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    Home»राजनीति

    दशरथ मांझी के परिवार की सुध

    ShagunBy ShagunJuly 22, 2025 राजनीति No Comments4 Mins Read
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    दशरथ मांझी, जिन्हें ‘माउंटेन मैन’ के नाम से जाना जाता है, ने 22 वर्षों तक अकेले पहाड़ काटकर अपने गांव गहलौर को दुनिया से जोड़ने का असंभव कार्य संभव कर दिखाया। उनकी यह कहानी साहस, समर्पण और मानवीय जज्बे की मिसाल है, जिसने न केवल बिहार बल्कि पूरे देश को प्रेरित किया। उनकी जिंदगी पर बनी फिल्म ‘माउंटेन मैन’ ने भी खूब सुर्खियां बटोरीं, लेकिन विडंबना यह रही कि उनके परिवार की बदहाली पर किसी का ध्यान नहीं गया। दशरथ मांझी के निधन के बाद उनका परिवार कच्चे मकान में रहने को मजबूर था, और कई नेताओं व मंत्रियों के दौरे के बावजूद उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया।

    हाल ही में, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने गहलौर गांव का दौरा किया और दशरथ मांझी के बेटे भगीरथ मांझी व उनके परिवार से मुलाकात की। इस मुलाकात के कुछ ही दिनों बाद, बिना किसी शोर-शराबे के, उनके लिए एक पक्का मकान बनवाने का कार्य शुरू हो गया। चार कमरों, एक हॉल, किचन और बाथरूम के साथ यह मकान मांझी परिवार की जिंदगी में एक नया अध्याय जोड़ने वाला है। भगीरथ मांझी ने स्वयं कहा कि यह उनके लिए एक असंभव सपने जैसा है, जिसे राहुल गांधी ने बिना प्रचार के साकार कर दिखाया।

    इसी तरह, राहुल गांधी का एक और मानवीय कदम हाल में चर्चा में रहा। सुल्तानपुर के एक दौरे के दौरान, उन्होंने सड़क किनारे बैठे एक मोची से मुलाकात की और उनकी समस्याओं को सुना। इसके बाद, उन्होंने उस मोची को सिलाई मशीनें और अन्य आवश्यक उपकरण भेंट किए, ताकि वह अपने काम को बेहतर तरीके से कर सके और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सके। यह छोटा सा कदम भी उनकी जमीन से जुड़ी सोच को दर्शाता है, जो उपेक्षित वर्गों के प्रति उनकी सहानुभूति को रेखांकित करता है। इन दोनों घटनाओं से राहुल गांधी की वह छवि उभरती है, जो सामान्य लोगों के दर्द को समझने और उसे दूर करने की कोशिश करती है।

    यह कदम निस्संदेह प्रशंसनीय है। दशरथ मांझी के परिवार की उपेक्षा, जो वर्षों से विभिन्न सरकारों और नेताओं की उदासीनता का शिकार थी, को राहुल गांधी ने गंभीरता से लिया। बिना किसी तामझाम के, उनकी टीम ने गांव पहुंचकर सर्वे किया और निर्माण कार्य शुरू करवाया। यह मानवीय संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का परिचायक है, जो आज की राजनीति में दुर्लभ है।

    हालांकि, इस नेक कार्य पर भी आलोचनाओं का साया पड़ गया। कुछ लोगों ने इसे बिहार विधानसभा चुनाव से जोड़कर छवि चमकाने की रणनीति करार दिया। यह सच है कि राहुल गांधी की बिहार में लगातार सक्रियता, ‘संविधान बचाओ’ सम्मेलनों में उनकी भागीदारी और स्थानीय मुद्दों पर उनकी मुखरता आगामी चुनावों में कांग्रेस की स्थिति मजबूत करने की कोशिश का हिस्सा हो सकती है। फिर भी, क्या हर सकारात्मक कदम को सिर्फ राजनीतिक चश्मे से देखना उचित है? दशरथ मांझी के परिवार की स्थिति को सुधारने का यह प्रयास, भले ही इसमें राजनीतिक मंशा शामिल हो, एक परिवार की जिंदगी में वास्तविक बदलाव ला रहा है।

    आलोचकों का यह कहना कि यह सब ‘चुनावी खेल’ है, उस बड़े सवाल को अनदेखा करता है कि पहले क्यों किसी ने इस परिवार की सुध नहीं ली? बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मांझी को सम्मानित किया, स्मारक बनवाए, सड़क का नामकरण किया, लेकिन उनके परिवार की मूलभूत जरूरतें जिसमें एक पक्का मकान जैसी बुनियादी जरुरत क्यों पूरी नहीं हुईं? क्या यह नहीं दर्शाता कि व्यवस्था में कहीं न कहीं संवेदनशीलता की कमी रही है?

    राहुल गांधी का यह कदम, चाहे राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो या नहीं, एक उपेक्षित परिवार को सम्मान और सुविधा देने का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि नेतृत्व का असली मोल तब है, जब वह जमीन पर बदलाव लाए। लेकिन यह भी सवाल उठता है कि क्या ऐसे कार्य सिर्फ चुनावी मौसम में ही होंगे? दशरथ मांझी जैसे नायकों की विरासत को सही मायने में सम्मान देने के लिए जरूरी है कि उनके परिवार और समुदाय की बेहतरी के लिए दीर्घकालिक प्रयास हों, न कि केवल तात्कालिक कदम। अंत में, यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम नेताओं के हर कार्य को सिर्फ वोट की राजनीति से जोड़कर देखेंगे, या उसमें छिपी मानवीय संवेदना को भी स्वीकार करेंगे? दशरथ मांझी के परिवार का नया घर न केवल ईंट-गारे की संरचना है, बल्कि यह एक उम्मीद है—उम्मीद कि सच्चा सम्मान और बदलाव संभव है, बशर्ते इच्छाशक्ति हो।

    Shagun

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