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    Home»festival

    प्रकृति और एकता का प्रतीक है छठ का व्रत

    ShagunBy ShagunOctober 27, 2025 festival No Comments6 Mins Read
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    स्वाती सिंह

    पूजा व्यक्ति को आस्थावान बनाती है। आस्था से व्यक्ति आशावान बनता है और आशावन व्यक्ति में हमेशा जीवन की जीविविषा बनी रहती है। यदि कुछ अशुभ भी हुआ तो उसे वह पूर्व जन्म का फल मानकर अपने आगे का राह आसान करने के लिए कर्म करने लगता है। इसी तरह पर्व में सामूहिकता झलकती है। उससे व्यक्ति अपनी पुरानी दुश्मनी भूलकर एक साथ हो जाता है। इससे जीवन आसान होता है। आज जमाना चाहे जितना बदला हो, लेकिन ममत्व नहीं बदला है। आज भी माता चाहे जितना कठिन काम हो, यदि उससे उसके बच्चे का कल्याण होगा तो उसे करने से वह परहेज नहीं कर सकती। वह अपने लिए भले न कुछ करे, लेकिन बच्चे के लिए सबकुछ करने का साहस रखती है। यही कारण है कि हर मां अपने पुत्र में सूर्य जैसा तेज बनाये रखने के लिए सूर्य की जटिल उपासना से नहीं हिचकती। छठ व्रत को रखकर वह सूर्य को मनाने की हर कोशिश करती है। वह भी अपने लिये नहीं, अपने पुत्र के लिए।

    इन पर्वों में एक महापर्व है छठ। अपने बच्चों की कामना के लिए रखा जाने वाल यह कठिन व्रत सामूहिकता तो दर्शाता ही है। यह इस बात का प्रतीक भी है कि यहां कोई ऊंच-नीच नहीं होता। हिंदू धर्म की समानता की भावना का सबसे बड़ा उदाहरण है, जो हमारे यहां सदियों से चला आ रहा है।

    कहीं भी घाटों पर चले जाइए, वहां कोई बिरादरी नहीं पूछता। किसी को प्रसाद दीजिए वह श्रद्धा के साथ ग्रहण करता है। यह व्रत ममता को भी दर्शाता है। चार दिनों तक घर में माहौल भक्तिमय बनाये रखता है। हां, छठ को किसी एक प्रदेश से जोड़कर देखना भी गलत है। अब यह एक प्रदेश या एक देश का त्योहार नहीं रह गया है। यह कई देशों तक पहुंचा त्योहार श्रद्धा के केंद्र में बन गया है।

    शास्त्र की जटिलताओं से मुक्त

    प्रकृति की पूजा के इस महापर्व को शास्त्र की जटिलताओं से मुक्त कर दिया गया है। इस पर्व में सर्वजन को यह अधिकार होता है कि वह स्वयं अपना पुरोहित बनें। इसलिए इस पर्व का व्रती स्वयं साधक तथा स्वयं पुरोहित भी होता है। शायद छठ मां की ही ऐसी पूजा है, जिनका कहीं भी मंदिर नहीं मिलेगा। ये सिर्फ छठ तक ही सीमित रहता है। इस कारण व्रती के मन और आत्मा को ही छठ मां का प्रतीक भी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि व्रती के शरीर में छठ मां बैठती हैं। इसी कारण बहुत लोग घाटों पर जाकर व्रतियों को प्रणाम करते हैं।

    भारतीय संस्कृति में सूर्य ऊर्जा का अक्ष्य स्रोत

    भारतीय संस्कृति में सूर्य को ऊर्जा का अक्षय स्रोत माना गया है। अतः भारत में वैदिक काल से ही सूर्योपासना व्यापक रूप से प्रचलित रही है। बिहार में सूर्योपासना ” छठ ” व्रत के रूप में की जाती है। ‘ छठ ‘ शब्द संस्कृत के ‘ षष्ठ ‘ शब्द का तद्भव रूप है। व्रत में संकल्प के साथ नियमावली होती है, जिसका पालन करना बहुत ही जरूरी होता है। साधारणत: उपवास में अन्न का त्याग होता है तथा परमात्मा का चिन्तन होता है। इस दृष्टि से व्रत एवं उपवास दोनों का समन्वित रूप छठ पर्व है।

    सूर्य की छह अप्रतिम शक्तियों से बनीं छठी मइया

    सूर्य की रश्मियों में छह अप्रतिम शक्तियां विद्यमान हैं – दहनी , पचनी , धूम्रा , कर्षिणी , वर्षिनी तथा रसा अर्थात् जलने वाली , पाचन क्रिया करने वाली लोहित करने वाली , आकर्षण करने वाली , वर्षा करने वाली और रस प्रदान करने वाली। भगवान सूर्य की ये छ: शक्तियां ही ” छठी मैया ” कहलाती हैं।

