चुप रहने में भलाई

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अंशुमाली रस्तोगी

मैंने अब कम बोलना। कम लिखना। बहस में कम पड़ना शुरू कर दिया है। समय खराब है। किसी का कोई भरोसा नहीं। कब में किस बात या असहमति पर कोई मेरा भी काम तमाम कर डाले। तो प्यारे मेरी भलाई इसी में है कि मैं ‘मुंह पर टेप’ चिपकाए रहूं।

लेखक होकर मेरा यों ‘बिदकना’- जानता हूं- बहुत लोगों को ‘अखर’ रहा होगा। कुछ साथियों ने तो मुझे ‘बुजदिल’ और ‘नपुंसक’ तक करार दे दिया होगा। न केवल मेरे लेखन साथ-साथ मेरी कलम पर भी हजार तरह के फिकरे कसे होंगे। मगर मैं किसी के ‘कहे’ की कतई ‘परवाह’ नहीं करता। यों, दूसरों की परवाह करने के चक्कर में अगर पड़ जाऊंगा तो एक दिन अपनी ही जान से हाथ धो बैठूंगा! जबरन क्रांतिकारी या खुले विचारों का लेखक बनने का मुझे कोई शौक नहीं। क्या समझे…।

ये जो अक्सर हम प्रगतिशील सोच, जनवादी विचारधारा, निष्पक्ष लेखन आदि के चक्करों में पड़ जाते हैं न। बस यही जिद एक दिन ‘कबाड़ा’ कर डालती है। क्या जरूरत है मुझे इन सब आजाद-ख्याल ख्यालों में ‘ख्याली पुलाव’ पकाने की? जितना भर अपने दम पर पका पा रहा हूं काफी है मेरे लिए। पानी में रहकर मगर से बैर रखने में होशियारी नहीं। जब तलक बनाकर चला पा रहे हैं, चलाते रहिए न। कौन-सा क्रांतिकारी लेखक बनकर आप समाज या देश में क्रांति लिख देंगे।

मैं साफ कहता हूं। फिर से कह रहा हूं। लेखन या अपने दम पर क्रांति करना मेरे बस की बात नहीं। वो लोग और ही होते हैं, जो अपनी विचारधारा के दम पर दूसरे की विचारधारा से ‘पंगा’ लेने की हिम्मत रखते हैं। माफी कीजिएगा, ये हिम्मत मेरे में बिल्कुल नहीं। जो शख्स दीवार पर बैठी छिपकली को देख कमरे में न घुसता हो उससे किसी ‘क्रांति’ की उम्मीद रखना पानी के मध्य खड़े होकर मोमबत्ती जलाने की कोशिश करना है।

‘फ्री स्पीच’ का जिगरा रखने वाले लेखक लोग अलग ही होते हैं। एकदम निडर। सहासी। निष्पक्ष। बिंदास। दुनिया क्या दुश्मन तक उनके आगे पानी मांगते नजर आते हैं। लेकिन मैं किसी को भी अपने समक्ष पानी मंगवाने की तमन्ना नहीं रखना चाहता। जिंदगी जिस ठर्रे पर चैन से चल रही है, चलने देना चाहता हूं। चैन से बड़ा सुख मेरे तईं दूसरा नहीं।

बैठे-ठाले समय की निगाह टेढ़ी होते देर ही कितनी लगती है। न न मैं कतई नहीं चाहता समय की निगाह मेरे प्रति टेढ़ी हो। मैं सीधी-सच्ची लाइफ को ‘एन्जॉय’ करने का आदी हूं। खामखा किसी के फटे में अपनी टांग घुसेड़ मैं जन्म-जिंदगी भर को ‘लूला’ नहीं होना चाहता।

उनकी ‘फ्री स्पीच’ उन्हें और मेरी ‘चुप्पी’ मुझे मुबारक!

चिकोटी से साभार