नारायण गिरि जी महाराज
भारतीय चेतना के फलक पर जब भी भगवान परशुराम का नाम उभरता है, तो मानस पटल पर एक हाथ में शास्त्र और दूसरे में प्रचंड फरसा धारण किए हुए एक दैदीप्यमान ब्राह्मण की छवि अंकित होती है। किंतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा उन्हें बढ़ई या लकड़हारा कहने वाला तर्क महज एक शाब्दिक हेरफेर नहीं, बल्कि समाजशास्त्रीय पुनर्गठन का एक बड़ा वैचारिक उपक्रम है।
भागवत जी का यह दृष्टिकोण उस पारम्परिक अवधारणा को चुनौती देता है जो महापुरुषों को केवल उनके जन्म की संकीर्ण सीमाओं में बांधकर देखती है। शास्त्रों के अनुसार, परशुराम जी महर्षि जमदग्नि के पुत्र और भृगु वंश के रत्न थे, जिन्हें ब्रह्म-क्षत्रिय की संज्ञा दी गई, अर्थात वह जो जन्म से ब्राह्मण हैं और कर्म से क्षत्रिय हैं। भागवत जी यहाँ शस्त्र को एक औजार के रूप में परिभाषित कर रहे हैं। यदि हम तर्कों की कसौटी पर देखें, तो कुल्हाड़ी या फरसा केवल युद्ध का साधन नहीं, बल्कि सभ्यता के निर्माण का प्राथमिक उपकरण भी है। प्राचीन काल में वनों को काटकर कृषि योग्य भूमि बनाने वाले, काष्ठ शिल्प से रथ और गृह निर्माण करने वाले समुदायों के लिए कुल्हाड़ी ही उनका सबसे बड़ा सामर्थ्य थी। भागवत जी का संकेत संभवतः इसी ओर है कि परशुराम केवल एक जाति विशेष के पूर्वज नहीं, बल्कि उन समस्त श्रमजीवी वर्गों के आदि-पुरुष हैं जिन्होंने अपने पसीने और औजारों से भारत की आधारशिला रखी।
इस बयान के पीछे छिपे मंतव्य को समझने के लिए हमें संघ की उस व्यापक रणनीति को देखना होगा जिसे सामाजिक समरसता कहा जाता है। हिंदू समाज ऐतिहासिक रूप से वर्ण और जातियों के ऊंच-नीच के खांचों में बंटा रहा है, जहाँ अक्सर बौद्धिक कार्य करने वालों को उच्च और शारीरिक श्रम करने वालों को निम्न श्रेणी में रखा गया। जब भागवत जी परशुराम जी को लकड़ी काटने वाले या बढ़ई वर्ग से जोड़ते हैं, तो वे एक झटके में उस सामाजिक पदानुक्रम को ध्वस्त कर देते हैं। वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि जिसे समाज आज पिछड़ी जाति कहता है, उनके औजार और उनके कर्म उतने ही पवित्र और दिव्य हैं जितने एक ऋषि के मंत्र। उदाहरण स्वरूप, यदि भगवान परशुराम का फरसा उन्हें बढ़ई समाज का प्रतिनिधि बनाता है, तो यह उस समाज के लिए आत्म-गौरव का विषय बन जाता है कि साक्षात विष्णु का अवतार उनके जैसा ही कार्य करता था। यह तर्क न केवल पिछड़ी जातियों को हिंदुत्व के वृहद छतरी के नीचे लाने का काम करता है, बल्कि ब्राह्मण समाज को भी यह संदेश देता है कि उनके आराध्य का स्वरूप समावेशी है, संकुचित नहीं।
