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    हिंदू देवी-देवताओं के चित्रों के जनक राजा रवि वर्मा

    By October 2, 2018 Featured 5 Comments8 Mins Read
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    पुण्यतिथि -2 अक्टूबर पर विशेष

    राजा रवि वर्मा का निधन आज ही के दिन यानि 2 अक्टूबर, 1906 को हुआ था। राजा रवि वर्मा भारत के सबसे विख्यात चित्रकार थे। उन्होंने भारतीय साहित्य और संस्कृति के पात्रों का चित्रण किया। उनके चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता हिंदू महाकाव्यों और धर्मग्रन्थों पर बनाए गए चित्र हैं। हिन्दू मिथकों का बहुत ही प्रभावशाली इस्‍तेमाल उनके चित्रों में दिखता हैं। बता दें कि वडोदरा (गुजरात) स्थित लक्ष्मीविलास महल के संग्रहालय में उनके चित्रों का बहुत बड़ा संग्रह है।

    राजा रवि वर्मा ऐसे पहले चित्रकार थे जिन्होंने हिंदू देवी-देवताओं को आम इंसान जैसा दिखाया, आज हम फोटो, पोस्टर, कैलेंडर आदि में सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, राधा या कृष्ण की जो तस्वीरें देखते हैं वे ज्यादातर राजा रवि वर्मा की कल्पनाशक्ति की ही उपज हैं।

    विवादों ने दी मानसिक प्रताड़ना:

    राजा रवि वर्मा को भी कुछ वही परेशानी झेलनी पड़ी थी जो मकबूल फिदा हुसैन ने झेली। वैसे भी वह 125 साल पहले का भारत था। उन पर आरोप लगे थे कि उन्होंने उर्वशी, रंभा जैसी अप्सराओं की अर्द्धनग्न तस्वीरें बनाईं. कई लोगों ने इसे हिंदू धर्म का अपमान माना। उन पर देश में कई जगह सालों तक मुकदमे चले। इसमें रवि वर्मा का काफी आर्थिक नुकसान हुआ और उन्हें काफी मानसिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी. बताते हैं कि उनसे नाराज लोगों ने उनकी मुंबई स्थित प्रेस को जला दिया था। इस अग्निकांड में न केवल मशीन बल्कि उनके कई बहुमूल्य चित्र भी जल गए। हालांकि कई इस बात को सच नहीं मानते। उनके मुताबिक प्रेस में घाटा होने पर उन्होंने उसे किसी जर्मन चित्रकार को ​बेच दिया था।

    राजा रवि वर्मा पर एक और आरोप लगाया गया कि सरस्वती और लक्ष्मी जैसे कई हिंदू देवियों का चेहरा उनकी प्रेमिका सुगंधा से मिलता है। लोग कहते हैं कि रवि वर्मा अपने चित्र और पोर्ट्रेट के लिए सुगंधा की ही सहायता लिया करते थे। सुगंधा नामक यह लड़की किसी वेश्या की बेटी भी बताई गई। कट्टरपंथियों ने इसे लेकर उन पर हिंदू धर्म को अपवित्र करने का आरोप लगाया। इस मामले को लेकर भी काफी दिनों तक उन्हें मुसीबतें झेलनी पड़ी।

    राजा रवि वर्मा (1848 – 1906)

    राजा रवि वर्मा का जन्म तिरुवनन्तपुरम के किलिमानूर राजमहल में 29 अप्रैल 1848 को हुआ था। उनके प्रथम गुरु चित्रकार मातुल राजराजवर्मा थे । उन दिनों साफ किये गये फर्श पर चूने के आकृतियाँ बनवाकर प्रशिक्षण देने का रिवाज़ था । बाद में कागज़ पर पेंसिल से चित्र खिंचवाने की परम्पारा आरंभ हुई। उस काल में बाज़ार में रंगों का मिलना मुश्किल था। उन दिनों चित्रकार पौधों और फूलों से रंगों का निर्माण करते थे। परंपरागत शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत प्रशिक्षण पाने वाले प्रतिभावान बालक रवि वर्मा मई 1862 ईं में अपने मातुल राजराज वर्मा के साथ तिरुवनन्तपुरम पहुँचे और उन्होंने आयिल्यम तिरुन्नाल महाराजा से भेंट की । महाराजा ने बालक को चित्रकला की शिक्षा प्राप्त करने के लिए तिरुवनन्तपुरम में ठहरने का आदेश दिया। तिरुवनन्तपुरम में रहने से यह लाभ हुआ कि राजमहल के चित्रों, जो इतालियन नवजागरण शैली के थे, को देखकर उन्हें काफी कुछ सीखने का अवसर मिला, साथ ही वे तमिलनाडु की चित्रकला भी सीख सके ।

