- ज़ीरो जितने हों, जातिगत परिस्थियां एक डंडा लगा कर नंबर की ताकत बना देती हैं
- … और स्थितयां मायावती जैसों को बना देती हैं प्रधानमंत्री की सशक्त दावेदार
- क्योंकि कमज़ोरी ताक़त होती है और ताकत कमजोरी
नवेद शिकोह
बहुत सी मिसालें हैं। फिल्मों में यूनिवर्सिटी कैम्पस की रंगीनियों के विपरीत ज्यादातर विश्वविद्यालयों को गैर से देखिये तो यहां गांव-देहात के तालिबे इल्म सादगी भरे लिबास और अंदाज में सिर में तेल चिपड़े नजर आयेंगे। ना ग्लैमर, ना रंगीनियां, ना रोमांस, ना आमिर खान या रणवीर कपूर जैसा कोई हीरो ना माधुरी.. कैटरीना जैसी हिरोइन।
अस्ल में शहर के रईसजादे दोलत के घमंड और ऐश-ओ-आराम वाली सिक्योर लाइफ के नशे में यूनिवर्सिटी तक जाने का संघर्ष भी नहीं कर पाते। गांव का गवार मुश्किल जिन्दगी को बेहतर जिन्दगी में बदलने के संघर्ष में कामयाबी की मंज़िल पर पंहुचने के लिए अनुशासन और परिश्रम के रास्ते पर चलता रहता है।
सम्पन्न घर का बच्चा लक्जरी कार से उतरते हुए मामूली कुत्ते को भौंकता देख डर सकता है। फुटपाथ पर बर्तन धोने वाले बच्चे को देखकर वही कुत्ता भौंकने बंद करके दुम हिलाने लगता है।
कहने का मतलब ये है कि कमजोर हमेंशा ताकत पाने के संघर्ष में समर्पित, अनुशासित, चौकन्ना और एकजुट रहता है। जबकि सम्पन्न और ताकतवर घमंड, वर्चस्व और अति आत्मविश्वास के नशे में अंधा होकर कमजोर हो जाता है। खासकर सियासत में।
देश की आजादी के 67 साल के लम्बे अरसे बाद भाजपा को शानदार तरीके से बहुमत से सरकार बनाने का मौका मिला। वजह ये थी कि ब्राह्मण-बनिया-ठाकुर की पार्टी कहे जाने वाली भाजपा इस बार धर्म यानी हिन्दुत्व का कार्ड खेलने में कामयाब हो गयी थी। पिछड़ों और दलितों ने एक बार भाजपा को आजमाने का फैसला कर लिया। ये भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग का कमाल ही नहीं था दलितों-पिछड़ों द्वारा अपनी खैरख्वाह दलों की पाचन शक्ति को दुरुस्त करने के राजनीतिक उपवास पर भेजने का एक एक्सपेरिमेंट भी था।
ब्राह्मण – बनिया-ठाकुर चाहते तो आपसी एकता बनाये रखते। दलितों-पिछड़ों के साथ बेहतर सामंजस्य बनाकर भाजपा को कम से कम दो-टर्म की सत्ता देने का माहौल बनाते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ब्राह्मण – क्षत्रिय अपने-अपने घमंड को नहीं छोड़ पाये। ना तो आपसी सामंजस्य बना सके और ना दलितों-पिछड़ों को अपनाने के लिये अपना एटीट्यूड बदला। ये भी वजह हैं कि बेहतरीन मैनेजमेंट के बाद भी लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा दुबारा सरकार बनाने की स्थिति में कम ही नजर आ रही है।
भारतीय समाज में कमजोर कहे जाने वाले दलित-पिछड़े और उनका साथ देने वाला मुस्लिम समाज एकजुट होकर एकबार फिर सबसे बड़ी सियासी ताकत बनने की जुगत में है। दलितों की संख्या से बढ़कर उनकी एकता और एकजुटता सबसे सशक्त है। इसलिए उनकी सबसे बड़ी नेता मायावती को आज प्रधानमंत्री का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। दिलचस्प बात ये है कि जो लोकसभा में शून्य है। जो बसपा अपने गण यूपी के पिछले विधानसभा चुनाव में सबसे बुरी तरह हारी, उस पार्टी की मुखिया मायावती प्रधानमंत्री पद की दौड़ में आगे हैं। ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि भाजपा का पारंपरिक वोटर पार्टी के आगंतुक वोटरों के साथ ट्यूनिंग नहीं बना सका।
इस दोष को भला भाजपा का मैनेजमेंट कैसे संभाले। क्योंकि जो धर्म की लत में फंस सकता है वो जाति का नशा ज्यादा दिन तक नहीं छोड़ सकता।







