बिहार की जनता ने एक बार फिर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली NDA गठबंधन को स्पष्ट जनादेश दिया है। 243 सीटों वाली विधानसभा में NDA ने 125 से अधिक सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया, जबकि महागठबंधन (MGB) महज 100 के आसपास सिमट गया। यह जीत केवल संख्याओं की नहीं, बल्कि विकास, स्थिरता और विश्वसनीयता की जीत है। नीतीश कुमार, जो कभी कम्युनल राजनीति के धुर विरोधी रहे, ने बिहार को जातिवाद की जकड़न से निकालकर कामकाज की राजनीति पर केंद्रित किया। जनता ने उनके 15 वर्षों के शासन सड़कें, बिजली, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण को सराहा और फिर से मौका दिया।
नीतीश की कम्युनल-मुक्त राजनीति और जनता का विश्वास
नीतीश कुमार ने कभी धार्मिक या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं की। उनकी छवि एक सेक्यूलर, विकास-उन्मुख नेता की रही है, जो बिहार को ‘जंगलराज’ से बाहर निकालने का श्रेय लेते हैं। HAM के नेता और NDA सहयोगी जीतन राम मांझी ने ठीक कहा: “बिहार की जनता को नीतीश कुमार के काम के प्रति विश्वास था..जनता ने बहुत समझदारी से निर्णय लिया।” यह समझदारी इसलिए, क्योंकि नीतीश ने महिलाओं के लिए 35% आरक्षण, शराबबंदी, साइकिल योजना और ग्रामीण सड़कों का जाल बिछाया। BJP के साथ गठबंधन के बावजूद, नीतीश ने कभी हिंदुत्व की आक्रामक राजनीति को बिहार में हावी नहीं होने दिया यह उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
विपक्ष की ओर से VIP चीफ मुकेश सहनी (जो MGB के डिप्टी CM पद के दावेदार थे) ने भी हार स्वीकार करते हुए कहा: “बिहार की जनता ने नीतीश जी के 10,000 रुपए पर भरोसा दिखाया है।” यहां सहनी का इशारा नीतीश की महत्वाकांक्षी ‘हर घर नल का जल’ योजना और महिलाओं को 10,000 रुपए की आर्थिक सहायता जैसी योजनाओं की ओर है। ये वादे खोखले नहीं रहे; नीतीश सरकार ने जल जीवन मिशन के तहत लाखों घरों में नल पहुंचाए और कोविड काल में आर्थिक पैकेज दिए। जनता ने इन कामों को तरजीह दी, न कि विपक्ष के जातीय समीकरणों को।
विपक्ष की हार: लोकतंत्र की जीत नहीं, हार
RJD की प्रवक्ता प्रियंका ने चुनावी हार पर निराशा जताते हुए कहा: “भाजपा के कार्यकर्ता एक नहीं अनेक राज्यों में वोट दे रहे, लोकतंत्र हारा, चुनाव आयोग जीता।” यह आरोप गंभीर है, लेकिन तथ्यों से परे लगता है। चुनाव आयोग ने बिहार में रिकॉर्ड मतदान (57% से अधिक) सुनिश्चित किया, EVM की विश्वसनीयता पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर है, और विपक्ष को हर चरण में पर्यवेक्षक रखने का मौका मिला। BJP कार्यकर्ताओं का ‘अनेक राज्यों से वोटिंग’ का दावा बिना सबूत का है यह हार की कुंठा अधिक लगती है। असल में, लोकतंत्र जीता है क्योंकि बिहार की जनता ने जाति से ऊपर उठकर विकास को वोट दिया। Tejashwi Yadav की ’10 लाख नौकरियां’ की घोषणा आकर्षक थी, लेकिन नीतीश के ट्रैक रिकॉर्ड ने उसे मात दी।
चुनौतियां और उम्मीदें और भी हैं
NDA की जीत बिहार के लिए स्थिरता का संदेश है, लेकिन चुनौतियां बाकी हैं बेरोजगारी, प्रवासी मजदूरों की समस्या, बाढ़ प्रबंधन और औद्योगीकरण। नीतीश को BJP के साथ संतुलन बनाना होगा, ताकि केंद्र की योजनाएं (जैसे PM-KISAN, आयुष्मान भारत) राज्य में प्रभावी हों। विपक्ष को आत्ममंथन करना चाहिए: RJD-Youth कांग्रेस की जोड़ी ने युवाओं को लुभाया, लेकिन भ्रष्टाचार के पुराने दाग मिटाने पड़े।
अंत में कह सकते हैं कि, बिहार की यह जीत साबित करती है कि कम्युनल-मुक्त, काम-केंद्रित राजनीति अभी भी जीवंत है। नीतीश कुमार बिहार के ‘सुशासन बाबू’ बने रहेंगे, और जनता की समझदारी लोकतंत्र की असली ताकत है। NDA अब अगले पांच सालों में बिहार को ‘विकसित राज्य’ बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए यह वादा जनता ने उनसे लिया है।







