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    राहुल की चुनौतियां और गुजरात चुनाव

    By December 7, 2017 ब्लॉग No Comments4 Mins Read
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    जीके चक्रवर्ती
    कांग्रेस के राहुल गांधी को पार्टी के अध्यक्ष बनाये जाने की बात तब से सुनाई देती आ रही है जब से राहुल गांधी ने राजनीति में कदम रखा, तभी से यह प्रबल आशंका थी कि एक न एक दिन वे जरूर कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में हम सब के सामने आएंगे और हुआ भी वही, जब चार दिसम्बर, सोमवार को उनके विधिवत पार्टी अध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया गया।
    अपनी मां सोनिया गांधी के साथ जब राहुल गांधी ने मौजूदा राजनीति में कदम रखा, उसी दिन से यह संभावित था कि एक न एक दिन वे जरूर कांग्रेस अध्यक्ष बनेंगे। इसके पहले पार्टी की कमान लगातार उन्नीस वर्षों तक सोनिया गांधी के हाथों में रही। यही कारण है कि चुनाव संपन्न कराए जाने के बाद भी इसे परिवार के मध्य ही पार्टी की सत्ता कायम रहने के रूप में उन्हें ही पार्टी के अध्यक्ष पद का हस्तांतरण किया गया। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि कांग्रेस लंबे समय से परिवारवाद की रणनीति पर चलती चली आ रही है।
    इसलिए बहुत पहले ही कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्त्ता लोग मानसिक रूप से राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने के लिए तैयार थे और अपने वफादारी का परिचय देते हुए समय- समय पर इसकी मांग भी करते रहे, समय की नजाकत को भांपते हुए सोनिया गांधी ने धीरे-धीरे पार्टी में अपनी सक्रियता को कम करते हुए पार्टी का संचालन और चुनाव अभियानो में राहुल गांधी की सक्रीय भूमिका को आगे बढाती रहीं जब कि सोनिया गांधी स्वमं इस पद के लिए चुनी गई थीं, उनका चुनाव निर्विरोध नहीं हुआ था, उनके मुकाबले में जितेंद्र प्रसाद इस पद के प्रमुख उम्मीदवार थे। वहीं पर सीताराम केसरी को भी राजेश पायलट जैसे नेताओं की ओर से मिली चुनौतियां का सामना करना पड़ा। लेकिन राहुल गांधी के मुकाबले में कोई भी इस पद का सही दावेदार नहीं था कि जिसे दस प्रस्तावकों का समर्थन प्राप्त रहा हो। पार्टी में जब इस सिरे से दूसरे सिरे तक, सभी को एक मात्र राहुल गांधी को ही पार्टी के अध्यक्ष के रूप में देखे जाने की चाहत थी, तो ऐसे में उनका निर्विरोध चुना जाना स्वाभाविक सी बात है।
    यहाँ पर इस तरह का प्रश्न का उठाना स्वाभाविक है कि इससे कांग्रेस पार्टी एवं देश की राजनीति में क्या कोई प्रभाव पड़ने वाला है? एक समय ऐसा वक्त था, जब भारतीय जनता पार्टी को ऐसा लगने लगा कि राहुल गांधी का मजाक बना कर, और उन पर तंज कस कर उन्हें भारतीय राजनीति से खारिज करवाया जा सकता है। कई एक वर्षों तक राहुल की छवि कुछ हद तक ऐसी ही बनी रही या बना दी गई कि मानो वे एक अनभिज्ञ और अनिच्छुक राजनेता हैं एवं उनमें लड़ने-भिड़ने की कूबत ही नहीं है। लेकिन जब से राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी की कमान संभाली तब से उनके विषय में स्वमं कांग्रेस के आलोचकों और विरोधियों जैसे लोगों की राय काफी हद तक बदल चुकी है। मौजूदा समय में राहुल अनभिज्ञ नहीं, वल्कि एक सधे हुए परिपक्व राजनेता की भांति नजर आने लगे हैं। मौजूदा समय में गुजरात के चुनावीं सभा सम्मेलनों में उनके रुख के इस नए तेवर से भाजपा अवश्य परेशान है। लेकिन एक तरफ उनकी बढ़ती स्वीकार्यता दूसरी तरफ उनके आगे आने वाले समय में राहुल गांधी के सामने अनेको चुनौतियां उपस्थित होंगी।
    पिछले एक दशको से कांग्रेस पार्टी एक के बाद एक पराजयों से हताशाओं में डूब चुकी कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा उठाने के साथ ही साथ पार्टी में  संगठनात्मक जान फूंकनी पड़ेगी। पार्टी के महासचिव के तौर पर अब उनके सामने पार्टी के मुख्य संगठन को ऊर्जावान बनाने की भी कठिन चुनौती पेश होगी।
    अब यह जरूरी है कि पुराने, अनुभवी नेताओं एवं उभरते प्रतिभाओं के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है।
     गुजरात में चाहे ऊंट जिस भी करवट बैठे, राहुल गांधी ने जनता के मध्य पहुंच बनाने की अपनी क्षमता साबित की है। इन सब के पश्चात् उनके सामने कर्नाटका में कांग्रेस सरकार को बरकरार रखने एवं राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ को भी भाजपा से हथियाने की चुनौती होगी। ऐसे सभी कार्यों के लिए उनके पास बहुत ही कम समय है। अगले लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए भी केवल 16 महीनों का ही समय बचता है। पार्टी संगठन को चाक चौबन्ध करने के अलावा नये सहयोगी एवं उभरती प्रतिभाओं तलाश कर अपने साथ जोड़ने पड़ेंगे।
    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

    #Congressparty #RahulGandhi

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