इलाहाबाद उच्च न्यायालय की टिप्पणी ने खोली निजी अस्पतालों की पोल
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक तीखी टिप्पणी में निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि ये अस्पताल मरीजों को महज ‘एटीएम’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे मध्यमवर्गीय, नौकरीपेशा और मजदूर वर्ग के लोग भारी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। यह कोई छिपा हुआ सच नहीं है, बल्कि लंबे समय से खुलेआम हो रही एक कड़वी हकीकत है।
निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने का मकसद सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का बोझ कम करना और लोगों को भरोसेमंद इलाज का विकल्प देना था। कुछ अस्पतालों ने इस दिशा में सहयोगात्मक रवैया अपनाया, लेकिन अधिकांश ने मरीजों को केवल मुनाफे का जरिया बना लिया। आधुनिक चिकित्सा में छोटी-बड़ी बीमारियों के निदान के लिए कई तरह के टेस्ट जरूरी होते हैं, जो पहले ही मरीजों की जेब पर भारी पड़ते हैं। लेकिन अगर निजी अस्पताल में भर्ती होना पड़े, तो बेड के किराए से लेकर डिस्चार्ज तक का बिल इतना भारी बनाया जाता है कि उसका कोई तर्कसंगत आधार नहीं होता।
मरीजों को दी जाने वाली सुविधाओं के लिए कई गुना ज्यादा शुल्क वसूला जाता है। ऑपरेशन, दवाइयाँ और अन्य सेवाओं के नाम पर भी मनमानी लूट मची है। हालात यहाँ तक पहुँच गए हैं कि कुछ मामलों में मरीज की मृत्यु के बाद भी ‘इलाज’ के नाम पर बिल बढ़ाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। मरीज और उनके परिजन यह उम्मीद लेकर मोटी रकम चुकाते हैं कि उन्हें बेहतर इलाज मिलेगा, लेकिन इस भरोसे का दुरुपयोग ही निजी अस्पतालों की सबसे बड़ी सच्चाई बन गई है।
इस स्थिति से परेशान मरीजों और उनके तीमारदारों के गुस्से का परिणाम कई बार अस्पतालों में हंगामा, मारपीट या तोड़फोड़ की घटनाओं के रूप में सामने आता है। चिकित्सा विभाग ऐसी शिकायतों पर जाँच का वादा तो करता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में या तो जाँच की प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है या फिर अस्पतालों को आसानी से क्लीन चिट मिल जाती है।







