राहुल कुमार गुप्ता
एक सेमल का पेड़ काश हर घर के सामने हो।
प्रकृति से आकर्षण के फिर सुंदर बहाने हों।।
चैत्र की उस भोर में, जब हवा कुछ मस्तानी है।
क्षितिज पर बिखरी हुई, एक आदिम सी कहानी है।।
नंगे बदन, ठूंठ सा जो कल तक खड़ा मौन था।
आज उस विशाल वृक्ष सा, भला दूजा यहाँ कौन है?
शाखों पर लदे हैं, सुर्ख लाल अंगारे से।
झर रहे हैं पुष्प जैसे, टूटकर नभ के तारे से।।
बिना पत्तों के वो पेड़, जब फूलों से भर जाता है।
प्रकृति का सारा यौवन, जैसे उसमें सिमट आता है।।
ये महज एक पेड़ नहीं, चैत्र का राजसी ठाठ है।
प्रकृति की अमर सुंदरता का, खुला हुआ एक पाठ है।।
देख उसे हृदय में, जो बोध अनायास जागता है।
वो दिव्य है, वो मौन है, जो शब्दों से कहीं आगे भागता है।।