    रविवर्मा पाश्चात्य चित्रकला तथा तैल चित्र निर्माण से तभी परिचित हो पाये जब सन् 1868 में तिरुवनन्तपुरम में थियडोर जेनसन नामक डच चित्रकार से उनकी मुलाकात हुई । रविवर्मा ने महाराजा और राज परिवार के सदस्यों के चित्र नवीन शैली में बनाये। सन् 1873 ईं से चेन्नै में आयोजित चित्रप्रदर्शनी में ‘मुल्लप्पू चूटिया नायर स्त्री’ (चमेली के फूलों से केशालंकार करती नायर स्त्री) नामक चित्र को प्रथम स्थान मिला जिससे रविवर्मा प्रसिद्ध हो गये । ऑस्ट्रिया के वियना में सम्पन्न हुई चित्र प्रदर्शनी में भी यही चित्र पुरस्कृत हुआ । अगले वर्ष उन्होंने ‘तमिल महिला की संगीत साधना’ (1874) नाम से जो चित्र बनाया था वह भी चेन्नै की प्रदर्शनी में पुरस्कार हुआ । यही चित्र ‘दारिद्रय’ शीर्षक से तिरुवनन्तपुरम की श्री चित्रा आर्ट गैलरी में प्रदर्शित है । 1876 ईं में ‘शकुन्तला की प्रेम दृष्टि’ चेन्नै प्रदर्शनी में पुरस्कृत हुई । पाँव में लगे काँटे को निकालने के बहाने दुष्यंत को मुडकर देखती ‘अभिज्ञानशाकुन्तळम्’ की शकुन्तला का चित्र उनके सर्वाधिक प्रसिद्ध चित्रों में एक है । ब्रिटिश प्राच्यविद् मेनियर विलियंस ने अपने शकुन्तलानुवाद के मुखपृष्ठ पर इसी चित्र को प्रस्तुत किया था ।

    तिरुवितांकूर के दीवान सर टी. माधवराव रविवर्मा को जानते थे । माधवराव बडौदा (बडोदरा) के महाराजा के सलाहकार थे । सन् 1880 ईं में माधवराव जब तिरुवनन्तपुरम पधारे तब उन्होंने रविवर्मा के कुछ चित्र खरीद लिये । रविवर्मा के जीवन में बडौ़दा के राज परिवार ने जो योग दान दिया, उसका आरंभ यहीं से हुआ ।

    रविवर्मा चित्र का सबसे बडा़ निजी संग्रहालय आज भी बडौदा राजपरिवार के पास है। 1881 ईं में बडौदा के महाराजा सयाजि राव गायकवाड़ के राज्याभिषेक के अवसर पर रविवर्मा को उसमें सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया गया । रविवर्मा अपने अनुज राजराजवर्मा के साथ बडौ़दा गये और वहीं चार महीने ठहरे । इस कालावधि में अनेक ऐसे चित्र बनाए जो पुराणों के संदर्भों पर आधारित हैं । सन् 1885 ईं में मैसूर के महाराजा चामराजेन्द्रन ओडयार ने उनको निमंत्रित कर चित्र तैयार कराए । सन् 1888 से रविवर्मा का बडौदा काल शुरू हुआ । दो वर्ष के बडौदा जीवन में उन्होंने पुराण संबन्धी 14 चित्र बनाए । उत्तर भारत की व्यापक यात्राएँ कीं । सन् 1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व प्रदर्शनी में दस चित्र प्रदर्शित किये ।

    जब उन्हें चित्रकार के रूप में ख्याति मिली तब उन्होंने सोचा कि अपने चित्रों को मुद्रित कर सस्ते दाम पर प्रदान किये जाएँ । चित्रकला को आधुनिक प्रौद्योगिकी से जोडने के इस निर्णय ने भारतीय चित्रकला के इतिहास में एक नये अध्याय का प्रारंभ किया । सन् 1894 में उन्होंने विदेश से एक कलर ओलियोग्राफिक प्रेस खरीदकर मुम्बई में स्थापित की । इस प्रेस में उन्होंने चित्रों के सस्ते संस्करण मुद्रित किये । सन् 1897 में मुम्बई और पुणे में प्लेग फैला तो उन्हे अपना प्रेस बन्द करना पडा । अन्त में 21 जनवरी 1901 ईं में प्रेस सस्ते दामों में बेचना पडा तथा अस्सी से अधिक चित्र के प्रकाशनाधिकार को भी बेचना पडा।

