सुशील कुमार
हमारा देश हजारों वर्षों से वनों, पर्वतों और नदियों की गोद में पला-बढ़ा है। ये सिर्फ भूगोल नहीं ये हमारी सभ्यता की जड़ें हैं। रामायण-महाभारत से पहले भी ये अस्तित्व में थे। गंगा, नर्मदा जैसी नदियाँ आस्था का केंद्र हैं, अरावली जैसी प्राचीन पर्वतमाला रेगिस्तान की दीवार बनी हुई है, और घने वन जीवन का आधार। भारतीय परंपरा में इन्हें पूजने का, बचाने का संकल्प लिया जाता है। लेकिन आज विडंबना यह है कि विकास के नाम पर हम इन्हीं जीवनदायिनी तत्वों को सबसे तेजी से नष्ट कर रहे हैं।
और इस विनाश का सबसे बड़ा हथियार बन गया है खनन माफिया। अवैध रेत खनन, पत्थर खनन और अवैध लकड़ी तस्करी का यह नेटवर्क इतना शक्तिशाली हो चुका है कि कई जगह राज्य सरकारों की नाक के नीचे खुलेआम चलता है।
नदियों का दर्द: रेत माफिया की बेरहमी
गंगा, नर्मदा, यमुना, चंबल, सोन, लगभग हर बड़ी नदी इस समय अवैध रेत खनन की चपेट में है।
- रेत के नाम पर नदी का तल इतना खोदा जा रहा है कि गहरे गड्ढे बन रहे हैं, जिससे नदी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है।
- जलस्तर गिर रहा है, बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है, और मछलियाँ-जलजीव विलुप्त हो रहे हैं।
- 2024-25 में भी कई राज्यों में पुलिस और माफिया के बीच झड़पें हुईं, कुछ मामलों में पुलिसकर्मी भी मारे गए।
- सुप्रीम कोर्ट ने 2024 के अंत में कई राज्यों से अवैध रेत खनन पर आंकड़े मांगे हैं, और जनवरी 2025 में सुनवाई तय की है।
- फिर भी, रात-दिन जेसीबी, ट्रैक्टर और नावें चलती रहती हैं। सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ माफिया की ताकत है, या कहीं राजनीतिक संरक्षण भी शामिल है?
पर्वतों का अंत: अरावली का संकट
देश की सबसे प्राचीन पर्वतमाला अरावली (लगभग 692 किमी लंबी) आज अस्तित्व के संकट में है।
- अवैध खनन से 25% हिस्सा पहले ही नष्ट हो चुका है।
- राजस्थान में 2020-2025 के बीच हजारों FIR दर्ज हुईं, लेकिन ज्यादातर मामलों में कार्रवाई कमजोर रही।
- नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा स्वीकार की (100 मीटर से ऊँचे शिखर), लेकिन साथ ही नई माइनिंग
- लीज पर रोक लगाई और सस्टेनेबल माइनिंग प्लान बनाने का आदेश दिया।
- केंद्र सरकार ने दिसंबर 2025 में स्पष्ट किया. पूरे अरावली में कोई नई माइनिंग लीज नहीं दी जाएगी, और संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार होगा।
- लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ता चिंतित हैं, कई हिस्से अब भी कमजोर हो गए हैं, जिससे थार रेगिस्तान की धूल दिल्ली-NCR तक पहुंच रही है, वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, और भूजल रिचार्ज प्रभावित हो रहा है।

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वनों की चुप्पी: लकड़ी तस्करी जारी
वन क्षेत्र कागजों पर सुरक्षित हैं, लेकिन रात के अंधेरे में सैकड़ों पेड़ कटते हैं। वन्यजीवों की प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं। मानव जीवन पर असर अब साफ दिख रहा है बाढ़, सूखा, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के रूप में।
क्या कोई उम्मीद बाकी है?
सकारात्मक पहलू भी हैं: सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार ने हाल के महीनों में कड़े कदम उठाए हैं, नई लीज पर रोक, सस्टेनेबल प्लान, ड्रोन-जीपीएस निगरानी।
कई राज्यों में विशेष टास्क फोर्स और माइनिंग सर्विलांस सिस्टम सक्रिय हैं।
जागरूक नागरिक, एनजीओ और स्थानीय समुदाय अब आवाज उठा रहे हैं, प्रदर्शन, PIL और सामुदायिक निगरानी बढ़ रही है।
लेकिन समस्या जड़ से खत्म तभी होगी जब:
- राजनीतिक संरक्षण पूरी तरह खत्म हो
- कानून का सख्ती से पालन हो, न कि सिर्फ कागजों पर
- विकास मॉडल में पर्यावरण को पहले स्थान मिले
- आम नागरिक जागरूक हो और स्थानीय स्तर पर निगरानी करे
आखिरकार सवाल यह है कि हम विकास चाहते हैं या विनाश?
अगर हमने अब नहीं संभला, तो आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ रेत के टीले, कटे पर्वत और सूखी नदियाँ मिलेंगी।
वन, पर्वत और नदियाँ हमारी धरोहर हैं, इन्हें निगलने वाले माफिया से बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
क्योंकि जब ये चले जाएँगे, तो हमारा अस्तित्व भी चला जाएगा।







