस हीरोइन के रूप में बनाए रखना चाहती थीं। बहन का किरदार निभाने से उनकी यह छवि प्रभावित हो सकती थी। इसके बजाय, मुमताज ने फिल्म में देव आनंद की पत्नी का किरदार निभाया।

    इसके बाद जीनत अमान को जेनिस का किरदार ऑफर हुआ। जीनत उस समय इंडस्ट्री में नई थीं और इस रोल को स्वीकार करने में उन्हें कोई हिचक नहीं हुई। फिल्म में जीनत ने अपने अभिनय और खासकर “दम मारो दम” गाने से रातोंरात सुर्खियां बटोरीं और स्टार बन गईं। इस रोल ने उनके करियर को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, जबकि मुमताज का स्टारडम धीरे-धीरे कम होने लगा।

    यह घटना बॉलीवुड के इतिहास में एक यादगार किस्सा बन गई, जो बताती है कि कैसे एक अभिनेत्री के फैसले ने न केवल उनके करियर को प्रभावित किया, बल्कि एक नई अभिनेत्री के लिए अवसर भी खोल दिया।

    • प्रस्तुति : सुशील कुमार 

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