पतझड़ का पेड़
चंद अटकी पत्तियों की उखड़ती सांस की एक सांस
हांफती.. दम तोड़- ती..
कितना महीन क्षणांश – समय का
किस कदर खिंच गया है..
गया है बिछ..
क्षणांश!
कम है समय, सोचो.. सोचो.. सोचो-
तुम सब आओ करीब.. करीब और थोड़ा
नही जाओ दूर.. दूर.. दूर और थोड़ा बहुत दू—र
निर्णयाक क्षणांश और यह विरोधाभास –
समय कम है.. बहुत कम
जल्दी करो.. करो जल्दी.. जल्दी..
आ.. आ.. ह अ आ!
पतझड़ का पेड़
चंद अटकी पत्तियों की उखड़ती सांस की
एक सांस दम तोड़..!
- आनंद अभिषेक







