झालावाड़ जिले के मनोहर थाना ब्लॉक की पीपलोदी स्कूल में हुए दिल दहला देने वाले हादसे ने न केवल आठ मासूम बच्चों की जान ले ली, बल्कि पूरे सिस्टम की पोल भी खोल दी। यह हादसा नहीं, बल्कि प्रशासन और सरकार की घोर लापरवाही का परिणाम है, जिसे एक वरिष्ठ पत्रकार ने सटीक रूप से “सामूहिक हत्या” करार दिया। स्कूल, जो बच्चों के भविष्य को संवारने का मंदिर होना चाहिए, वहां अगर छत गिरने से मासूमों की जान चली जाए, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हमारा सिस्टम बच्चों की सुरक्षा की गारंटी लेने में पूरी तरह विफल हो चुका है?
यह घटना सिर्फ एक त्रासदी नहीं, बल्कि उस गहरी सड़ांध का सबूत है जो हमारे प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र में व्याप्त है। स्कूल की जर्जर इमारतें, रखरखाव का अभाव और सरकारी उदासीनता, ये सभी इस हादसे के लिए जिम्मेदार हैं।

वरिष्ठ पत्रकार @dibang ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच पर सही कहा कि सरकारें आम इंसान को कीड़े-मकोड़े समझती हैं। शिक्षा के प्रति यह उपेक्षा इसलिए भी है, क्योंकि अनपढ़ जनता सवाल नहीं उठाती, और अनपढ़ जनता ही सत्ताधारी दलों के लिए वोट बैंक बनती है। स्कूलों की बदहाली, बंद होते स्कूल और गिरती छतें, यह सब उस सोची-समझी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है, जो जनता को अज्ञानता के अंधेरे में रखना चाहती है।
इस हादसे ने कई परिवारों को असहनीय दर्द दिया। एक बीमार पिता का अपनी बेटी और बेटे के अंतिम संस्कार के दौरान रो-रोकर बुरा हाल होना किसी भी संवेदनशील इंसान का दिल दहला देता है। “हमें अकेला छोड़ गए बेटा-बेटी” जैसे शब्द सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि सिस्टम के प्रति गुस्से और अविश्वास को भी दर्शाते हैं। यह घटना केवल आंकड़ों में दर्ज होने वाली त्रासदी नहीं, बल्कि उन माता-पिताओं की जिंदगी का वह काला अध्याय है, जिनके घर की रोशनी हमेशा के लिए बुझ गई।सवाल यह है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है? क्या केवल स्थानीय प्रशासन को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ सकते हैं? यह हादसा राजस्थान सरकार, शिक्षा विभाग, और उन तमाम नीति-निर्माताओं पर सवाल उठाता है, जो स्कूलों की बदहाली को नजरअंदाज करते हैं। क्या बच्चों की जान की कीमत इतनी सस्ती है कि इसे केवल मुआवजे और जांच समितियों के हवाले कर दिया जाए?
यह वक्त केवल शोक जताने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। सरकार को चाहिए कि स्कूलों की इमारतों का तत्काल सर्वे कराए, जर्जर भवनों की मरम्मत करे, और भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए। अगर सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं आएगी, तो यह हादसा आखिरी नहीं होगा। जनता को भी जागरूक होकर अपने हक के लिए आवाज उठानी होगी, क्योंकि सवाल पूछने वाली जनता ही सिस्टम को सुधारने के लिए मजबूर कर सकती है। झालावाड़ की यह घटना एक चेतावनी है या तो हम अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करें, या फिर ऐसी त्रासदियों को बार-बार झेलने के लिए तैयार रहें। सिस्टम को बदलने की जिम्मेदारी अब हम सबकी है।







