ओम माथुर
अगर देश में रसोई गैस संकट को लेकर लोग विपक्ष की अफवाहों पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं, तो यह तो लोगों का सरकार की विश्वसनीयता पर संदेह है। क्या सरकार ने लोगों में अपना भरोसा इतना खो दिया कि वह विपक्ष की अफवाहों को सच मान रहा है और देश के प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों -मुख्यमंत्रियों की इस बात पर भरोसा नहीं कर रहा की देश में तेल और गैस का कोई संकट नहीं है।
पिछले तीन -चार दिन से देश भर से जो तस्वीरें आ रही है, वह इस बात को जाहिर कर रही है कि लोगों में डर है कि उन्हें गैस सिलेंडर मिलेगा या नहीं और तब से वह सरकार के किसी भी भरोसे पर भरोसा नहीं कर रहे हैं। जब से सिलेंडर बुक कराने में शहरी क्षेत्रों में 25 दिन और ग्रामीण क्षेत्रों में 45 दिन का अन्तराल किया गया है, ये डर और बढ़ गया है। कमर्शियल गैस सिलेंडर की सप्लाई बंद कर गई है। हो सकता है गैस एजेंसियों के बाहर खाली सिलेंडर लेकर कतार में लगे लोगों में ऐसे लोग भी शामिल है, जिनके घरों में पहले सिलेंडर मौजूद हो। लेकिन भविष्य में आने वाली किसी भी परेशानी से निपटने के लिए वो खाली पड़ा दूसरा सिलेंडर भी भराना चाहते हो। लेकिन क्या सभी लोग ऐसे ही हैं, शायद नहीं ।
सरकार विपक्ष पर आरोप तो लगा रही है, लेकिन लोकतंत्र में विपक्ष की जिम्मेदारी यही तो है कि वह जनता को हो रही मुश्किलों के खिलाफ आंदोलन करें। वह यह तो कर नहीं सकता है कि जो सरकार कहे, वो ही विपक्ष माने और जनता से कहे। जब भाजपा खुद विपक्ष में थी, तब वह भी तो गैस की कीमतें बढ़ने और कमी होने पर इसी तरह आंदोलन कर कांग्रेस सरकार को घेरा करती थी। उस दौर की भाजपा नेताओं की आंदोलन की तस्वीरें आज भी सोशल मीडिया पर खूब शेयर की जा रही है। हां, हालात अलग हो सकते हैं,लेकिन संकट तो एक जैसा ही है। लेकिन मोदी है तो मुमकिन है के दौर में लोग देश में सब कुछ हमेशा सामान्य ही रहने की उम्मीद भी तो करते हैं, आखिर उन्हें 2014 के बताया भी तो यही गया है।
विपक्ष पर अफवाह फैलाने के आरोप से अलग ये भी तो सच्चाई है कि गैस सिलेंडर प्राप्त करना अब मुश्किल होता जा रहा है। गैस कंपनियों के ऑनलाइन बुकिंग एप बंद हो गए हैं। कहीं शहरों में गैस एजेंसियां खुल नहीं रही है। जहां खुली है, बाहर लंबी-लंबी कतारें लग रही है। लोग सुबह से शाम तक सिलेंडर लेने का जतन कर रहे हैं। क्या भरी गर्मी और तेज धूप में लोग यूं ही मशक्कत कर रहे हैं? विडंबना की बात तो ये है कि संकट के बाद भी सिलेंडरों की कालाबाजारी तेजी से बढ़ रही है। रसोई गैस सिलेंडर 1200 से ₹1500 और कमर्शियल सिलेंडर₹5000 तक बेचा जा रहा है। सवाल ये है कि आखिर ब्लैक मार्केटिंग हो क्यों रही है। जबकि सरकार ने इसे रोकने के लिए कानून भी लागू कर दिया है। जब तक पूरा सिस्टम कालाबाजारी में शामिल नहीं होता,तब तक ये संभव नहीं है।
हमारे देश में यह विडंबना रही है कि जब भी किसी चीज का संकट आता है, ब्लैक मार्केटिंग करने वालों की पौ-बारह हो जाती है। इसमें उन्हें राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण भी पूरा मिलता है। जगह-जगह रेस्टोरेंट, होटल,ढाबे बंद हो रहे हैं। जिन व्यवसायों में कमर्शियल सिलेंडर काम आते हैं, उनमें संकट बढ़ रहा है सबसे ज्यादा परेशान वह लोग हैं,जिनके घरों में शादी समारोह है। क्या सरकार को ऐसी व्यवस्था नहीं करनी चाहिए कि ऐसे परिवारों को उचित कीमत पर अतिरिक्त सिलेंडर मिल जाएं। जिस तरह डोनाल्ड ट्रंप रोजाना ईरान के जल्द सरेंडर करने की बात करते हैं, लेकिन उसी दिन ईरान अमेरिका और इजरायल पर हमले तेज करके, उनकी विश्वसनीयता को पलीता लगा देता है। वैसे ही तेल-गैस को लेकर सरकार के साथ हो रहा है। पहले गैस का कोई संकट नहीं होने की कहकर अगले ही दिन उसकी कीमतों में ₹60 की वृद्धि कर खुद सरकार ने भी विश्वसनीयता को खोया है। फिर अतीत में हुई कई घटनाएं भी लोगों के स्मरण में है।







