जी के चक्रवर्ती
राष्ट्रपति के अभिभाषण में संपूर्ण देश में एक साथ चुनाव की चर्चा के बाद बेहतर है कि सभी राजनीतिक दल इसे अमल में लाने को लेकर चिंतन अवश्य करें। संसद के संयुक्त सत्र के संबोधन में देश के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने कहा कि लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की पैरवी से यह बात स्पष्ट है कि मौजूदा सरकार इस मुद्दे को लेकर बहुत गंभीर है। चूंकि राष्ट्रपति द्वारा संसद में दिए जाने वाले अभिभाषण वर्त्तमान सरकार का नीतिगत दस्तावेज का प्रतिरूप होता है, इसलिए उसमें एक साथ चुनाव का विचार शामिल होने से यह और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इस पर विपक्षी दलों की जिस तरह की भी राय हो, लेकिन इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि पहले आम चुनाव के बाद से लंबे समय तक पुरे पांच वर्षों के बाद लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही होते रहे।
यह बात पृथक है कि उस वक्त केंद्र एवं देश के लगभग सभी राज्यों में कांग्रेस की ही सरकार हुआ करती थी इसलिए विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव एक साथ होने के विरोध न होने से किसी तरह की अर्चन नहीं थी लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरते गए एवं आगे आने वाले भविष्य के दिनों में जब सरकारे अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही गिर जाने लगी ऐसी इस्तिथी में मध्यावधि चुनाव की नौबत उपस्तिथ होने लगी एसे अन्य कारणों से एक संविधानसम्मत स्वस्थ परंपरा टूटती चली गई। इसके स्थान पर लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव पृथक-पृथक होने जैसी परंपरा ने समाज में जन्म लिया।

इससे विचित्र और कुछ भी नहीं हो सकता है कि यह जानते हुए भी इस बदली हुई परंपरा को उपयुक्त बताया जाने लगा कि बार-बार होने वाले इन चुनाव से राजनीति की लय तो बाधित होती ही है साथ ही साथ देश के ऊपर आर्थिक बोझ भी साबित होता हैं।
यह बात बहुत अच्छी होगी कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में एक साथ देश में चुनाव कराये जाने की बात कहे जाने के बाद सभी राजनीतिक दलें इस पर गंभीरता से विचार-विमर्श करें कि इसे तरह के देश एवं जनता हीत की उत्तम विचार को पुनः कैसे अमल में ला सके। निस्संदेह इसके लिए संविधान में उपयुक्त संशोधन करने की आवश्यकता होगी, लेकिन यह कोई बहुत कठिन कार्य भी नहीं है। ऐसे नियम-कानून आसानी से ही बनाए जा सकते हैं, जिससे कि कभी केंद्र या राज्य सरकारों के अल्पमत में आ जाने पर बिना मध्यावधि चुनाव के ही नई सरकार का गठन किया जा सके। यह कहना कोई अतिशियोक्ति जैसी बात नहीं होगी कि दुनिया के कई देशों ने ऐसे उपाय कर रखे हैं कि कभी भी वहां के सरकार अल्पमत में आने के बाद मध्यावधि चुनाव जैसे परेशानियों से बचा जा सके। आखिरकार हमारे देश में ऐसा क्यों नहीं हो सकता?
देश में मध्यावधि या एक के बाद चुनावों के सिलसिले को समाप्त किये जाने से न केवल राजनीतिक तंत्र में सुधारों के प्रयासों को बल मिलने के अतिरिक्त देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी बहुत मददगार साबित होगा। इससे आर्थिक संसाधनों के अलावा मानव संसाधन पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ से बचाने के साथ ही विकास को गति देने में भी सहायक सिद्ध होगी। यहाँ एक प्रश्न उठाना भी लाजमी है कि ऐसी इस्थिति में जब पुरे राष्ट्र में एक ही पार्टी की सरकार केंद्र एवं राज्य दोनों ही जगह की सत्ता में हो तो यह संभव है और यदि ऐसा नहीं है तो देश की विपक्षी पार्टी के लोग इस बात को लेकर विरोध शुरु कर सकते हैं कि केंद्र में जिस पार्टी की सरकार सत्ता पर काबिज होगी उस पार्टी को देश के राज्यों में होने वाले चुनावों में उसी को लाभ मिलने की संभावना अधिक होगी।
इस तरह के कारणों के बावजूद हमारे देश के सभी राजनीतिक वर्गों के लोग इस बात से भी अनजान नहीं है कि देश में बार-बार चुनाव होने के कारण आचार संहिता लागु होने से किस तरह विकास प्रक्रियां बाधित होती हैं, इसके साथ ही साथ राजनीतिक पार्टियां भी इस बात से भली-भांति परिचित होगी कि चुनावों के घोषणा होते ही सभी दलों की भाव-भंगिमाएं कैसे बदल जाया करती है, जिसकी वजह से कई बार तो सामाजिक माहौल भी प्रभावित होने का खतरा मंडराने लगता है। चूंकि उस वक्त चुनावी मुद्दों के सामने अन्य सभी तरह के मसले पीछे चले जाने से समाज के अनेकों तरह के आवश्यक कार्य भी प्रभावित होते हैं। इस प्रकार की इस्तिथीयों को हम आदर्श कतई नहीं कह सकते हैं। यदि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने पर सहमति बनती है तो इससे जनता को तो अनेको तरह की परेशानीयों से निजात मिलेगी, लेकिन कुछ विपक्षी राजनीतिक दलें इस बात की आड़ ले सकती हैं, लेकिन उन्हें ऐसा करने से बचना चाहिए एवं राष्ट्रहित के साथ ही साथ जनहित को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देना होगा। आखिरकार देश के किसी भी राजनीतिक पार्टी का हित राष्ट्रहित से ऊपर तो नहीं हो सकता।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)







