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    Home»ब्लॉग

    प्रकृति की कराह और मनुष्य की आत्मघाती महत्वाकांक्षा

    ShagunBy ShagunMay 21, 2026Updated:May 22, 2026 ब्लॉग No Comments5 Mins Read
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    My paths are empty of trees, I am a wretched babe!
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    अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर विशेष

    अलका शुक्ला

    ब्रह्मांड की अनंत शून्यता में हमारी पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ज्ञात जीवंत कोना है, जिसे प्रकृति ने अपने हाथों से सँवारा है। यहाँ का हर एक कोना, हर एक पत्ती और हर एक जीव उसी विराट कैनवास का हिस्सा है जिसे हम जैव विविधता कहते हैं। यह जैव विविधता कोई विलासिता या वैज्ञानिक शब्दावली नहीं, बल्कि इस धरती की वो अंतर्निहित जीवनदायिनी धड़कन है जो हमें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन, पीने के लिए पानी और जीने के लिए भोजन देती है। लेकिन आज जब हम विकास की ऊँची अट्टालिकाओं से नीचे झांकते हैं, तो पाते हैं कि मनुष्य के तात्कालिक और संकीर्ण स्वार्थों ने उस माँ के आँचल को लहूलुहान कर दिया है, जिसने उसे जनमा और पाला। अपनी रोजमर्रा की सुख-सुविधाओं और अंधाधुंध मुनाफे की होड़ में हम यह भूल गए हैं कि एक अदृश्य ताने-बाने की तरह इस पृथ्वी पर मौजूद सूक्ष्म बैक्टीरिया से लेकर विशालकाय समंदर और सघन जंगलों तक, सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। जब हम इस प्राकृतिक संतुलन को अपनी लालच की कुल्हाड़ी से काटते हैं, तो असल में हम अपनी ही रगों को काट रहे होते हैं।

    औद्योगिक क्रांति के बाद से मनुष्य ने प्रकृति पर विजय पाने के मिथ्या दंभ में अपने तात्कालिक स्वार्थों को सर्वोपरि मान लिया। आज हमारी स्थिति उस नासमझ व्यक्ति जैसी हो गई है, जो उसी डाल को काट रहा है जिस पर उसका आशियाना टिका है। अमेज़न के जिन वर्षावनों को हम “पृथ्वी का फेफड़ा” कहते हैं, उन्हें आज सोयाबीन की खेती और कंक्रीट के जंगलों के लिए बेरहमी से साफ किया जा रहा है। हमारी जीवनदायिनी नदियाँ औद्योगिक कचरे के कारण विषाक्त नालों में तब्दील हो चुकी हैं और तात्कालिक सुविधा के लिए बनाया गया प्लास्टिक आज महासागरों में तैरते हुए समुद्री जीवों को तड़पा-तड़प कर मरने पर मजबूर कर रहा है।

    इंसानी बस्तियों के फैलाव और जंगलों के सफाए के कारण आज जीव-जंतुओं की प्रजातियाँ सामान्य से हजार गुना तेजी से विलुप्त हो रही हैं, जिसे वैज्ञानिक इतिहास की छठी सामूहिक विलुप्ति कह रहे हैं। डोडो पक्षी और तस्मानियन टाइगर की तरह हज़ारों मूक जीव हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो गए। इस बेतरतीब दोहन का परिणाम बेमौसम बरसात, भीषण सूखा, जंगलों की आग और कोविड-19 जैसी उन महामारियों के रूप में सामने आ रहा है, जो वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट होने के कारण हमारे दरवाजों तक आ पहुँची हैं।

    इसके विपरीत, यदि हम अपने क्षणिक स्वार्थों के चश्मे को उतारकर प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण की ओर कदम बढ़ाते हैं, तो इसके लाभ केवल नैतिक नहीं, बल्कि अत्यधिक व्यावहारिक और आर्थिक भी हैं। प्रकृति मुफ़्त में जो परागण, जल शोधन और कार्बन अवशोषण जैसी अनमोल सेवाएं देती है, उसकी कीमत दुनिया की कोई भी अर्थव्यवस्था मिलकर नहीं चुका सकती। अगर मधुमक्खियाँ और अन्य कीट परागण करना बंद कर दें, तो दुनिया की एक-तिहाई फसलें गायब हो जाएंगी और इंसानी सभ्यता भुखमरी की कगार पर खड़ी होगी। इसके अलावा, हमारी आधुनिक दवाओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी प्राकृतिक वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों पर ही निर्भर है। जैव विविधता को बचाना, असल में कैंसर और अन्य असाध्य बीमारियों के भविष्य के इलाज़ को सुरक्षित रखना है। प्रकृति हमें केवल जीवन के साधन ही नहीं देती, बल्कि मानसिक और आत्मिक शांति भी देती है, जिसकी तलाश में आज का तनावग्रस्त इंसान भटक रहा है।

    इसे हम भारत के असम में स्थित काजीरंगा के उदाहरण से समझ सकते हैं, जहाँ का दलदली इलाका और वन्यजीव केवल पर्यटन का जरिया नहीं हैं, बल्कि वे बाढ़ के पानी को सोखकर आस-पास के गांवों को तबाही से बचाते हैं। यदि हम शॉर्ट-टर्म मुनाफे के लिए ऐसे प्राकृतिक क्षेत्रों में खनन या फैक्ट्रियों को बढ़ावा दें, तो तात्कालिक रूप से कुछ करोड़ रुपयों का राजस्व तो मिल जाएगा, लेकिन दीर्घकाल में जो तबाही आएगी उसकी भरपाई देश का पूरा बजट मिलकर भी नहीं कर पाएगा। अब समय आ गया है कि हम सतत विकास की कागजी परिभाषाओं से आगे बढ़कर सह-अस्तित्व को अपने जीवन का हिस्सा स्वीकारें। प्रकृति हमारे बिना फल-फूल सकती है, लेकिन हम प्रकृति के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकते।

    डायनासोरों का अंत एक प्राकृतिक आपदा से हुआ था, लेकिन अगर इंसानी सभ्यता का अंत हुआ, तो इतिहास इसे एक सामूहिक आत्महत्या कहेगा। जब आप अगली बार किसी पेड़ की छाँव में बैठें, तो खुद से पूछें कि क्या हमारी आधुनिक जीवनशैली की कीमत इस मासूम हरियाली का खामोश हो जाना है? विकास के नाम पर जगह जगह न जाने कितने वृक्ष रोज काटे जाते हैं, रोज नदियों का सीना चीरा जाता है, पहाड़ों को चूर चूर किया जा रहा है, जंगल खत्म किए जा रहे हैं! विकास की ऐसी गति कहीं मानव सभ्यता की ही गति न कर दे। वास्तव में विकास की गति ऐसी हो जो पृथ्वी को मरुस्थल न बनाए, बल्कि उसे और समृद्ध करे। क्योंकि यह धरती हमें हमारे पूर्वजों से विरासत में नहीं मिली है, बल्कि हमने इसे अपनी आने वाली संतानों से उधार ले रखा है, और उधार की चीज़ को सही-सलामत लौटाना ही मनुष्य होने की पहली और आखिरी शर्त है।

    Shagun

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