जुआ जो किसी का न हुआ

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  • जनता की आवाज: अरविंद कुमार साहू

इन्टरनेट ने हम सबकी संघर्षशील जिन्दगी जितनी आसान की है, उतनी ही उसके दुरुपयोगकर्ताओं के लिये भी। हर तरह के अपराध इसके जरिये किये जाते हैं और अवैध कमाई का व्यापार भी इसके जरिये खूब फल फ़ूल रहा है । अश्लीलता के सार्वजनिक कारोबार पर कुछ हद तक भारत में लगाम लगाये जाने के बाद अब इस पर जुए का सार्वजनिक कारोबार खुलेआम बढ़ता जा रहा है।

कसीनो, लॉटरी, सट्टा और यहाँ तक कि अब क्रिकेट जैसे बड़े और भद्र खेलों में भी इनामों के नाम पर गुमराह करने वाले नित नये खेल रोज मोबाइल, टीवी स्क्रीनों पर उभर रहे थे। वहाँ सफलता मिलने के बाद अब ये अखबारों में बड़े विज्ञापनों के जरिये सीधे आपको लालच के जाल में फँसाने पर उतर आये हैं।

हर हाथ में मोबाइल वाले उभरते युवा भारत को ऐसे जाल में उलझाने के लिये ये आपको आरम्भ में मुफ्त नकदी भी देने की खुलेआम पेशकश कर रहे हैं। पेटीएम जैसी अग्रणी चाइनीज कम्पनियाँ लोगो के वैलेट से पैसे उड़ाने के लिये अब सर्वाधिक प्रतिष्ठित भारतरत्न जैसे पुरस्कार पाने वाले भद्रजनों को भी अपने खेल में शामिल कर चुके हैं। सचिन तेंदुलकर जैसे नाम का इनके साथ जुड़ना मेरे जैसे लोगों को भारी आश्चर्य में डालने वाला है।

महाभारत के समय से इतिहास गवाह है कि जुआ किसी का भी नही हुआ, चाहे वह किसी भी रूप में हो रहा हो। शुरु में अपना पैसा देकर खेलने की रुचि/प्रवृत्ति पैदा करना, कुछ रकम जीतने देना, फिर आपके लालच को बढाकर आपको निजी रकम लगाने को प्रेरित करके आपका वैलेट खाली करा लेना दुष्ट प्रवृत्ति का सार्वभौम उदाहरण है। इसी लूट प्रवृत्ति को रोकने के लिये एक समय लॉटरी के व्यवसाय पर मुश्किल से रोक लगी थी, लेकिन वही प्रवृत्ति अब लुटेरी चीनी कम्पनियों की शह पर रूप बदल- बदल फिर से पाँव फैलाने लगी है और पैसे के लालच में भारत के भद्रजन सितारे भी इन्हे बढ़ावा देने में जुटे हुए हैं।

क्या हमें अपनी युवा पीढ़ी को सावधान करते हुए इस पतनशील मानसिकता को बढ़ावा देने वाले इन खेलों और उन्हें प्रोत्साहित करने वाली शक्तियों का खुला विरोध नहीं करना चाहिये? जागो बंधुओँ, अब भी समय है। समाज को जागृत करने साथ ही सरकारों पर भी इन्हें प्रतिबन्धित कराने के लिये दबाव डालो, वरना फिर से कोई द्रौपदी इसकी चौसर पर होंगी तथा समाज एक और महाभारत के मुहाने की ओर बढ़ता जायेगा। आप सबकी राय अपेक्षित है।

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