राहुल कुमार गुप्ता
जबलपुर के बरगी डैम में हुए दु:खद हादसे में पश्चिम बंगाल के युवक रमजान ने अपनी जान जोखिम में डालकर छह लोगों को डैम से बाहर निकाला, चार लोगों की बचा ली जान
मध्यप्रदेश के जबलपुर के बरगी डैम में लहरों ने जब नर्मदा क्वीन नामक क्रूज को अपनी आगोश में लिया, तो वह मंजर केवल एक हादसा नहीं बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच चलते संघर्ष की एक रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तान बन गया। चीख-पुकार और डूबती सांसों के कोलाहल के बीच जब मौत अपना तांडव कर रही थी, तब प्रकृति की उन भयावह लहरों के बीच से ममता और मानवता की एक ऐसी अलौकिक तस्वीर उभरी जिसने न केवल उस समय के हाहाकार को शांत किया, बल्कि पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया। ममता की एक मार्मिक तस्वीर, मां और उसके सीने से चिपके बेटे की! तो मानवता को गर्व से भर देने वाला वो पल वो तस्वीर जो पश्चिम बंगाल के माटी के लाल रमजान की है। रमजान इस दुखद पल में कोई साधारण मजदूर नहीं बल्कि साक्षात सांत्वना और साहस का पर्याय बन गया था। जैसे ही उसकी नजर 25 फुट की ऊंचाई से उस डूबते हुए क्रूज और उस पर सवार जिंदगी की आखिरी उम्मीदें बांधे लोगों पर पड़ी, उसने एक पल की भी देरी नहीं की। बिना अपनी जान की परवाह किए, बिना अपने भविष्य का आकलन किए और बिना किसी सुरक्षा कवच के, रमजान ने मौत के उस अथाह जलकुंड में छलांग लगा दी। यह छलांग महज़ पानी में कूदना नहीं था, बल्कि यह गिरती हुई मानवीय संवेदनाओं को बचाने की एक छलांग थी। अन्य मजदूर साथियों ने उसका सहयोग किया।
आपदा प्रबंधन की टीम आने से पहले रमजान ने तैरकर उन तक पहुंच बनाई और एक-एक कर छह लोगों को बाहर निकालने का भगीरथ प्रयास किया। तमाम कोशिशों के बावजूद वह दो जिंदगियों को नहीं बचा सका, लेकिन चार परिवारों के चिरागों को उसने बुझने से पहले थाम लिया। आज जब पूरा देश उसे सलाम कर रहा है, तो यह सलाम केवल एक व्यक्ति के साहस को नहीं, बल्कि उस असली भारत को है जो आज भी नफरत की ऊंची दीवारों के पीछे कहीं न कहीं अपनी धड़कनें बचाए हुए है।
भारत की यह भूमि सदियों से विविधता में एकता के दर्शन को जीती आई है। यह कोई चुनावी नारा या किताबी जुमला नहीं है, बल्कि इस देश की मिट्टी की वह तासीर है जिसने हज़ारों सालों से अलग-अलग संस्कृतियों, भाषाओं और मजहबों को अपने भीतर समाहित किया है। लेकिन दुर्भाग्यवश, पिछले कुछ दशकों से हमारी साझा विरासत की फिजाओं में संप्रदायवाद और नफरत का जहर बहुत सुनियोजित तरीके से घोला गया है। संकीर्ण विचारधाराओं ने भाईचारे की उस बुनियाद को हिलाने की कोशिश की है, जिसे हमारे पुरखों ने अपने खून-पसीने से सींचा था। हां, कुछ कट्टरपंथियों ने आजादी से पहले( जैसे मुस्लिम लीग) और आजादी के बाद कुछ आजाद कट्टरपंथियों ने जरूर यहां रची बसी मानवता की जड़ों को काटना चाहा लेकिन मानवता और आपसी सद्भाव कम नहीं हुआ। इंटरनेट के दौर में नफरत की आग तेजी से फैलती है, अफवाहें इंसानों को इंसानों का दुश्मन बनाने पर तुली रहती हैं, और हर घटना को सांप्रदायिक चश्मे से देखने की एक बीमार कोशिश की जाती है। परंतु जबलपुर की इस घटना ने उन तमाम नफरत के सौदागरों को एक करारा जवाब दिया है। रमजान का यह साहसिक कृत्य यह स्पष्ट करता है कि भारत के कण-कण में बसी इंसानियत की जड़ें इतनी गहरी हैं कि संप्रदायवाद का कोई भी बवंडर उन्हें उखाड़ नहीं सकता। जब कोई व्यक्ति मौत से लड़ रहा होता है, तो वह बचाने वाले का नाम या उसका मजहब नहीं पूछता, और जब कोई बचाने वाला अपनी जान जोखिम में डालकर लहरों से टकराता है, तो उसकी आंखों के सामने किसी धर्म का प्रतीक नहीं बल्कि सिर्फ एक तड़पता हुआ इंसान होता है।
यही वह वास्तविकता है जो भारत को विश्व का सबसे शानदार और जीवंत लोकतांत्रिक देश बनाती है। लोकतंत्र केवल वोट डालने या सरकारें चुनने की प्रक्रिया का नाम नहीं है, बल्कि यह एक साझा समाज के रूप में एक-दूसरे के प्रति हमारी जिम्मेदारी और संवेदना का नाम है। यदि हम अपने आस-पास देखें, तो रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसी हजारों कहानियां हर गांव, हर गली और हर शहर के चौराहे पर बिखरी पड़ी हैं। कहीं कोई हिंदू भाई रमजान के महीने में अपने मुस्लिम मित्र के लिए इफ्तार का प्रबंध कर रहा होता है, तो कहीं कोई मुस्लिम परिवार मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए अपनी जमीन दान कर देता है।