    प्रकृति की शुद्धता बनाने पर जोर

    चार दिन तक चलने वाले छठ पर्व पर शुद्धता, स्वच्छता का विशेष ख्याल रखा जाता है। छठ षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। षष्ठी तिथि स्त्रीलिंग है। अतः यह ” छठी मैया ” के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह लोक-पर्व स्वच्छता को पवित्रता तक ले जाने में सहायक होती है। स्नान से शरीर-शुद्धि की और ध्यान से अंतःकरण की पवित्रता से व्रत का आरंभ होता है। ” नहाय – खाय ” यह संदेश देता है कि भोजन के पहले शरीर शुद्धि बहुत ही जरूरी है । दूसरे दिन खीर खाकर अपने उपवास को संबलता प्रदान करते हैं। इसे ‘ खरना ‘ कहा जाता है। तीसरे दिन षष्ठी तिथि को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देकर सप्तमी के सूर्योदय की प्रतीक्षा करते हैं। एक तरह से पुनर्जन्म के गूढ़ सिद्धांत को बड़े ही सरल ढंग से प्रकट करते हैं।

    सामूहिकता को दर्शाता है

    विष्णु धर्मेत्तर के इस श्लोक “उदिते दैवतं भानौ पित्र्यं चास्तमिते रवौ।“ अर्थात् देव-कार्यों में सूर्योदय की तिथि और पितृ-कार्यों में सूर्य के अस्त की तिथि उपयोगी होती है। छठ-पर्व एकमात्र ऐसा पर्व है जहां देव-कार्य एवं पितृ-कार्य दोनों श्रद्धा से संपन्न होते हैं।“ का उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि यह प्रकृति के साथ ही लोगों को सामूहिकता को दर्शाता है।

    छह कृतिकाएं ही षष्ठी माता कहलाती हैं

    शिव पुराण के रूद्र संहिता के अनुसार भगवान शिव के तेज से छ: मुख वाले बालक का जन्म हुआ , जिसका पालन-पोषण छ: कृतिकाओं ( तपस्विनी नारियों ) ने किया था , जिससे यह बालक कार्तिकेय नाम से विख्यात हुआ। ये छ: कृतिकायें ही षष्ठी माता या छठी मैया कहलाती हैं।

    कर्ण भी अर्घ्य देता था

    सूर्यपुत्र कर्ण घंटों तक कमर तक जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देता था। आज भी यही पद्धति हम सभी छठ पर्व में अपनाते हैं। इस व्रत को सर्वप्रथम च्वयन मुनि की पत्नी सुकन्या ने अपने जरा-जीर्ण अंधे पति की आरोग्यता के लिए किया था। इस व्रत से उनके पति युवा हुए तथा उन्हें नेत्र प्राप्त हुआ था। भगवान राम का जन्म सूर्यवंश में हुआ था। ऋषि अगस्त्य ने लंकापति रावण को परास्त करने के लिए भगवान राम को ” आदित्य हृदय स्तोत्र ” का पाठ बताया था , जो सूर्य – उपासना का एक उच्चस्तरीय प्रयोग था।

    भगवान राम व सीता ने भी की थी सूर्य देव की उपासना

    एक दूसरे उद्धरण में मिलता है कि भगवान राम एवं भगवती सीता ने राम राज्य की स्थापना के दिन अर्थात् कार्तिक शुक्ल षष्ठी को ही उपवास कर सूर्य देव की आराधना की थी। भगवान श्री कृष्ण के पुत्र सांब के कुष्ठ रोग का उपचार सूर्य उपासना द्वारा हुआ था। छांदोग्य उपनिषद में सूर्य के माध्यम से पुत्र-प्राप्ति की बात कही गई है। माता कुंती से कर्ण का जन्म सूर्य भगवान के मानवीकरण को दर्शाता है।

    द्रोपदी ने भी रखा था षष्ठी माता का व्रत

    पांडवों के वनवास के दौरान अन्न की कमी से बचने के लिए धौम्य ऋषि ने युधिष्ठिर को अष्टोत्तर-शतनाम सूर्य स्तोत्र ( सूर्य के १०८नाम ) दिया था तथा सूर्य की उपासना करने का परामर्श दिया था। इस उपासना से भगवान भास्कर ने प्रकट होकर एक ताम्रपत्र दिया और कहा कि जब तक रानी द्रोपदी इस पात्र में भोजन नहीं करेगी , तब तक इस में स्थित भोज्य-पदार्थों की कमी नहीं होगी। इसके पश्चात् द्रौपदी षष्ठी-तिथि को उपवास करने लगी। फलस्वरूप पांडवों को उनका खोया हुआ राजपाट वापस मिल गया था।
    (लेखिका- उप्र सरकार में पूर्व मंत्री और भाजपा की वरिष्ठ नेता हैं।)

    #Chhath fast is a symbol of nature and unity.
    Shagun

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