विपक्ष का मानना है कि परिसीमन की वजह से उत्तर-दक्षिण राज्यों में सीटों को लेकर बढ़ेगा विवाद
अलका शुक्ला
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 17 अप्रैल 2026 की तिथि एक ऐसी घटना के रूप में दर्ज हो गई है, जिसने न केवल संसद की दहलीज पर खड़ी आधी आबादी की उम्मीदों को झकझोरा है, बल्कि भारतीय राजनीति के अंतर्विरोधों को भी सतह पर लाकर खड़ा कर दिया है।
131वाँ संशोधन विधेयक का लोकसभा में गिर जाना महज एक विधायी प्रक्रिया की विफलता नहीं है, बल्कि यह उस जटिल राजनीतिक बिसात का परिणाम है जहां मंशा, रणनीति और क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल एक-दूसरे से बुरी तरह उलझे हुए थे।
इस विधेयक का उद्देश्य नारी शक्ति वंदन अधिनियम को धरातल पर उतारने के लिए परिसीमन की बाधाओं को दूर करना था, लेकिन सदन के भीतर संख्या बल और वैचारिक मतभेद की दीवार इतनी ऊंची साबित हुई कि महिला आरक्षण का सपना एक बार फिर अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो गया।
इस विफलता के मूल में सबसे प्रमुख कारण विशेष बहुमत की संवैधानिक अनिवार्यता रही। किसी भी सामान्य विधेयक के विपरीत, संविधान संशोधन के लिए सदन की कुल सदस्यता के बहुमत के साथ-साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है। जब मतों की गणना हुई, तो पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े। गणितीय दृष्टि से सत्तापक्ष के पास साधारण बहुमत तो था, लेकिन वह जादुई आंकड़ा (लगभग 352 वोट) कोसों दूर रह गया जो इस ऐतिहासिक बदलाव के लिए अनिवार्य था। यह हार केवल मतों की कमी नहीं थी, बल्कि सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच संवाद के उस सेतु का अभाव था, जो राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर अक्सर अनिवार्य होता है।
सत्तापक्ष की मंशा पर गौर करें तो सरकार की रणनीति इस बार अधिक आक्रामक और दूरगामी दिखाई दी। सरकार का तर्क था कि 2029 के आम चुनावों में महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने के लिए परिसीमन अपरिहार्य है। इसके लिए सरकार ने 2011 की जनगणना के पुराने आंकड़ों का सहारा लेकर लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 850 करने का एक साहसिक, मगर विवादास्पद प्रस्ताव रखा। इसके पीछे की सोच यह थी कि यदि कुल सीटें बढ़ाई जाती हैं, तो महिलाओं को आरक्षण देने के बावजूद मौजूदा पुरुष सांसदों की सीटों में कटौती नहीं करनी पड़ेगी, जिससे राजनीतिक असंतोष कम होगा। सरकार इसे एक मास्टरस्ट्रोक के रूप में देख रही थी, जो महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ भविष्य की राजनीतिक जरूरतों को भी पूरा करता। हालांकि, इस मंशा में एक गहरा राजनीतिक पेंच भी छिपा था, जिसे विपक्ष ने तुरंत भांप लिया।
यहीं से विपक्ष की भूमिका और उसके विरोध के तर्क शुरू होते हैं, जिन्होंने इस बिल की राह रोक दी। विपक्ष का सबसे बड़ा हमला सीटों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव पर था। कांग्रेस और दक्षिण भारतीय दलों का स्पष्ट आरोप था कि महिला आरक्षण की आड़ में सरकार उत्तर भारत के उन राज्यों को राजनीतिक लाभ पहुँचाना चाहती है, जहाँ जनसंख्या वृद्धि दर अधिक रही है। दक्षिण भारत के राज्यों, जिन्होंने दशकों तक परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्यों को सफलतापूर्वक लागू किया, उन्हें डर है कि सीटों के पुनर्गठन से संसद में उनका वजन कम हो जाएगा। विपक्ष ने तर्क दिया कि महिला आरक्षण को परिसीमन की इस शर्त के साथ जोड़ना ब्लैकमेलिंग जैसा है। उनका कहना था कि आरक्षण को बिना सीटों की संख्या बढ़ाए और बिना किसी जनगणना की प्रतीक्षा किए तुरंत लागू किया जाना चाहिए।
विरोध का दूसरा बड़ा ध्रुव कोटा के भीतर कोटा की मांग रही। समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और अब कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर अपना रुख कड़ा कर लिया है कि बिना ओबीसी महिलाओं के लिए अलग आरक्षण के, यह बिल अधूरा और सवर्ण महिलाओं के पक्ष में झुका हुआ है। विपक्ष ने इसे सामाजिक न्याय की कसौटी पर कसते हुए सत्तापक्ष को घेरा। इसके अतिरिक्त, कुछ क्षेत्रीय दलों द्वारा मुस्लिम महिलाओं के लिए भी विशेष प्रावधान की मांग उठाई गई, जिसने इस विमर्श को और अधिक ध्रुवीकृत कर दिया। सरकार ने इन मांगों को असंवैधानिक और विभाजनकारी करार दिया, लेकिन मतदान के समय इन छोटे-छोटे मतभेदों ने एक बड़े अवरोध का रूप ले लिया।
इस पूरे घटनाक्रम में निष्पक्षता से देखा जाए तो दोष केवल एक पक्ष पर मढ़ना उचित नहीं होगा। जहाँ सत्तापक्ष ने इस संवेदनशील बिल को परिसीमन जैसे जटिल और विवादास्पद क्षेत्रीय मुद्दे के साथ जोड़कर एक रणनीतिक जोखिम लिया, वहीं विपक्ष ने भी महिला आरक्षण के व्यापक उद्देश्य की तुलना में अपने वोट बैंक और क्षेत्रीय हितों को प्राथमिकता दी। सदन में हुई बहस में नारी शक्ति के प्रति सम्मान के शब्द तो बहुत थे, लेकिन वोटिंग मशीन के बटनों पर दलीय प्रतिबद्धता अधिक हावी रही।
इस बिल का गिरना भारतीय संसदीय लोकतंत्र की उस कड़वी सच्चाई को दर्शाता है जहाँ महिला सशक्तिकरण जैसे बुनियादी मुद्दे भी अक्सर प्रक्रियात्मक पेचीदगियों और राजनीतिक अविश्वास की बलि चढ़ जाते हैं। 2026 की यह असफलता हमें याद दिलाती है कि जब तक देश के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के बीच राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ न्यूनतम साझा कार्यक्रम विकसित नहीं होता, तब तक आधी आबादी को उनका हक देने की बातें केवल चुनावी रैलियों का हिस्सा बनी रहेंगी। संसद की दीर्घाओं में गूंजते भाषण और मतपेटियों से निकलते परिणाम आज एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि क्या भारत का राजनीतिक वर्ग वास्तव में महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में देखने के लिए तैयार है, या फिर आरक्षण केवल सत्ता की चाभी हासिल करने का एक और औजार मात्र है। आज का दिन इतिहास में एक अवसर खो देने वाले दिन के रूप में याद किया जाएगा, जहाँ तर्क जीते लेकिन न्याय हार गया।






