दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शुमार अरावली इन दिनों सुर्खियों में है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में एक जेसीबी ऑपरेटर भावुक अपील करता दिख रहा है वह और उसके साथी अरावली की पहाड़ियों को खोदने से इनकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह हमारी धरोहर है, इसे बचाना हमारा कर्तव्य है। इस वीडियो ने “अरावली बचाओ” अभियान को नई गति दी है, जो अब पूरे देश में फैल चुका है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली की नई परिभाषा स्वीकार की है। इसके तहत केवल 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली भूमिरूप ही “अरावली हिल” माने जाएंगे, और दो ऐसी पहाड़ियां 500 मीटर के दायरे में हों तो “अरावली रेंज”। पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे 90% से अधिक अरावली क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाएगा, जिससे खनन और निर्माण आसान हो सकता है। वे इसे “डेथ वारंट” बता रहे हैं, क्योंकि अरावली थार मरुस्थल के विस्तार को रोकती है, भूजल रिचार्ज करती है और दिल्ली-एनसीआर की हवा को प्रदूषण से बचाती है।

वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें – https://x.com/i/status/2002579579433857147
दूसरी ओर, सरकार और कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि नई परिभाषा वैज्ञानिक है और संरक्षण को मजबूत बनाएगी। नई माइनिंग लीज पर रोक है, और सस्टेनेबल माइनिंग के लिए प्लान बनाया जा रहा है। अवैध खनन पर सख्ती जारी है। लेकिन जनता की एकता देखते ही बनती है। जेसीबी ऑपरेटरों का असहयोग, सोशल मीडिया पर #SaveAravalli ट्रेंड, और स्थानीय लोगों का संकल्प, सब मिलकर कह रहे हैं कि अरावली सिर्फ पत्थर नहीं, हमारी सांसें हैं। रौशनी मीणा जैसी बेटियां इसे अपनी मिट्टी और अस्तित्व का आधार बताती हैं।
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अरावली का मामला कोर्ट में है, लेकिन जन जागरण अब चरम पर। कैसे भी करके इसे बचाना होगा, क्योंकि अगर अरावली नहीं बची, तो उत्तर भारत की जलवायु, पानी और जैव विविधता खतरे में पड़ जाएगी। यह अभियान सिर्फ पर्यावरण का नहीं, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है।






