आदमी को मुर्दे नहीं, सपने जीवित रखते हैं

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एक दिन दो राहगीर आपस में झगड़ रहे थे। एक का कहना था, “मेरे सामने तुम्हारी हस्ती कुछ नहीं है। मेरे अंक में अनमोल निधियां छिपी हैं। तुम्हारे पास क्या है ?”

दूसरे ने कहा, “मियां, अपने मुंह क्यों मिठू बनते हो? जिसे तुम अनमोल निधि कहते हो, उसका दो कौड़ी का भी मूल्य नहीं है। मुर्दो की कोई कीमत होती है?”

पहला मुंह बिगाड़कर बोला, “मेरी तिजौरी में जो बंद है, उसका मूल्य तुम क्या समझो! अरे, उसी पर तो आदमी जीता है!”

दूसरे ने विद्रूप से कहा, “आदमी को मुर्दे नहीं, सपने जीवित रखते हैं। आदमी की आंखें आगे देखती हैं, पीछे नहीं। यदि व्यक्ति के पास सपने न हों, आशा न हो तो वह विष खाकर मर जायेगा।” इन दोनों राहगीरों में पहला था बीता हुआ कल और दूसरा था आनेवाला कल। दोनों के अपने-अपने तर्क थे, वे एक-दूसरे के आगे झुकने को तैयार नहीं थे। तभी एक तीसरा राहगीर आ गया। उसने दोनों को लड़ते देखकर लड़ाई का कारण पूछ। दोनों ने अपनी-अपनी बात बड़े जोश-खरोश से कही और अंत में दोनों ने कहा, “यह माने या न माने, मेरी हस्ती के आगे यह ठहर नहीं सकता।”

तीसरे राहगीर ने उनकी बात बड़े ध्यान से सुनी। फिर बोला, “तुम दोनों का लड़ना व्यर्थ है। जो बीत गया, वह आनेवाला नहीं है। उसकी याद में समय खोना समय को बरबाद …” दूसरा बीच में ही बोल पड़ा, “तुम ठीक कहते हो। मैं भी सही मानता हं।” तीसरे ने उससे कहा, “रुको, तुम्हारा तो कोई अस्तित्व ही नहीं। जो भविष्य के विचारों में डूबा रहता है, वह कहीं नहीं पहुंच सकता।” बेचारे दूसरे का मुंह लटक गया।

तब तीसरे ने कहा, “भाइयो, असली हस्ती तो मेरी है।” दोनों एक स्वर में बोले, “तुम कौन हो?” उसने मुस्कराकर कहा, “मेरा नाम वर्तमान है, सामने का क्षण। जो सामने के क्षण को तुम दोनों के चक्कर में खो देता है, वह कहीं का नहीं रहता। इसलिए मेरा सिद्धान्त है, ‘सामने के क्षण में जीओ।’ जो इस सिद्धान्त पर आचरण करते हैं, उन्हीं का जीवन सार्थक होता है।”

तीसरे राहगीर के आगे दोनों का सिर झुक गया। वे चुपचाप आगे बढ़ गये।

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