सियासी गलियारों में इस बयान के नफे-नुकसान का गणित अत्यंत जटिल है। वर्तमान राजनीति मंडल और कमंडल के द्वंद्व के इर्द-गिर्द घूम रही है। जहाँ विपक्ष जातिगत जनगणना और ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा बुलंद कर रहा है। वहीं मोहन भागवत का यह बयान उस जातीय गोलबंदी को सांस्कृतिक रूप से बेअसर करने की एक काट है। यदि परशुराम जी ब्राह्मणों के साथ-साथ पिछड़ों और अति-पिछड़ों के भी सर्वमान्य प्रतीक बन जाते हैं, तो जाति के आधार पर होने वाला ध्रुवीकरण कमजोर पड़ जाएगा। यह भाजपा और संघ के लिए एक बड़े वोट बैंक (विशेषकर ओबीसी) को साधने का जरिया भी हो सकता है। जो वर्तमान में अस्मिता की राजनीति का केंद्र बना हुआ है। हालांकि, इसमें एक बड़ा जोखिम भी निहित है। उत्तर भारत की राजनीति में ब्राह्मण एक अत्यंत प्रभावशाली और जागरूक मतदाता समूह है, जो परशुराम जी को अपनी सर्वोच्च जातीय पहचान मानता है। उन्हें लकड़हारा या बढ़ई कहना इस वर्ग के एक हिस्से को नागवार गुजर सकता है। यहाँ भागवत का चातुर्य यह है कि वे परशुराम जी से ब्राह्मणत्व छीन नहीं रहे, बल्कि उनके प्रभाव का विस्तार कर रहे हैं।
देश के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह बयान श्रम की गरिमा को पुनर्स्थापित करने वाला है। भारत जैसे देश में, जहाँ तकनीकी कौशल और शारीरिक श्रम को अक्सर हेय दृष्टि से देखा गया, वहाँ एक अवतारी पुरुष को शिल्पी के रूप में पेश करना एक मनोवैज्ञानिक क्रांति है। यह उस औपनिवेशिक मानसिकता पर चोट है जिसने हमें जातियों के नाम पर लड़ाया और हमारे पारंपरिक कौशल को नीचा दिखाया। भगवान विश्वकर्मा और भगवान परशुराम को एक ही धरातल पर लाकर खड़ा करना दरअसल भारत के उस पुराने गौरव को याद दिलाना है जहाँ शिल्प ही धर्म था। भागवत का यह तर्क आधुनिक भारत की उस आवश्यकता से मेल खाता है जहाँ हमें स्किल्ड वर्कफोर्स की जरूरत है और जिसे समाज में बराबरी का सम्मान मिलना अनिवार्य है।
हिंदू समाज पर इसके प्रभाव अत्यंत गहरे होंगे। यह बयान एक प्रकार का डी-कंस्ट्रक्शन है, जो स्थापित मान्यताओं को तोड़कर एक नई और अधिक व्यापक एकता का निर्माण करता है। शास्त्रों में परशुराम जी द्वारा 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने का प्रसंग आता है, जिसे अक्सर जातिगत संघर्ष के रूप में देखा गया। लेकिन भागवत की नई व्याख्या इस संघर्ष को तत्कालीन अहंकारी सत्ता विरुद्ध श्रमजीवी वर्ग के संघर्ष के रूप में रूपांतरित कर सकती है। यह दलित, पिछड़ों और सवर्णों के बीच के ऐतिहासिक गतिरोध को कम करने का एक दार्शनिक सेतु है। मोहन भागवत का यह कथन केवल एक ऐतिहासिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक भविष्योन्मुखी सामाजिक ब्लूप्रिंट है। यह एक ऐसे भारत की कल्पना है जहाँ महापुरुष किसी एक जाति की जागीर नहीं होते, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की साझा विरासत होते हैं। यह बयान आने वाले समय में भारतीय राजनीति और समाजशास्त्र की दिशा तय करने वाला एक मील का पत्थर साबित हो सकता है, क्योंकि जन्म से जाति के निर्धारण से बढ़कर यह कर्म के माध्यम से देवत्व की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। इसमें कड़वाहट कम और एक सूत्र में पिरोने वाली गठावट अधिक है, जो हिंदू समाज को एक अखंड और समरस इकाई बनाने की दिशा में एक साहसिक कदम है।







