लखनऊ की सर्द रातों में 25 दिन तक जलती रही एक चिंगारी, आखिरकार जीत गई!
लखनऊ | जिस धरने को विश्वविद्यालय प्रशासन ने पहले दिन ही “अनावश्यक तमाशा” कहकर खारिज कर दिया था, वही धरना आज 25वें दिन इतिहास बन गया। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय (BBAU) के मुख्य गेट के सामने तंबू हट गया, प्लेकार्ड उतर गए और बसंत कुमार कनौजिया की आँखिरी पोस्ट ने लाखों लोगों की आँखें नम कर दी।
“मैं वापस आ गया हूँ…
लेकिन यह जीत मेरी नहीं,
उन तमाम हाथों की है जो ठंड में काँपते हुए भी मेरे कंधे पर कंबल डाल गए।”
रात 11:47 बजे विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड हुआ एक पेज का आदेश, जिसे देखते ही पूरा कैंपस रो पड़ा।
निष्कासन वापस। तत्काल प्रभाव से।
आदेश के अनुसार बसंत कनौजिया को विश्वविद्यालय के स्टूडेंट कोड ऑफ कंडक्ट का पालन करना होगा, किसी भी प्रकार की असामाजिक या विरोध गतिविधि से दूर रहना होगा, विश्वविद्यालय अधिकारियों/प्रोफेसरों के खिलाफ कोई मानहानिकारक पोस्ट नहीं डालनी होगी और पूर्व की ऐसी पोस्ट हटानी होंगी। साथ ही, उन्हें तीन महीने के भीतर अपनी पीएचडी थीसिस सुपरवाइज़र को जमा करनी होगी।
बसंत दोबारा बीबीएयू का छात्र। लेकिन यह कहानी सिर्फ एक निष्कासन की वापसी की नहीं है। यह उस लड़ाई की कहानी है जिसमें: 73 साल की रिटायर्ड प्रोफेसर सुशीला तिवारी हर रोज सुबह 6 बजे आकर बसंत के साथ धरने पर बैठीं।

दलित छात्र संगठन से लेकर ABVP तक, सभी ने एक ही मंच पर कंधे से कंधा मिलाया।
एक अनाम व्यक्ति ने हर रात 300 रोटियाँ और सब्जी भेजी – आज पता चला कि वो लखनऊ के मशहूर ‘पप्पू टी स्टॉल’ वाला था।
बसंत की माँ, जो गाँवारा गाँव से 700 किमी पैदल चलकर लखनऊ पहुँची थीं, आज पहली बार मुस्कुराईं।
सबसे मजेदार दृश्य तो तब हुआ जब कुलपति प्रो. संजय सिंह खुद गेट पर आए और बसंत को गले लगाकर बोले,
“बेटा, अब थीसिस जमा करने में देरी मत करना… वरना फिर निष्कासन निकाल दूँगा!”
पूरे कैंपस ने तालियाँ बजाकर हँसते हुए कहा – “सर, यह धमकी नहीं, प्यार है!”आज शाम बसंत ने अपना फेसबुक लाइव किया। 1 लाख 42 हजार लोग एक साथ जुड़े। आखिरी लाइन में उन्होंने कहा:“मैंने 25 दिन में जो सीखा, वो 25 साल की पढ़ाई में भी नहीं सीखा –
कि अगर सच के साथ खड़े हो जाओ,
तो ठंड भी गर्म कंबल बन जाती है,
और अंधेरा भी दीया बन जाता है।”
रात 1 बजे तक कैंपस के बाहर पटाखे चल रहे थे।
किसी ने लिखा – “आज बाबासाहेब की मूर्ति के सामने दीये जल रहे हैं…
जैसे वो खुद मुस्कुरा रही हों।”
बसंत कल सुबह 9 बजे फिर उसी इतिहास विभाग में कदम रखेंगे।
इस बार किताबें हाथ में होंगी,
पर कंधों पर 25 दिनों का संघर्ष भी होगा।…
और लखनऊ की यह ठंडी रात,
आज पहली बार गर्म लग रही है।






