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    छोड़ गए गहरी यादें हुकुम सिंह

    By February 7, 2018 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    श्याम कुमार 

    हुकुम सिंह के संसार से विदा होने से राजनीति का एक श्रेष्ठ एवं चरित्रवान पुरोधा चला गया। वह ऐसे राजनीतिज्ञ थे, जिनका सम्पूर्ण जीवन उच्च आदर्शों से परिपूर्ण था तथा जनसेवा ही जिनका वास्तविक जीवन था। वह कभी कटु वचन नहीं बोलते थे तथा अपने विरोधियों का भी सम्मान करते थे। यही कारण है कि पक्ष या विपक्ष, सभी खेमों में उनकी बहुत इज्जत होती थी। कोई भी मुख्यमंत्री हो, उनकी बात को महत्व देता था। वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के रहने वाले थे तथा कैराना से सांसद थे। उन्होंने कैराना में मायापुर में अपना एक सुंदर फार्महाउस बनवा लिया था और वहीं रहने लगे थे। वह बड़े नियमपूर्वक रहते थे तथा उनसे मिलकर कभी भी यह महसूस नहीं हुआ कि वह अस्वस्थ हैं। इसीलिए टीवी पर अचानक उनके देहावसान का समाचार देखकर बेहद अफसोस हुआ। यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वह सांस की बीमारी की वजह से गौतमबुद्ध नगर के एक अस्पताल में भरती थे, जहां उनका देहावसान हो गया। उनके विदा हो जाने से भारतीय जनता पार्टी की निश्चित रूप से अपूर्णीय क्षति हुई है। वह पार्टी के कद्दावर नेता थे।

    हुकुम सिंह जब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सरकार में मंत्री थे, मेरा तबसे उनसे परिचय था। उस समय भी मैंने उनके कई साक्षात्कार प्रकाशित किए थे। वह मेरी वरिष्ठता का बहुत सम्मान करते थे तथा उनकी श्रेष्ठता के कारण ही मेरी उनसे बहुत अधिक घनिष्ठता हो गई थी। वह विभिन्न विषयों पर मुझसे खुलकर बातें कर लेते थे। यही कारण है कि जब वह कांग्रेस में थे तो उन्होंने कांग्रेस की गलत नीतियों के प्रति कई बार मुझसे अपना असंतोष व्यक्त किया था। मूलरूप से वह राष्ट्रवादी थे, इसीलिए जब वह भारतीय जनता पार्टी में सम्मिलित हुए तो उन्होंने मुझसे कहा था कि अब उन्हें अपने विचारोंवाली पार्टी मिल गई है और जीवनभर वह इस पार्टी से जुड़े रहेंगे। उन्होंने ऐसा ही किया।

    हुकुम सिंह के प्रति मेरा इतना अधिक लगाव था कि कुछ मास पूर्व जब मैं दिल्ली व प्रदेश के पश्चिमी जिलों की यात्रा पर गया था तो मैंने उन्हें फोन किया। उन्होंने बताया कि वह कैराना में अपने आवास पर हैं तथा उन्होंने बहुत जोर दिया कि मैं उनके पास कैराना आऊं। मैं उनके आग्रह को टाल नहीं पाया था और खराब सड़क होने के बावजूद उनके पास पहुंचा था। वहां उनके प्रति आम जनता का प्रेम देखकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ था।

    लोगों ने मुझे उनके फार्महाउस तक पहुंचा दिया था। उस समय वह बाहर चौबारे में बैठे हुए जनता की समस्याएं सुन रहे थे। मेरे पहुंचते ही वह लोगों से क्षमा मांगकर मुझे भीतर ले गए और उनसे काफी वार्तालाप हुआ। उसी समय मेरठ आदि से उनकी पार्टी के कुछ नेता आ गए थे, जिनसे उन्होंने मेरा परिचय कराया। चूंकि मुझे कैराना से लौटना भी था, इसलिए अंधेरा होता देखकर मैंने उनसे विदा ली। मुझे व अन्य लोगों कोे विदा करने के बाद वह जनता की समस्याएं सुनने फिर चौबारे में चले गए थे। मैंने कैराना में भेंट के समय हुकुम सिंह का चित्र खींचा था, जो उन्हें भेंट नहीं कर सका, इसका दुख है।

