नेपाल का आंतरिक घमासान किसी से अब छुपा नहीं है वैसे भी वह भारत के कई मामलों में अपना विरोध स्पष्ट कर देता था लेकिन एक न एक दिन उसका भी नम्बर आ ही गया ! मालूम हो कि नेपाल में एक अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया है। यह राजनीतिक संकट तब उत्पन्न हो गया जब राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सिफारिश पर रविवार को प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया और मध्यावधि चुनाव की तारीख की घोषणा कर दी। इसको लेकर सत्तारूढ़ पार्टी के एक धड़े में विरोध उत्पन्न हो गया।
यहाँ कि सत्ताधारी एनसीपी प्रधानमंत्री ओली और कार्यकारी अध्यक्ष पुष्प कमल दहल प्रचंड के नेतृत्व वाले गुटों के बीच विभाजित प्रतीत हो रही है जिसका गठन दो साल पहले ओली के नेतृत्व वाले सीपीएन-यूएमएम और प्रचंड के नेतृत्व वाले सीपीएन-माओवादी सेंटर के बीच विलय से हुआ था। सच तो यह है कि ओली व प्रचंड दोनों की महत्वकांक्षी नेता हैं और दोनों का पर्याप्त जनाधार है जिसका उदाहरण पिछले चुनाव उनको मिली सीटें हैं।
यह ठीक है कि अकेले सरकार बनाने का जनादेश उनमें किसी को भी नहीं मिल पाया लेकिन इस बात का रास्ता दोनों ने अपने दलों का विलय कर सरकार बनाने के रूप में निकाला। महत्वाकांक्षा जब हद से बढ़ जाय तो वह नुकसानदायक भी होती है। यही हाल यहां भी हुआ।
ओली ने जब सरकार को अपने ढंग से चलाना चाहा और उस रास्ते में आ रही बाधाओं को अपने ढंग से संतुलित करना चाहा तो यह बात प्रचंड के गले नहीं उतरी जो पूर्व में भी एक बार देश की सत्ता संभाल चुके हैं। इसी तनातनी के बीच चीन ने भी इस राष्ट्र के मामलों में दखल देना शुरू कर दिया है। अपने देश में चीन का दखल ओली ने ही बढ़ाने को प्रोत्साहन दिया था।
नेपाल में चीन की राजदूत तो कई मौकों पर हस्तक्षेप कर ही रही थीं, ताजा संकट के मद्देनजर चीन के एक उपमंत्री को भी वहां के हालात का जायजा लेने के लिए भेजा जा रहा है। इस तरह माना जा सकता है कि नेपाल एक नये तरह के संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। अब यह आने वाले दिनों में देखने वाली बात होगी कि ओली और प्रचंड के बीच मतभेद क्या रूप लेते हैं और किस दूरी तक जाते हैं। यह भी देखने की बात होगी कि इसका समाधान क्या निकलता है। भारत इस पर निश्चित रूप से नज़र बनाये रखेगा।







