जी के चक्रवर्ती
गरीबी से संघर्ष क्या होता है यह कोई हिमा दास से पूंछे। बचपन ही जब गरीबी और जातिवाद में बीता हो तो यह समझा जा सकता है कि गरीबों को आसमां छूने के सपने नहीं देखना चाहिए, लेकिन जब इरादे पक्के और मेहनत से भरे हों रास्ते बन ही जाते हैं।
ज़िद है तो ज़िद ही सही…
आत्मसम्मान से बढ़कर कुछ भी नहीं!
26 फरवरी 2021 को हमारे देश के असम राज्य की एक धाविका हिमा दास को एक भव्य समारोह में असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल असम प्रदेश के पुलिस के उप अधीक्षक (डीएसपी) पद की नियुक्ति पत्र देकर महिला सशक्तिकरण का एक अच्छा उदाहरण पेश किया है।

एशियाई खेलों की रजत पदक विजेता और जूनियर विश्व चैम्पियन हिमा दास पुलिस की नौकरी के साथ खेलों में भी जुड़ी रह कर अपना कैरियर को इस क्षेत्र में और आगे ले जाने का इरादा रखती हैं। आज हिमा दास के यहां तक पहुंचने का श्रेय सम्पूर्ण रूप से खेलों को ही जाता है। वे सदैव असम प्रदेश में खेलों की बेहतरी और उन्नति के लिए काम करते रहने का इरादा रखते हुये अपने असम प्रदेश को देश के हरियाणा राज्य की तरह सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला एक राज्य बनाने की भरपूर कोशिश करने का इच्छा रखतीं हैं। वे असम पुलिस की सेवा करते हुए भी अपने कैरियर को आगे ले चलने का इरादा रखतीं हैं।

हिमा का जन्म देश के असम राज्य के नगांव जिले में स्थित कंधूलिमारी गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम रणजीत दास तथा माता का नाम जोनाली दास है। उनके माता पिता एक किसान के रूप में चावल की खेती करते थे और हिमा दास अपने चार भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं। हिमा अपने विद्यालय के दिनों में लड़कों के साथ फुटबॉल खेलकर क्रीड़ाओंं मेंं अपनी रुचि को उजागर किया था। हिमा अपना कैरियर फुटबॉल में देख रही थीं और अपने देश के लिए खेलने की उम्मीद लगाये प्रयास कर रही थीं।

उन्ही दिनों “जवाहर नवोदय विद्यालय के शारीरिक शिक्षक शमशुल हक की सलाह पर उन्होंने दौड़ना प्रारम्भ किया। शमशुल हक़ ने उनकी पहचान नगाँव स्पोर्ट्स एसोसिएशन के गौरी शंकर रॉय से करायी और फिर हिमा दास जिला स्तरीय प्रतियोगिता में चयनित हुईं जिसमे उन्होंने दो स्वर्ण पदक भी जीतीं।
एक किसान परिवार में रुपये-पैसों की बहुत अहमियत होती है। अनेको तरह की मुसीबतों औऱ अनेको तरह की मुसीबतों से समझौतों करते और उनसे रू-ब-रू होते हुए अनेको संघर्षों के बाद भी हिम्मत न हारते हुये हिमा अपनी ट्रेनिंग में अच्छी निकली और मेहनत करने में उनका कोई जोड़ नहीं था।
हिमा को इस तरह प्रयास करते देखकर यह उनके पिता का दिल जुड़ा गया। ट्रेनिंग के लिए अच्छे जूतों की आवश्यकता थी लेकिन हिमा कभी आपने पिता से इसकी मांग करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई लेकिन हिमा के पिता सब कुछ समझ गये और वे गुवाहाटी रवाना हुए। उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई से 1200 के जूते हिमा की ट्रेनिंग के लिए खरीद लाये रास्ते भर वे उन जूतों को यूं सहेज कर घर लाए मानो कोई बच्चा हो। उस दृश्य की कल्पना कीजिए, जब एक गरीब किसान पिता ने जूते हिमा को सौंपे होंगे, जैसे कोई अपनी विरासत सौंप रहा हो। वे जूते “ADIDAS ” फुटवियर बनाने वाली जर्मन की कंपनी के थे। इस क्षेत्र में इस कम्पनी की तूती बोलती है। वर्ष सितंबर 2018 में इस कम्पनी ने हिमा दस को एक चिट्ठी लिखकर उन्हें अपना एम्बेसडर बनाया था। उस वख्त से उनका नाम ADIDAS के जूतों पर छपता है। आज हिमा खुद एक ब्रांड हैं, जिसकी रफ्तार लगातार तेज और तेज होती चली जा रही है।
एथलेटिक्स में पदापर्ण करने के लिये हिमा दास को सर्वप्रथम अपने परिवार को छोड़कर उनके घर से लगभग 140 किलोमीटर दूर गुवाहाटी जाकर वहां रहने पड़ता इसके लिये पहले पहले उनके परिजन राजी नहीं थे, लेकिन उनके कोच “निपोन दा” ने इसके लिये उन्होंने बहुत जिद्दोजहद के बाद उनके परिजनों समझने और मनाने के बाद ही हिमा की कामयाबी का सफर शुरू हुआ।
सबसे पहले हिमदास के गोल्ड मेडल जीतने और उसके बाद “इंडियन एथलीट्स” के साथ एलीट क्लब में शामिल हुई थीं।
उनके कोच निपोन दास को पूरा विश्वास था,कि उनकी शिष्या कम से कम टॉप थ्री में अवश्य शामिल की जाने वाली है। उस समय हिमा दास ने 400 मीटर की रेस में अपनी ताकत का पूरी दुनिया में लोहा मनवाया था।
आईएएएफ वर्ल्ड अंडर-20 एथलेटिक्स चैम्पियनशिप की 400 मीटर दौड़ स्पर्धा में वे स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं। हिमा ने 400 मीटर की दौड़ स्पर्धा में 51.46 सेकेंड का समय निकालकर स्वर्ण पदक जीता था।
चेक गणराज्य में आयोजित क्लाड्नो एथलेटिक्स में भाग लेने पहुंचीं हिमा दास ने 17 जुलाई 2019 को मुख्यमंत्री राहत कोष में राज्य में बाढ़ के लिए अपने वेतन का आधे महीने की वेतन भी दान कर दिया था। इसके अलावा उन्होंने देश की बड़ी कंपनियों और व्यक्तियों से भी इसमे आगे आकर असम की मदद करने की आग्रह किया था।
हिमा दास बचपन से ही एक पुलिस अधिकारी बनने का सपना देखती थीं। स्कूली दिनों से ही उनमें एक पुलिस अधिकारी बनने की ललक उनके अंदर भारी थी इसी तरह की इच्छा उनकी मां का भी था, जिसके कारण बचपन मे ही उनकी मां द्वारा दुर्गापूजा के दौरान खिलौने के रूप में एक बंदूक दिया करती थी। उनकी मां की महानतम इच्छा यह थी कि वे असम पुलिस में भर्ती हो कर देश के साथ साथ विशेषतः असम की सेवा कर एक आदर्श और अच्छी इंसान बने। हिमा दास ने अपनी मां की इच्छा को आज फलीभूत कर दिखाया है।








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