आज भारतवासियों के लिए एक ऐसी खबर आई है जो भारत की सांस्कृतिक आत्मा को वैश्विक पटल पर चमकाने वाली है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने अपनी ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची’ में दीपावली को स्थान देकर न केवल भारत का मान बढ़ाया है, बल्कि इस पावन पर्व को एक जीवंत वैश्विक विरासत का दर्जा प्रदान किया है। यह निर्णय 10 दिसंबर 2025 को दिल्ली के लाल किले में आयोजित 20वीं अंतर सरकारी समिति की बैठक में लिया गया, जहां भारत पहली बार इस महत्वपूर्ण सत्र की मेजबानी कर रहा है। यह मात्र एक समाचार नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की विजय का प्रतीक है अंधकार पर प्रकाश की, अधर्म पर धर्म की, और स्थानीय परंपराओं पर वैश्विक मान्यता की।

दीपावली, जिसे ‘प्रकाश का पर्व’ कहा जाता है, केवल एक त्योहार नहीं है; यह एक जीवन दर्शन है। यह भगवान राम की अयोध्या वापसी का उत्सव है, जो अच्छाई की जीत का संदेश देता है। हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला यह पर्व दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, यूरोप और कैरेबियन तक फैला हुआ है, जहां भारतीय प्रवासी समुदाय इसे अपनी जड़ों से जोड़ते हुए मना रहे हैं। यूनेस्को की मान्यता इसकी सांस्कृतिक गहराई को रेखांकित करती है कि यह सामाजिक बंधनों को मजबूत करता है, पारंपरिक शिल्पों जैसे मिट्टी के दीयों और रंगोली को संरक्षित करता है, और उदारता, कल्याण तथा समावेशिता के मूल्यों को पुनर्जीवित करता है। संगठन के अनुसार, अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर ‘परंपरागत, समकालीन और जीवंत’ होती है, जो वैश्वीकरण के दौर में सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने में सहायक है। दीपावली अब भारत की 16वीं ऐसी धरोहर है, जो योग, कुंभ मेला और दुर्गा पूजा के साथ सूची में शामिल हो गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस फैसले पर कहा, “दीपावली हमारी सभ्यता की आत्मा है। यह प्रकाश और धर्म का प्रतीक है। इसकी यूनेस्को सूची में शामिल होने से इसका वैश्विक प्रसार और बढ़ेगा।” उनके शब्दों में निहित उत्साह देश-विदेश के हर भारतीय के मन की भावना को प्रतिबिंबित करता है। संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इसे ‘ऐतिहासिक गौरव का क्षण’ करार दिया, जो भारतीय डायस्पोरा की भूमिका को भी रेखांकित करता है। यह मान्यता केवल उत्सव की चमक-दमक को नहीं, बल्कि इसके सतत विकास लक्ष्यों जैसे आजीविका उन्नयन, लैंगिक समानता, सांस्कृतिक शिक्षा और सामुदायिक कल्याण से जुड़ाव को भी प्रमाणित करती है।

हालांकि, यह उपलब्धि हमें विचार करने पर विवश करती है। वैश्विक पटल पर दीपावली की चमक बढ़ने के साथ, क्या हम अपनी परंपराओं को आधुनिक चुनौतियों से जोड़ पा रहे हैं? पर्यावरण प्रदूषण, पटाखों का अंधाधुंध उपयोग और व्यावसायीकरण जैसी समस्याएं इस पर्व की शुद्धता को प्रभावित कर रही हैं। यूनेस्को की सूची में शामिल होने से न केवल संरक्षण की जिम्मेदारी बढ़ती है, बल्कि हमें सतत उत्सव की दिशा में सोचने का अवसर भी मिलता है जैसे पर्यावरण-अनुकूल दीये, जैविक रंग और सामुदायिक भागीदारी। भारत सरकार की ओर से 2025-26 चक्र में नामांकन एक दूरदर्शी कदम था, जो सांस्कृतिक नीति संवाद का केंद्र बनने की हमारी क्षमता को दर्शाता है।
अंत में, दीपावली की यह मान्यता हमें याद दिलाती है कि सच्ची विरासत दीवारों या वस्तुओं में नहीं, बल्कि जीवंत परंपराओं और मानवीय मूल्यों में बसती है। लाल किले की प्राचीर से निकला यह संदेश विश्व को बताता है कि भारत की सांस्कृतिक ज्योति न केवल अपने देश को, बल्कि पूरी मानवता को आलोकित करने का संकल्प रखती है। आइए, इस गौरव का उत्सव मनाएं और वचन लें कि अगली दीपावली और भी उज्ज्वल हो, प्रकाश से, प्रेम से, और संरक्षण की भावना से। जय हिंद!







