हेमंत पाल
किसानों को नहीं दलालों को मिला, समर्थन मूल्य बढ़ने का फ़ायदा! मध्यप्रदेश में चने की पैदावार सबसे ज्यादा होती है। लेकिन, सरकार की हठधर्मी से इसी चने के कारोबार पर घना साया है। चने से जुड़े व्यापार, दाल मिल और आढ़तियों से लगाकर मंडी व्यापार से जुड़े छोटे-छोटे कारोबारी और हम्माल तक सड़क पर आ गए। जो चना 3300 से 3500 रुपए क्विंटल बिकना था, सरकार ने उसका समर्थन मूल्य 4400 रुपए घोषित किया और ऊपर से 100 रुपए क्विंटल बोनस जोड़ दिया। इस सरकारी मनमर्जी का असर कहाँ, कैसा पड़ा इसकी सरकार को कोई खबर नहीं है! पहली नजर में ये फैसला किसानों के हित में दिखाई देता है, जबकि ये सारा खेल अफसरशाही के दिमाग की उपज है और सबसे ज्यादा माल भी उनकी जेब में गया, न कि किसान झोली में!
मध्यप्रदेश में रबी की फसल चने की अनुमानित पैदावार करीब 40 लाख क्विंटल है। सरकार ने इस साल 26 फ़रवरी को चने का समर्थन मूल्य 4400 रुपए घोषित किया। इसका सीधा सा मतलब है कि किसानों को जो चना मंडी में लाकर 3300 से 3500 रुपए में बेचना था, उसे सरकार ने एक हज़ार रुपए ज्यादा में खरीदने की बात कह दी। सरकार की घोषणा से लगता है कि सरकार ने किसानों के दर्द को समझा और महंगा चना खरीदकर उन्हें फ़ायदा दिया है। लेकिन, असलियत कुछ और ही है। जो लाभ किसानों की जेब में जाना था, वो चाँदी अफसरों की जेब में गई! सरकार की इस घोषणा के साथ ही अफसरों के दलाल पूरे प्रदेश में सक्रिय हो गए! जानकारी के मुताबिक इन दलालों ने पंजीकृत किसानों से संपर्क करके 3800 से 4000 रुपए में किसानों से सीधे चना खरीद लिया और सरकारी खरीदी सेंटर तक पहुंचा दिया। किसानों को घोषणा के मुताबिक प्रति क्विंटल हज़ार रुपए ज्यादा मिलना थे। लेकिन, उसमें बंदरबांट हो गई और उन्हें मिले 300 से 500 रुपए! इन दलालों ने ट्रांसपोर्टेशन से लगाकर तुलाई तक का पूरी जिम्मेदारी ली, इस कारण किसान इन परेशानी से मुक्त रहा!
सरकार का दावा है कि प्रदेश में चने की सर्वाधिक खरीदी की गई और किसानों को मालामाल कर दिया! जबकि, परदे के पीछे की कहानी कुछ और है। जिस प्रदेश में 40 लाख क्विंटल चना उपजा और सारा चना सरकारी गोदामों में पहुँच गया! इसका मतलब है कि अब न तो किसानों के पास चना बचा, न मंडी में आया, न दाल मिलों को मिला और न पैकिंग करने वालों के पास तक पहुंचा! लेकिन, सच्चाई ये है कि चने की जो फसल 4400 रुपए क्विंटल पर सरकारी सेंटरों तक पहुंची है, वो सिर्फ मध्यप्रदेश के खेतों में उपजी हो, ये जरुरी नहीं! किसानों ने बताया कि सीमावर्ती राज्यों से भी चना लाकर समर्थन मूल्य पर बेच दिया गया। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से सस्ता और घटिया चना लाकर किसानों के नाम पर बेचा गया है। ऐसे कुछ प्रकरण सामने भी आए। इस बंदरबांट में दलालों की पूरी चैन बन गई थी, इसलिए उसे न तो देखा गया और न परखा गया। किसान इसलिए संतुष्ट हो गए कि उनका चना घर बैठे 400 से 500 रुपए क्विंटल ज्यादा में बिक गया!
अब जरा ये भी समझ लिया जाए कि प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों से आए चने को कैसे एडजस्ट किया गया। इस बंदरबांट में ऊपर से नीचे तक के छोटे से लेकर बड़े अफसर तक शामिल थे, इसलिए कहीं कोई पेंच नहीं छोड़ा गया। जिन किसानों ने लहसुन, प्याज या चने के अलावा और भी कोई फसल लगाई थी, उनके खातों में चना दर्ज किया गया! गंभीरता से पड़ताल की जाए तो समझा जा सकता है कि प्रदेश में चने की बोवनी से कहीं ज्यादा चने की पैदावार हुई?
दरअसल, बाहर से खरीदे गए चने को ऐसे ही एडजस्ट किया गया! बताते हैं कि घटत और तौल में भी बड़ी गड़बड़ियां की गई! जानकारी के लिए बता दें कि प्रदेश में 2016 में चने का रकबा 10 हजार 300 हेक्टेयर था। उसे 2017 में बढ़ाकर 13 हजार हेक्टेयर किया गया। इस तरह चने के रकबे में 26 प्रतिशत की बढ़ोतरी का लक्ष्य था। अफसरों ने सरकार को इस तरह तो चूना लगाया ही, चने की पूरी फसल के मंडी तक न पहुँचने से भी एक बड़ा तबका प्रभावित हुआ है। (हेमंत पॉल के ब्लॉग से साभार)








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