समाज के रक्षक बनें: बाल यौन शोषण के खिलाफ जागरूकता की पुकार
समाज की नींव बच्चों पर टिकी होती है। वे हमारा भविष्य हैं, हमारी उम्मीदें और सपने। लेकिन जब ये मासूम नन्हे-मुन्ने शोषण, हिंसा और हैवानियत का शिकार बनते हैं, तो पूरा समाज दागदार हो जाता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में पकड़े गए रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती का मामला इसी तरह की एक दिल दहला देने वाली घटना है, जो हमें याद दिलाता है कि राक्षस हमारे बीच ही छिपे हो सकते हैं। पॉक्सो कोर्ट द्वारा इन दोनों को फांसी की सजा सुनाई जाना न्याय की एक मजबूत आवाज है, लेकिन क्या यह काफी है? नहीं, क्योंकि ऐसे अपराधों की जड़ें गहरी हैं और इन्हें उखाड़ फेंकने के लिए पूरे समाज को जागरूक और सतर्क होना पड़ेगा।
यह मामला अक्टूबर 2020 में इंटरपोल के माध्यम से सीबीआई तक पहुंचा, जब एक व्यक्ति ने नन्हें बच्चों के अश्लील वीडियो और फोटो की शिकायत की। जांच में पता चला कि जलकल विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर तैनात रामभवन अपनी पत्नी के साथ मिलकर मासूम बच्चों को बहला-फुसलाकर जाल में फंसाता था। वे बच्चों के साथ घिनौनी हरकतें करते, वीडियो बनाते और इंटरनेट के जरिए विदेशों में बेचते। सीबीआई को मिले 34 वीडियो और 679 फोटो इस हैवानियत की गवाही देते हैं। ऐसे अपराधी न सिर्फ बच्चों की मासूमियत छीनते हैं, बल्कि पूरे समाज की नैतिकता पर धब्बा लगाते हैं। यह घटना हमें बताती है कि बाल यौन शोषण कोई दूर की कहानी नहीं, बल्कि हमारे आस-पास की हकीकत है।
समाज में ऐसे राक्षसों की मौजूदगी कई कारणों से संभव होती है। पहला, जागरूकता की कमी। अभिभावक, शिक्षक और समुदाय अक्सर बच्चों की सुरक्षा को लेकर लापरवाह रहते हैं। बच्चे अनजान लोगों पर भरोसा कर लेते हैं, खासकर जब अपराधी सरकारी पदों पर हों या पड़ोसी बनकर घुल-मिल जाएं। दूसरा, डिजिटल दुनिया का दुरुपयोग। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने पोर्नोग्राफी को आसान बना दिया है, जहां ऐसे वीडियो आसानी से बिकते हैं। तीसरा, कानूनी प्रक्रियाओं में देरी, जो अपराधियों को हौसला देती है। लेकिन पॉक्सो एक्ट जैसे कानूनों की सख्ती से अब न्याय तेजी से मिल रहा है, जैसा इस मामले में हुआ।
हमें क्या करना चाहिए? सबसे पहले, बच्चों को शिक्षित करें। घर-स्कूल में ‘गुड टच-बैड टच’ की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। बच्चे अगर असहज महसूस करें, तो उन्हें खुलकर बोलने का हौसला दें। अभिभावकों को बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए – वे किससे मिलते हैं, ऑनलाइन क्या देखते हैं। समुदाय स्तर पर पड़ोसी, रिश्तेदार और सरकारी कर्मचारियों की निगरानी जरूरी है। अगर कोई संदिग्ध व्यवहार दिखे, तो तुरंत पुलिस या चाइल्ड हेल्पलाइन (1098) पर रिपोर्ट करें। सरकार को भी स्कूलों में जागरूकता अभियान चलाने चाहिए, साथ ही इंटरनेट पर सख्त निगरानी बढ़ानी चाहिए ताकि ऐसे कंटेंट का प्रसार रोका जा सके।
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यह संपादकीय सिर्फ एक घटना की निंदा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। रामभवन जैसे राक्षस समाज में छिपे हैं, लेकिन हमारी सतर्कता उन्हें बेनकाब कर सकती है। न्यायपालिका ने फांसी की सजा देकर संदेश दिया है कि ऐसे अपराधों की कोई माफी नहीं। अब बारी हमारी है – समाज के रक्षक बनें, बच्चों की रक्षा करें। क्योंकि अगर हम चुप रहे, तो कल का शिकार हमारा अपना बच्चा हो सकता है। जागो समाज, सावधान रहो!