    भारत के राजा एवं ब्रिटिश शासक सभी रविवर्मा से चित्र बनवाने के लिए अत्यंत लालायित रहते थे । राजस्थान के उदयपुर महाराजा ने उन्हें निमंत्रित कर अपने पूर्वजों के चित्र बनवाये । इनमें महाराजा प्रताप का चित्र भी है जो छाया – चित्र रचना के मास्टरपीसों में एक है । सन् 1904 में चेन्नै के तत्कालीन ब्रिटिश राज्यपाल आर्थर हावलॉक के चित्र रचने का काम रविवर्मा को सुपुर्द कर दिया गया । इसी वर्ष ब्रिटिश सरकार ने रविवर्मा को ‘केसर – ए – हिंद’ पुरस्कार भी दिया । यह प्रसिद्व पुरस्कार पहली बार किसी एक कलाकार को प्रदान किया गया था ।

    रवि वर्मा के प्रमुख पुराण सम्बन्धी चित्र हैं – ‘हंसदमयन्ति’, ‘सीतास्वयंवर’, ‘सीतापहरण’, ‘सीता धराप्रवेश’, ‘श्रीराम पट्टाभिषेक’, ‘विश्वामित्र और मेनका’, ‘श्रीकृष्ण जन्म’, ‘राधामाधव’, ‘अर्जुन और सुभद्रा’ आदि । उनके अन्य प्रसिद्ध चित्र हैं – सद्यः ‘स्नाता स्त्री’, ‘नर्तकी’, ‘विद्यार्थी’, ‘सरस्वति’, ‘विराट राजधानी की द्रौपदी’, ‘भारतीय संगीतज्ञ’, ‘मागंतुक पिता’, ‘उदयपुर राजमहल’, ‘सिपाही’, ‘लक्ष्मी’, ‘यशोदा व कृष्ण’, ‘कादंबरी’ आदि । जीवन के अंतिम दिनों में वे किलिमानूर वापस आ गए और समृद्ध चित्र रचना में व्यस्त रहे । 2 अक्टूबर 1906 को चित्रों के महाराजा रवि वर्मा दिवंगत हो गए ।

    रवि वर्मा के चित्र संग्रह भारत के कई स्थानों के निजी संग्रह कर्त्ताओं के साथ साथ तिरुवनंतपुरम स्थित श्री चित्रा आर्ट गैलरी में प्रदर्शित है । दिल्ली के नैशनल गैलरी ऑफ माडेर्न आर्ट सहित अनेक संग्रहालयों में रवि वर्मा के चित्र रखे गए हैं ।

    रोचक तथ्य:

    • अक्टूबर 2007 में उनके द्वारा बनाई गई एक ऐतिहासिक कलाकृति, जो भारत में ब्रिटिश राज के दौरान ब्रितानी राज के एक उच्च अधिकारी और महाराजा की मुलाक़ात को चित्रित करती है, 1.24 मिलियन डॉलर में बिकी है। इस पेंटिंग में त्रावणकोर के महाराज और उनके भाई को मद्रास के गवर्नर जनरल रिचर्ड टेंपल ग्रेनविले को स्वागत करते हुए दिखाया गया है। ग्रेनविले 1880 में आधिकारिक यात्रा पर त्रावणकोर गए थे जो अब केरल राज्य में है।
    • फ़िल्म निर्माता केतन मेहता राजा रवि वर्मा के जीवन पर फिल्म बनाई गई हैं। मेहता की फिल्म में राजा रवि वर्मा की भूमिका निभाई है अभिनेता रणदीप हुड्डा ने। फिल्म में अभिनेत्री है नंदना सेन। इस फिल्म की खास बात यह है कि इसे हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में एक साथ बनाया गया है। अंग्रेजी में इस फिल्म का नाम है ‘कलर ऑफ पैशन्स’ वहीं हिंदी में इसे ‘रंग रसिया’ नाम दिया गया है।
    • विश्व की सबसे महंगी साड़ी राजा रवि वर्मा के चित्रों की नकल से सुसज्जित है। बेशकीमती 12 रत्नों व धातुओं से जड़ी, 40 लाख रुपये की साड़ी को दुनिया की सबसे महंगी साड़ी के तौर पर लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रेकार्ड में शामिल किया गया है।  (ब्रैंड भारत से साभार)

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    5 Comments

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