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    एक जीती जागती नदी के गंदे नाले में बदल जाने का सफर

    By April 1, 2019 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    कोई 20 दिन पहले ही उरई गया था, मेरे जिन पारिवारिक के घर गया, उनकी गली तक पहुँचने के लिए संक्रा रास्ता होने के कारण मैंने अपनी कार एक नाले के किनारे खड़ी कर दी, स्थानीय लोगों से पूछा तो उन्होंने कहा यह नूर नाला है . जब थोडा नीचे जा कर देखा तो जमीं के कटाव, प्रवाह और स्वरुप से अंदाजा लग गया कि यह कोई नदी है,

    बहुत से स्थानीय लोगों से बात की कुछ कुछ जानकारी मिली. फिर जब खोजा तो पता चला कि महज तेन दशक में एक सदा नीरा नून नदी, नूर नाला बन गयी. मैंने अपने घर के पास यमुना और हिंडन को भी ऐसे ही मरते देखा है, शायद आपने भी अपने गोंव -कसबे में यह अनुभव किया हो!

    काश इस लोकसभा चुनाव में आप वोट मांगने वालों से अपने इलाके के नदी-तालाब- जोहड़- कुंए के ख़तम होने का हिसाब मांग सकें!

    इस नदी में नाव चलते, बाढ़ आते और गरमियों में पानी द्वारा छोड़ी जमीन पर खेती करते देखने वाले अभी जवान ही हैं। महज तीन दशक में एक नदी कैसे गुम होकर नाला बन जाती है, इसकी बानगी है बुंदेलखंड के उरई की नून नदी। इस पर स्टाप डैम निर्माण हो या रेत का वैध-अवैध खनन, इसके लिए सरकार और समाज इसे नदी मानता है। सरकारी कागजों में भी इसकी यही हैसियत दर्ज है। लेकिन जैसे ही इसके संरक्षण, प्रदूषण, अस्तित्व पर संकट की बात होती है, तो इसे बरसाती नाली बताने वाले खड़े हो जाते हैं। यदि थोड़ा-सा पुराना रिकॉर्ड देखें, तो नून नदी का सफर 20 किलोमीटर तक का है और यह यमुना की सहायक नदी है। कह सकते हैं कि यमुना को जहर बनाने में जिन सहयोगियों की भूमिका है, उनमें से यह एक है। अकेले जालौन जिले में ही नून नदी कोई 100 ऐसे गांवों के किनारे से गुजरते हुए उनका सहारा हुआ करती थी, जहां का भूजल ‘डार्क जोन’ में गिना जाता है। जमीन की छाती चीरकर पानी निकालो, तो वह बेहद खारा है। ऐसे में, नून नदी ही उनके लिए जीवनदायी हुआ करती थी।

    file photo

    कभी नून नदी शहर के बीचोबीच से गुजरती थी। इसके किनारे तिलक नगर में मंसिल माता का मंदिर दो हजार साल से अधिक पुराना कहलाता है। अभी तीन दशक पहले तक नून नदी का पानी इस मंदिर के करीब तक हिलौरे मारता था। वहीं बनी ऊंची पहाड़ियों या टेकरी पर कुछ काछियों के घर थे, जो पानी उतरने पर किनारे पर फल-सब्जी लगाते थे। एक तरह से शहर का विभाजन करती थी नदी- पूर्व तरफ पुरानी बस्ती और दूसरी तरफ जिला मुख्यालय बनने से विकसित सरकारी दफ्तर और कॉलोनियां। इस नदी के कारण शहर का भूजल स्तर संरक्षित रहता था। हर आंगन में कुएं थे, जो सदानीरा रहते थे। शाम होते ही शहर में ठंडक हो जाती थी। जिला मुख्यालय के कार्यालय बने, तो शहर का विस्तार होने लगा और न जाने कब नून नदी के किनारों पर कब्जे हो गए। शहरीकरण हुआ, तो जमीन के दाम मिलने लगे और लोगों ने अपने खेत भी बेच दिए। किनारों पर उगे कंक्रीट के जंगल से उपजने वाला घरेलू कचरा भी इसमें समाने लगा। देखते ही देखते यह एक नाला बन गया।

    नून नदी का गठन चार प्रमुख बरसाती नालों के मिलन से होता है। ये हैं- मलंगा, राबेर, गोहनी और जांघर। इसके आगे जाल्हूपुर-मदारीपुर मार्ग पर महेबा ब्लॉक के मांगरोल में भी एक बरसाती नाला इसमें मिलता है। उकासा, भदरेकी, सारा, नूरपुर, कोहना, पारा, हथनौरा जैसे कोई सौ गांव इसके तट पर बसे हैं। इसमें गरमी के दिनों में भी चार फुट पानी औसतन रहता है। उरई शहर पहुंचने से पहले ही इसमें कोई छह कारखानों और कई ईंट भट्टों का रासायनिक उत्सर्जन गिरता है। कानपुर-झांसी मार्ग पर उरई शहर से कोई दस किलोमीटर पहले मुख्य सड़क से तीन किलोमीटर भीतर जंगल में रगौली गांव में औद्योगिक कचरे का इससे मिलन शुरू होता है। रही-बची कसर उरई शहर की सारी गंदगी बगैर किसी शोधन के इसमें मिलने से पूरी हो जाती है। कालपी के नजदीक शेखपुरा गुढ़ा में जब इसका मिलन यमुना से होता है, तो यह नदी कचरे और बदबूदार पानी का गाढ़ा रसायन भर होती है।

    किसी नदी की मौत का पता उसमें बचे पानी, उसकी गुणवत्ता और तापमान से होता है। एक वैज्ञानिक शोध के अनुसार, इस नदी में इस तरह की काई यानी एल्गी हुआ करती थी, जो सामान्य जल-प्रदूषण का निराकरण खुद ही कर लेती थी। आज इसका तापमान जनवरी की कड़कड़ाती ठंड में भी 10 डिग्री और गरमी में 35 डिग्री औसतन रहता है। इतने तापमान के चलते इसमें जलीय जीव या वनस्पति का जीवित रहता संभव नहीं है। कहा जाता है कि जिस नदी में मछली-कछुआ या जलीय पौधे नहीं हों, तो उसका जल पशुओं तक के लिए जहर होता है। साफ है कि बेतरतीब आधा दर्जन स्टाप डैम बनाने और हर जगह भारी मशीनें लगाकर इसमें से रेत निकालने के कारण भी इसकी सांस टूटी है। जो नदी कभी ढलते सूरज के साथ शहर को सुनहरी रोशनी से भर देती थी, जिसका पानी आम लोगों की प्यास बुझाता था, वह नदी आज अपना नाम, अस्तित्व खोकर लोगों के लिए एक त्रासदी बन गई है।

    (ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)

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