अमरनाथ की दुर्गम पहाड़ियों पर मुस्लिम सेवादार शिवभक्तों की पालकी उठाकर उन्हें शिखर तक पहुंचाते हैं, और गुरुद्वारों के लंगर में हर धर्म का व्यक्ति एक ही पंगत में बैठकर अपनी भूख मिटाता है। यही वह भारतीयता है जो हमें दुनिया के बाकी देशों से अलग और विशेष बनाती है। संप्रदायवाद की लहरें चाहे कितनी भी ऊंची क्यों न उठें, लेकिन जब-जब मानवता पर संकट आता है, तो रमजान जैसे मानवता के नायक अपनी पहचान भुलाकर सामने आते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि इस देश की असली शक्ति प्रेम और परस्पर विश्वास में निहित है, मानवता में निहित है।
भारत की यह विविधता ही इसका सबसे बड़ा सौंदर्य है। जैसे एक बगीचे में अलग-अलग रंगों और सुगंधों के फूल मिलकर उसकी शोभा बढ़ाते हैं, वैसे ही विभिन्न आस्थाओं वाले लोग इस राष्ट्र रूपी गुलदस्ते को पूर्ण बनाते हैं। रमजान का मानवता से भरा यह कार्य हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि यदि वह उस क्षण यह सोचने बैठ जाता कि डूबने वाले कौन हैं या उसका अपना जीवन कितना अनमोल है, तो शायद वह चार जिंदगियां आज हमारे बीच न होतीं। उसकी निस्वार्थ सेवा ने यह संदेश दिया है कि मानवता का धर्म सबसे ऊपर है। संप्रदायवाद दरअसल एक कृत्रिम मुखौटा है जिसे नफरत फैलाने वाले लोग अक्सर पहन लेते हैं, लेकिन संकट की घड़ी में यह मुखौटा उतर जाता है और केवल शुद्ध मानवीय करुणा शेष रह जाती है। आज जब हम एक आधुनिक और विकसित भारत की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि विकास केवल गगनचुंबी इमारतों या तकनीकी प्रगति से नहीं आता, बल्कि समाज के नैतिक उत्थान और आपसी सद्भाव से आता है। एक ऐसा समाज जहां एक नागरिक दूसरे नागरिक के दुख को अपना समझे, वही वास्तव में विकसित है।
जिम्मेदारों की लापरवाही से जन्मी जबलपुर की यह घटना एक त्रासदी जरूर थी, जिसने कई परिवारों को उम्र भर का गम दिया, लेकिन इसी त्रासदी के गर्भ से आशा की एक किरण भी निकली है। यह किरण हमें बताती है कि भारत की आत्मा अभी मरी नहीं है। यह देश नफरत की आंधियों को सहने की ताकत रखता है क्योंकि इसके पास प्रेम की अटूट विरासत है। रमजान जैसे लोग उस विरासत के प्रहरी हैं। वे हमें सिखाते हैं कि साहस का कोई भूगोल नहीं होता और संवेदना की कोई भाषा नहीं होती। एक बंगाली युवक का मध्यप्रदेश की लहरों में कूदना यह दर्शाता है कि यह देश उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक एक अदृश्य रेशमी धागे से बंधा हुआ है। संप्रदायवाद का जहर इस धागे को कमजोर तो कर सकता है, लेकिन तोड़ नहीं सकता। भारत की असलियत उन नफरती भाषणों में नहीं है जो टेलीविजन के पर्दों पर गूंजते हैं, बल्कि उस खामोश बहादुरी में है जो बिना किसी प्रचार के दूसरों की जान बचाने के लिए खुद को दांव पर लगा देती है।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारत अपनी विविधता के बिना अधूरा है। यह देश तभी तक महान है जब तक इसमें रमजान जैसे लोग सुरक्षित हैं और सम्मानित हैं। आज पूरा राष्ट्र उसे सलाम कर रहा है, तो यह इस बात का प्रतीक है कि हम आज भी अच्छाई और निस्वार्थ सेवा के कायल हैं। यह घटना उन सबके लिए एक सबक है जो नफरत का जहर घोलने में लगे हैं। नफरत की ये क्रिया क्षणिक हो सकती है, लेकिन प्रेम और वीरता का इतिहास शाश्वत होता है। हमें अपने समाज में व्याप्त उस जहर को बाहर निकालना होगा जो हमें एक-दूसरे के प्रति शंकालु बनाता है। हमें फिर से उसी भारत की ओर लौटना होगा जहां इंसानियत ही सबसे बड़ा मजहब थी।
रमजान ने अपनी जान जोखिम में डालकर केवल चार लोगों को नहीं बचाया, बल्कि उसने उस गिरते हुए विश्वास को भी बचाया है जो हमें एक राष्ट्र के रूप में जोड़े रखता है। भारत की वास्तविकता यही प्रेमभाव है, यही सहयोग है और यही वह अटूट बंधन है जो हमें विश्व पटल पर एक अद्वितीय शक्ति के रूप में स्थापित करता है। आने वाली पीढ़ियां जब इस दौर के इतिहास को पढ़ेंगी, तो वे नफरत के शोर को नहीं, बल्कि रमजान जैसे नायकों की वीरता को याद रखेंगी, जिन्होंने साबित किया कि भारत की असली पहचान उसकी विविधता में एकता से है, संप्रदायवाद से नहीं, मानवतावाद से है।