    एक बार मैं मुजफ्फर नगर की प्रदर्शनी में ‘रंगभारती’ के कार्यक्रम के सिलसिले में वहां गया था। मुजफ्फर नगर में उनके आवास पर जब मैं गया तो विदित हुआ कि वह बाहर हैं। उस समय उनकी पत्नी जीवित थीं, जिन्होंने फोन पर उनसे मेरी बात कराई। हुकुम सिंह ने पत्नी को मेरी खातिर में कमी न होने का निर्देश दिया। उनकी पत्नी ने उस समय जो गरम-गरम स्वादिष्ट पकौड़े खिलाए थे, उसका उल्लेख मैं अकसर उनसे करता था। बाद में वर्ष 2010 में जब उनकी पत्नी के देहान्त होने की खबर मिली थी तो मन बहुत दुखी हुआ था। वह हुकुम सिंह के व्यक्तित्व की नींव थीं।

    हुकुम सिंह आदर्श राजनीति के प्रति कितने अधिक समर्पित थे, इसका एक दृष्टान्त याद आ रहा है। उस समय हुकुम सिंह उत्तर प्रदेश में भाजपा के विधायक थे तथा विधानसभा में भाजपा विधानमण्डल दल के नेता थे। उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार थी तथा सदन में एक दिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी की चर्चा हो रही थी। तभी सपा के संसदीय कार्य एवं नगर विकास मंत्री आजम खां ने नारायण दत्त तिवारी के चरित्र पर लांछन लगाते हुए टिप्पणी कर दी थी। उस समय कांग्रेसी सदस्य तो बाद में आक्रोशित हुए, किन्तु हुकुम सिंह आजम खां की टिप्पणी पर तत्काल खड़े हो गए और जबरदस्त स्वरों में उन्होंने अपना विरोध व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्रित्व में उन्होंने उनके साथ मंत्री के रूप में कार्य किया है तथा वह उनके-जैसे वरिष्ठ नेता के विरुद्ध अनुचित टिप्पणी नहीं बर्दाश्त कर सकते हैं। उस समय दलगत भावना से उपर उठकर हुकुम सिंह की उस प्रतिक्रिया पर उनकी भूरि-भूरि सराहना हुई थी।

    गत वर्ष मुसलमानों द्वारा उत्पीड़ित किए जाने पर बड़ी संख्या में कैराना से हिन्दुओं के पलायन की खबरें प्रकाशित हुई थीं तथा पलायन किए हुए लोगों के साक्षात्कार चैनलों पर दिखाए गए थे। उक्त प्रकरण हुकुम सिंह ने जोरदार रूप में उठाया था, किन्तु उन्होंने स्पष्ट रूप से यह कहा था कि वह पलायन के इस मामले को हिन्दू-बनाम-मुसलमान के रूप में नहीं देखते हैं, बल्कि इसे असामाजिक तत्वों की दबंगई मानते हैं। उनका कथन था कि असामाजिक तत्वों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई कर उनका उन्मूलन कर दिया जाय तो वहां समस्या नहीं रह जाएगी। उस समय यह माना जा रहा था कि वोटबैंक की खातिर गुंडा तत्वों को सपा-सरकार का संक्षरण प्राप्त है।

    हुकुम सिंह की मान्यता थी कि व्यक्ति को राजनीति में ‘मेवा’ के लिए नहीं, ‘सेवा’ के लिए आना चाहिए। उनका कहना था कि आम जनता का कोई पुरसाहाल नहीं होता है और उसे दबंगों के अत्याचार सहने पड़ते हैं। इसीलिए हुकुम सिंह कहते थे कि नेता का प्रथम कर्तव्य जनता की सेवा करना होना चाहिए। इस सन्दर्भ में मुझे एक घटना याद आ रही है। हुकुम सिंह उस समय लखनऊ में डालीबाग-स्थित बहुखण्डी मंत्री आवास में रहते थे। एक दिन उन्होंने मुझे चाय पर आमंत्रित किया था। जब मैं पहुंचा, वह अपनी पार्टी के एक बड़े नेता के यहां होकर लौटे थे।

    उन्होंने मुझसे बताया कि उन नेता के यहां उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वहां आम जनता नहीं मौजूद थी। हुकुम सिंह अपने बारे में बोले कि उनके यहां सवेरे से ही अपनी समस्याएं लेकर आने वालों का मजमा जुट जाता है तथा शाम को भी वैसा ही होता है। उन्होंने यह भी कहा था कि आमजन की समस्याएं हल कराने में उन्हें सुख मिलता है। वास्तविक समाजसेवा करनेवाले लोगों में यह भावना अवश्य होती है। जनता में ‘बाबूजी’ के नाम से प्रसिद्ध हुकुम सिंह के देहावसान की खबर सुनते ही उनके आवास पर जनसैलाब उमड़ पड़ा, जिसमें हिन्दू व मुसलमान, सभी थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उन्हें श्रद्धांजति देने कैराना पहुंचे।

    लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

    #Hukum Singh

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