पांच साल बाद बगैर रोहिणी नक्षत्र में मनेगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

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भगवान विष्णुजी के आठवें अवतार माने जाते हैं श्रीकृष्ण

हल्द्वानी! भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी इस बार रोहिणी नक्षत्र में नहीं, बल्कि भरणी और कृतिका नक्षत्र के योग में मनाई जाएगी। पांच साल बाद ऐसा अवसर आया है जब जन्माष्टमी बगैर रोहिणी नक्षत्र के योग में मनेगी। इस बार जन्माष्टमी 14 और 15 अगस्त को है।

भगवान श्रीकृष्ण विष्णुजी के आठवें अवतार माने जाते हैं। यह श्रीविष्णु का 16 कलाओं से पूर्ण भव्यतम अवतार है। जन्माष्टमी दो दिन मनाई जाती है। आचार्य डॉ. नवीन चंद्र जोशी के अनुसार स्मार्त संप्रदाय यानी गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वाले पहले दिन जन्माष्टमी मनाते हैं।

कुमाऊं भर में इस बार अधिकांश लोग 14 अगस्त को जन्माष्टमी मनाएंगे, जबकि वैष्णव संप्रदाय के लोग 15 अगस्त को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाएंगे। डॉ. जोशी बताते हैं कि वर्ष 2012 के बाद ऐसा योग बन रहा है जब जन्माष्टमी में दोनों दिन रोहिणी नक्षत्र नहीं है। पहले दिन भरणी, जबकि दूसरे दिन कृतिका नक्षत्र रहेगा। रोहिणी नक्षत्र 16 अगस्त को है।

रोहिणी नक्षत्र का यह हैं महत्व:

शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का अवतार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि में माना जाता है। श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसलिए जन्माष्टमी में इसका विशेष महत्व माना गया है। ज्‍योतिष में रोहिणी को उदार, मधुर, मनमोहक और शुभ नक्षत्र माना जाता है। रोहिणी शब्द विकास, प्रगति का सूचक है।

क्यों आती है ऐसी स्थिति:

आचार्य के मुताबिक, सौर-वर्ष का मान 365 दिन, 15 घड़ी, 22 पल और 57 विपल हैं। चंद्र वर्ष 354 दिन, 22 घड़ी, 1 पल और 23 विपल का होता है। दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष 10 दिन, 53 घड़ी, 21 पल (लगभग 11 दिन) का अंतर पड़ता है। अंतर में समानता लाने के लिए हर तीसरे वर्ष चंद्रवर्ष 12 मासों के स्थान पर 13 मास का हो जाता है। इसे अधिमास या मलमास कहा जाता है। सौर और चंद्र मास में अंतर होने से ही नक्षत्र कुछ दिन आगे-पीछे हो जाते हैं।

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