- व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी
कोरोना काल में मच्छर बिरादरी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। कोरोना ने न केवल आम आदमी की बल्कि मच्छरों की भी कमर तोड़कर रख दी है। इन दिनों मच्छर आसपास मंडराते तो दूर किसी को काटते हुए भी नजर न आ रहे। वरना बरसात के दौरान तो मच्छरों का लगभग आतंक बना रहता था। डॉक्टरों के क्लीनिक डेंगू, मलेरिया, चिकिनगुनिया के मरीजों से भरे रहते थे। हर घर में एक न एक मच्छर काटे का मरीज मिल ही जाता था। लेकिन आज मच्छरों को कोई पूछने वाला नहीं। जिधर निगाह डालो उधर कोरोना ही कुंडली मारे बैठा है।
मच्छरों की व्यथा-कथा सुनने वाला कोई नहीं। वे समाज में ही नहीं डॉक्टर्स के बीच भी उपेक्षित हैं। किसी के मन में अब उनका भय न रहा। रात में सोते समय कान पर भुनभुनाती वो आवाज इन दिनों गायब है। मच्छरदानी कोने में पड़ी अपनी उपेक्षा झेल रही है। किसी रिश्तेदार का फोन तक नहीं आता यह बताने को कि अमुक को डेंगू हो गया है। या आजकल उसे मच्छर परेशान कर रहे हैं। मच्छरों के इतने दुर्दिन आ जाएंगे, मैंने कभी सपने में भी सोचा न था।
कोरोना का सत्यानाश हो। हर किसी के लिए मुसीबत बन गया है। डर के आगे जीत कहने वाले भी कोरोना के आगे खामोश हैं। पता नहीं किस मिट्टी का बना है यह, इतनी गालियां सुनने के बाद भी टस से मस नहीं हो रहा। जरा-सी छींक या गले में खराश या हाथ गर्म होने पर इसी का भय बना रहता है।
अब तो लोग अपनी छींक या बुखार को सोशल मीडिया पर जाहिर करने से भी कतराने लगे हैं। पता नहीं कौन क्या समझ बैठे। बात जितनी दबी रहे, उतना अच्छा। न अब ऐसे लोग नजर आ रहे हैं जो डेंगू या मलेरिया का हल्ला काटते हों। विपक्ष भी इस मसले पर चुप्पी साधे बैठा है। वो अभी किसान बिल पर सरकार को घेरने में व्यस्त है। जबकि बिल पास भी हो चुका है।
कोरोना अगर हमारे बीच ऐसे ही बना रहा तो मच्छरों के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा। फिर लोग मलेरिया, डेंगू आदि बीमारियों को भूल जाएंगे। फिर कोई मच्छरों से डरेगा भी नहीं। प्रचलित मुहावरे ‘एक मच्छर आदमी को…’ भी विलुप्ति के कगार पर आ जाएगा। मैं मच्छरों के अस्तित्व को लेकर खासा फिक्रमंद हूं।
कोरोना विदेशी बीमारी है। मलेरिया देशी बीमारी है। और सदियों से हमारे साथ बनी हुई है। इसकी वजह से हस्पतालों की रौनक है। मरीज और डॉक्टर के बीच संबंध बने हुए हैं। मच्छरदानी, ऑलआउट का बाजार गुलजार रहता है। मच्छर ही न होंगे तो बरसात बाद हम कोसेंगे किसे।
जानकर लोग बता रहे हैं कि कोरोना अभी लंबे समय तक हमारे बीच बना रहेगा। हमारी जंग उससे अभी जारी रहेगी। लेकिन मच्छरों का क्या होगा? वे कहां जाएंगे? कल तक मनुष्य पर हावी रहने वाले मच्छर क्या कोरोना के आगे भीगी बिल्ली बन जाएंगे?
आजकल मैं रात में सही से सो न पा रहा क्योंकि कान पर भिन-भिन करने वाले मच्छर गायब हैं। ‘हिट’ और ‘ऑलआउट’ भी अपनी किस्मत को रो रहे हैं। समय विकट है। कोरोना ने मच्छर बिरादरी पर कहर ढाया है। न जाने ऐसा कब तलक चलेगा?







