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    Home»साहित्य

    एक न हुए घोटाले की पटकथा

    By December 30, 2017Updated:December 30, 2017 साहित्य No Comments4 Mins Read
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    Cartoon: shagunnewsindia.com
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    Post Views: 971

    व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी

    घोटाला अदृश्य होता है। किसी को होता हुआ कभी दिखाई नहीं देता। सब हवा में तीर छोड़ते रहते हैं कि फलां घोटाला हुआ, फलां नेता-मंत्री दोषी है। अपने मन के वहम को कभी इस पर तो कभी उस पर थोपते देते हैं।

    देखिए, सच्चाई आ गई न सामने। जज साहेब ने स्पष्ट कह दिया, 2 जी घोटाले जैसा कुछ हुआ ही नहीं। जब कुछ हुआ ही नहीं तो दोषी भी किसी को क्यों माना जाए। सो सभी कथित आरोपियों को छोड़ दिया गया। लेकिन बेचारों को इतने साल बदनामी का जो घूंट पीकर रहना पड़ा, उसका क्या! खामखां मीडिया और जनता के बीच इतनी किरकिरी हुई सो अलग। चलिए खैर न्याय तो मिला, यही बहुत है।

    उधर विपक्ष चौड़ा हुआ घूम रहा है तो इधर सरकार के मंत्री सफाई दे देकर परेशान हैं। कौन सही है, कौन गलत। यह समझ पाना उतना ही कठिन है, जितना बीवी के मन की बात तो पढ़ पाना। दोनों तरफ से शाब्दिक घमासान जारी है। ‘तू डाल डाल, मैं पात पात’, वाला हाई-वोल्टेज ड्रामा चल रहा है।

    मीडिया खुश है। उसे एक और मसालेदार मसला हाथ आ गया। खबरिया चैनलों पर बहसों का दौर जारी है। हर पार्टी का प्रवक्ता अपने नेता को बचाने में लगा है। वो तो प्रवक्तागण दूर-दूर बैठते हैं, आस-पास बैठें तो जूतम-पैजार चैनलों पर ही चालू हो जाए। 2 जी पर दोनों ओर से इतना-इतना ज्ञान एक-दूसरे को बांटा जा रहा है कि अगर घोटालों पर शोध करने वाला शोधार्थी देख-सुन ले तो उसे भरपूर सामग्री मिल जाए।

    बता दूं, सबसे अधिक दिलचस्प और शोधपरक घोटाले अपने ही देश में हुए हैं। चाहे तो घोटालों से जुड़े इतिहास के पन्ने पलट कर देख लीजिए। बड़ा या छोटा घोटाला करने के बाद भी कभी नेता, मंत्री या अफसर की शक्ल देखकर लगेगा ही नहीं कि अगले ने कोई भ्रष्टाचार किया भी होगा। हमेशा की तरह अल-मस्त घुमता हुआ ही दिखाई पड़ता है।

    घोटाले का कॉन्सेप्ट हमारे दिलोदिमाग में ऐसा रच-बस गया है कि बहुत दिनों तक जब किसी विभाग से घोटाले की कोई खबर सुनने में नहीं आती तो शक-सा होने लगता है कि देश की राजनीति में क्या सतयुग लौट आया है? क्या भ्रष्टाचार कहीं हो ही नहीं रहा?

    हालांकि राजनीति में कदम रखने से पहले नेता-मंत्री लोग कसम भ्रष्टाचार को न करने की ही खाते हैं पर क्या कीजिएगा जब खुद पर कंट्रोल कर पाना मुश्किल हो जाए!

    घोटाला है ही इतनी लाजवाब चीज कि न चाहते हुए भी हो ही जाता है।
    मुझे तो रह-रहकर अब अफसोस हो रहा है कि पिछले दिनों मैंने कितना कुछ 2 जी के बहाने नेताओं-मंत्रियों के खिलाफ लिख डाला था। जबकि वे तो बहते नाले में गंगा की तरह पवित्र निकले! सब के सब दूध के धुले! हाय! ये कैसा पाप कर डाला मैंने।

    अब तो मैंने उन तमाम खबरों को सिरे से नकारना शुरू कर दिया है, जिनमें घोटालों का जिक्र रहता है। जब घोटाला कुछ होता ही नहीं तो क्यों खाली-पीली मैं इस या उस नेता-मंत्री को गरियाऊं!

    घोटाले अदृश्य व पवित्र होते हैं। इनको करने से कभी किसी तरह का कोई पाप नहीं लगता। किस्म-किस्म के घोटालों के बीच रहकर भी भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सकती है। बल्कि यह कहूं तो कोई अतिशयोक्ति न होगी कि भ्रष्टाचार पर जितनी लगाम हमारे देश में कसी जाती है, अन्यत्र कहीं नहीं। देश का प्रत्येक नेता चुनाव प्रचार के दौरान और सरकार बन जाने के बाद सबसे पहले भ्रष्टाचार को खत्म करने का ही प्रण लेता है। घोटालेबाजों को तुरंत जेल में डालने का आश्वासन जनता को देता है। ये बात और है कि कुर्सी पर बैठ जाने के बाद नेता की मसरूफियत बढ़ जाती है। पर उसकी सरकार में घोटाले न हों इसके वास्ते वो हमेशा तत्पर रहता है।

    फिर भी, देश में एकाध घोटालेबाज तो रहना ही चाहिए ताकि न्याय-व्यवस्था अपना काम कर सके। उसको कड़ी सजा देकर जनता के समक्ष एक नजीर पेश कर सके। हालांकि एक अदृश्य सी चीज को पकड़पाना इतना आसान नहीं होता तब भी न्याय-प्रिय लोग लगे ही रहते हैं।

    चलिए खैर यह अच्छा ही रहा कि 2 जी बे-दाग निकला। पूर्व सरकार के कथित दागी मंत्री पवित्र निकले। न्याय पर लोगों की आस्था और मजबूत हुई। कई एंवई उछाले गए जुमले खोखले साबित हुए। हालांकि कुछ की इज्जत की बे-इज्जती जरूर हुई। पर ये गम भी जल्द ही भर जाएगा।
    मामला चाहे कोई हो पर विश्वास रखिए जीत हमेशा सत्य की ही होती है। जैसा- 2 जी मसले में हुआ। आइए हम सब मिलकर सत्य की इस जीत का जश्न मनाएं। और हां घोटाले कुछ नहीं होते, इस बात को हमेशा के लिए अपने जहन में रखें।

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