भारतीय रहन सहन को प्रभावित करने वाले पश्चिमी तौर तरीकों में लिव इन यानी सह जीवन अब काफी प्रमुख हो गया है। इसके पीछे यौन उन्मुक्तता और आजादी से रहने के अधिकारों का तर्क दिया जाता है। हालांकि इसे किसी भी आधार पर आदर्श नहीं माना जा सकता और इसका खोखलापन भी लगातार सामने आता जा रहा है लेकिन नई पीढ़ी आधुनिकता के नशे में इसकी दीवानी हो चुकी है।
विवाह परंपरा को निभाते हुए स्त्री-पुरुष के दांपत्य संबंध का आज भी कोई विकल्प नहीं है। इसीलिए पश्चिमी देशों सहित सभी सभ्य समाजों में इसका पालन होता है। अब परंपराओं को तोड़ना भी आज का फैशन बन चुका है। तो लिव इन अपने चहेतों में स्वीकार्यता पाता जा रहा है। अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी कहा है कि लिव इन संबंधों की अवधारणा भारतीय मध्यमवर्गीय समाज में स्थापित मूल्यों के विपरीत है। उसका साफ कहना है कि लिव इन संबंध महिलाओं को अधिक अनुपात में नुकसान पहुंचाते हैं। पुरुष ऐसे रिश्ते खत्म होने के बाद आगे बढ़ सकते हैं लेकिन महिलाओं के लिए ब्रेकअप के बाद जीवन साथी ढूंढना मुश्किल होता है।
कोर्ट ने इस बात को भी उठाया है कि ऐसे संबंधों की अवधारणा ने युवा पीढ़ी को काफी आकर्षित किया है लेकिन इसके दुष्परिणाम भी ऐसे मामलों में देखे जा रहे हैं। कोर्ट का यह कथन इसलिए ध्यान देने योग्य है कि ऐसे रिश्ते में रहने वाली महिलाओं को आगे चलकर छोड़ देने और उनकी हत्या कर देने तक की घटनाओं में हाल के दिनों में काफी बढ़ोतरी हुई है।
दिल्ली का जघन्य श्रद्धा वाल्कर हत्याकांड इसी की नजीर है। अन्य शहरों में भी ऐसे रिश्तों में रह रही महिलाओं-लड़कियों का अकल्पनीय अंजाम सामने आ चुका है जिनमें इस चलन के केंद्र माने जाने वाले मुंबई, कोलकाता और हैदराबाद जैसे शहरों के युवक-युवतियां भी हैं। ऐसे में यह बात नई पीढ़ी को ही सोचनी होगी कि जिस आधुनिकता की अंधी दौड़ में वे ऐसे बेमतलब कदम उठा रहे हैं, उसका हकीकत में क्या अर्थ और फायदा है। यह उन लोगों के लिए तो ठीक हो सकता है जो मर्यादा में विश्वास नहीं रखते हैं लेकिन मूल्यों की तनिक भी परवाह है तो ऐसे रिश्ते आगे चलकर सफल नहीं ही होंगे।







