एक अनदेखी त्रासदी का आईना
अरुणाचल प्रदेश के अंजू जिले की घुमावदार सड़कें, जो भारत-चीन सीमा की रक्षा रेखा पर बसी हैं, आज फिर एक दिल दहला देने वाली त्रासदी का गवाह बनीं। 8 दिसंबर की रात को हयुलियांग-चगलगम मार्ग पर एक मिनी ट्रक, जिसमें 22 असम के तिनसुकिया जिले के दिहाड़ी मजदूर सवार थे, करीब 200 मीटर गहरी खाई में समा गया। अब तक 17 शव बरामद हो चुके हैं, चार लापता हैं, और एक मात्र जीवित बचे बुधेश्वर दीप ने चमत्कारिक रूप से 200 मीटर ऊंचाई चढ़कर मदद मांगी। यह हादसा न केवल एक सड़क दुर्घटना है, बल्कि उन अनगिनत मजदूरों की जिंदगी का प्रतीक है, जो विकास के नाम पर सीमांत की दुर्गम राहों पर अपनी जान जोखिम में डालते हैं।
यह घटना महज संयोग नहीं, बल्कि एक लंबे सिलसिले का हिस्सा है। अरुणाचल की ये सड़कें जो बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) द्वारा बनाई गई हैं , रणनीतिक महत्व की हैं। वे देश की सुरक्षा को मजबूत करती हैं, लेकिन इन्हीं सड़कों पर हर साल सैकड़ों मजदूर अपनी जान गंवा देते हैं। आंकड़े बताते हैं कि पूर्वोत्तर भारत में सड़क हादसों में 40% से अधिक मौतें दुर्गम इलाकों में होती हैं, जहां कर्व्स तीखे, रखरखाव कमजोर, और मौसम कठोर होता है।
इन मजदूरों को चगलगम में एक हॉस्टल निर्माण का ठेका मिला था, एक मामूली काम, जो उनकी जिंदगी का आधार था। लेकिन ओवरलोडेड ट्रक, अंधेरी रात, और खराब सड़क ने सब कुछ छीन लिया। देरी से सूचना मिलना तो और भी दर्दनाक है; दो दिनों तक खाई में सन्नाटा पसरा रहा, जब तक एक घायल मजदूर ने हयुलियांग के जीआरईएफ कैंप तक 4 किलोमीटर पैदल तय नहीं किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक व्यक्त करते हुए पीएमएनआरएफ से प्रत्येक मृतक के परिवार को 2 लाख रुपये की सहायता की घोषणा की है।

राहुल गांधी ने इसे “दुखद” बताया, मल्लिकार्जुन खड़गे ने उचित मुआवजे की मांग की, और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने पड़ोसी राज्य के साथ समन्वय का आश्वासन दिया।
अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने एनडीआरएफ और सेना की टीमों को तैनात किया है, जो आज सुबह से शवों को निकालने में जुटे हैं। लेकिन ये संवेदनाएं पर्याप्त नहीं। एकमात्र जीवित बचे बुधेश्वर को डिब्रूगढ़ मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया है, लेकिन उनके जैसे हजारों मजदूरों के लिए सुरक्षा जाल कहां है?
यह त्रासदी गरीब मजदूर की जिंदगी की कड़वी सच्चाई को उजागर करती है। वे विकास के इंजन हैं सीमांत पर सड़कें बनाते हैं, पुल जोड़ते हैं, लेकिन खुद के लिए एक सुरक्षित रास्ता तक नहीं पाते। ओवरलोडिंग, पुराने वाहन, और अप्रशिक्षित चालक ये सामान्य कमियां हैं, जो बार-बार दोहराई जाती हैं। सरकारें बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर पर अरबों खर्च करती हैं, लेकिन मजदूरों के लिए बीमा, हेलमेट, या सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था क्यों लापरवाही का शिकार बन जाती है?
पूर्वोत्तर के इन दुर्गम इलाकों में हेलीकॉप्टर रेस्क्यू या सैटेलाइट ट्रैकिंग जैसी तकनीकें क्यों नहीं पहुंच पातीं? और सबसे बड़ा सवाल: क्या ये मजदूर सिर्फ आंकड़ों में सिमट जाएंगे, या उनकी मौत पर कोई ठोस नीति बनेगी?
समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर एक “सीमांत मजदूर सुरक्षा अभियान” शुरू करें। इसमें अनिवार्य बीमा, वाहनों का नियमित निरीक्षण, और तत्काल रेस्क्यू यूनिट्स शामिल हों। असम और अरुणाचल जैसे राज्यों के बीच श्रमिक प्रवास के लिए समन्वित नीति बने, ताकि ये “अनजान” यात्राएं घातक न साबित हों। अन्यथा, ये खाइयां न केवल सीमा की रक्षा करेंगी, बल्कि हमारी लापरवाही का भी साक्ष्य बनेंगी।
ये 17-21 जिंदगियां खो चुकी हैं, लेकिन उनकी कहानी हमें जगाने का संकेत है। शोक के साथ, कार्रवाई की मांग भी करनी होगी – क्योंकि अगला ट्रक किसी और खाई में न गिरे, इसके लिए।







