योगी जी ने तुम्हे इज्ज़त दी, तुम इस इज्ज़त की लाज रखना
छोटे-बड़े पर सवाल मत उठाना। बात साफ है-
जिसे कम लोग पढ़ें वो छोटा है और जिसे ज्यादा लोग पढ़ें वो बड़ा पत्रकार है। ठीक वैसे ही जैसे जिसका राष्ट्रीय स्तर पर करोड़ों की संख्या में जनाधार हो उसे हम बड़ा नेता कहते हैं, और जिसका गली-मोहल्ले या वार्ड स्तर तक जनाधार हो उसे छोटा नेता ही कहेंगे। लेकिन जब कभी इस छोटे नेता पर ही लाखों-करोड़ों लोग विश्वास करने लगेंगे/उसका जनाधार बढ़ जायेगा तब यही नेता बड़ा नेता कहलायेगा।
इसी तरह दुनिया के किसी देश को विकसित देश कहा जाता है तो कोई देश विकासशील देश कहलाता है।
इसीलिये 20 कापी, 50 कापी, या सौ-दो सौ कापी छपने/बंटने वाले चार या आठ पन्ने के अखबारों के पत्रकारों को छोटा पत्रकार कहने को गलत नहीं कह सकते।
योगी सरकार पर बड़े पत्रकारों का तो कम लेकिन मठाधीश पत्रकारों का जबरदस्त दबाव था कि छोटे अखबारों को बंद करिये। ये संभव ना हो तो कम से कम इन अखबारों के छोटे पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की प्रेस मान्यता समाप्त कर दी जाये। इस तरह के दबाव की तो आला अधिकारियों ने पुष्टि भी की।
योगी जी की सरकार बनते ही एक अफवाह/दुष्प्रचार तेजी से पत्रकार जगत में फैल रहा था। वो ये कि इस सरकार में ब्रांड मीडिया ही बचेगी। बड़े अखबारों के बड़े पत्रकारों को ही सरकारी सुविधाएं मिलेंगी। छोटे अखबारों और पत्रकारों का नामोनिशान खत्म कर दिया जायेगा। खासकर सपा- बसपा सरकारों में कुकुरमुत्ते की तरह शुरु हुए सैकड़ों उर्दू अखबारों का तो सफाया कर दिया जायेगा। ऐसे अखबार से मुस्लिम पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यता खत्म कर दी जायेगी।
लेकिन ये सारी बातें महज़ अफवाह और सरकार को बदनाम करने की साजिश साबित हुयीं।
योगी/मोदी सरकारों ने मानकों को पूरा करने वाले सभी छोटे अखबारों के छोटे पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यता का दो वर्ष के लिए नवीनीकरण कर दिया है।
भाजपा सरकार ने ” सबका साथ-साथ का विकास” के नारे को साबित कर दिया है। समाज की अंतिम पंक्ति में बैठे गरीब. पिछड़े, दलित, संघर्षशील, मेहनतकश.. को पहली तवज्जो देने के सिद्धांतों वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सपनों को पूरा करने में योगी सरकार कोई कसर नहीं छोड़ रही है। तो फिर छोटी और बड़ी मीडिया या फिर छोटे और बड़े पत्रकार में भेदभाव क्यों करेगी योगी सरकार !
छोटे पत्रकारों! नेता टाइप के मठाधीश पत्रकारों ने तुम्हारी प्रेस मान्यता रद्द करने के लिए तुमपर आरोपों की जो दलीलें दी, सरकार ने उसपर विश्वास ना करके तुमपर विश्वास किया है। अब तुम्हारा फर्ज बनता है कि योगी सरकार के इस विश्वास की लाज रखो।
छोटे पत्रकारों इस तरह से तुम्हें अपना आचरण और ज़मीर बड़ा रखना होगा:
- जहां की खबर तुम्हें नहीं लिखनी है वहां कुर्सियां घेरने के लिए मत जाना।
- विधानसभा/लोकभवन इत्यादि अति विशिष्ट स्थानों पर पिकनिक जैसा माहौल बनाकर रोज-रोज अपने फोटो खीचने की बचकानी हरकतें छोड़नी होंगी।
- नेताओ/अधिकारियों या विशिष्ट ओहदेदारों के आगे-पीछे भाग-भाग कर रोज-रोज फोटो खिंचवाने जैसी अमैच्योर हरकतें बंद करनी होंगी।
- खाने की प्लेटों/डिब्बों/फाइलों /बैगों या किसी गिफ्ट इत्यादि की तरफ लपक कर अपने को छोटा साबित नहीं करोगे।
- किसी कार्यक्रम या प्रेस कांफ्रेंस में तुम किसी नेता/अधिकारी को सिफारिशी कागज या विज्ञापन का मांग पत्र नहीं दोगे।
यदि तुमने ऐसा किया तो मठाधीश पत्रकारों के आरोप सही साबित हो जायेंगे। फिर ऐसे शिकायतकर्ता पत्रकारों को पीठाधीश नहीं जिम्मेदार और अपने क्षेत्र की लाज बचाने वाला जागरूक पत्रकार मानकर सरकार को इनकी मांग पूरी करने पर मजबूर होना पड़ेगा। फिर तुम्हारी मान्यता या ऐसी ओछी पत्रकारिता को सरकार क्या भगवान /अल्लाह भी नहीं बचा सकेगा।
(आगे पढ़ियेगा:- जब एक पुस्तक विमोचन में एक मठाधीश पत्रकार ने मुख्यमंत्री से कहा कि एक धर्म विशेष के छोटे पत्रकारों की खूब प्रेस मान्यताएं कर दी गयीं थी। इन्हें रद्द करिये।
इस आग्रह पर योगी जी ने ऐसा जवाब दिया कि मठाधीश पत्रकार को मुंह की खानी पड़ी….)
नवेद शिकोह







