कितनी दुर्भाग्यपूर्ण और अमानवीय स्थिति है कि जब तक अस्पतालों में ऐसे हृदय विदारक दृश्य आम होने लगे हैं। जिनमें किसी मरीज की मौत हो जाने पर उसके बिल के भुगतान के बिना शव को उसके परिजनों को सौंपने से इसलिए इंकार कर दिया जाता है कि पहले इलाज के बिल का भुगतान करो। उसके बाद ही शव को हाथ लगाओ।
यह स्थिति आमतौर पर निजी अस्पतालों में देखी जाती हैं, और इनके रवैये पर अक्सर सवाल उठते हैं। वैसे भी निजी अस्पतालों में इलाज का खर्चा इतना ज्यादा होता है कि समाज का सामान्य आदमी तो यह बोझ उठा ही नहीं सकता, लेकिन फिर भी आधुनिक सुविधाओं को देखते हुए कभी-कभी आपात स्थिति में ऐसे अस्पतालों में इलाज के लिए जाना ही पड़ जाता है।

वहां इलाज के दौरान ही खर्च इतना बढ़ जाता है कि कभी-कभी तो तीमारदार परिजनों के घर और खेत तक बिक जाते हैं फिर भी बिल का पूरा भुगतान संभव नहीं हो पाता। मरीज की मौत हो जाने पर तो परिजनों पर दोहरी मार पड़ती हैं। एक तरफ परिवार का सदस्य हमेशा के लिए साथ छोड़ जाता है उस पर बिल का भुगतान न होने को लेकर अस्पताल ही परिजन को बंधक बना लेता है।
यहाँ अमानवीयता की पराकाष्ठा संभवता इसलिए भी जारी है क्योंकि अभी तक ऐसा कोई नियम कायदे ही नहीं निर्धारित हैं। जिनसे अस्पतालों के प्रबंधन या डॉक्टर ऐसे अमानवीय रवैये को रोका जा सके।
इस संबंध में अब स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक अच्छी पहल की है स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से अस्पतालों के इस प्रस्ताव का संज्ञान लेकर उसे एक नियम के तहत लाने की कोशिश की गई है। अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा मरीजों के अधिकारों पर जारी चार्टर का मसविदा एक नियमावली या कानून बनने तक पहुंच सकता है। जिससे अस्पतालों की बेरहमी पर रोक लग सकती है।
इसमें सबसे अहम बात यह है कि अगर भर्ती मरीज के इलाज पर आने वाले खर्च को लेकर कोई विवाद उठता है। तो बिना बिल भुगतान के मरीजों को छुट्टी देने से अस्पताल मना नहीं कर पाएंगे, यदि किसी मरीज की मौत हो जाती हैं और उसका शव परिजनों को सौंपने से अस्पताल मना करता है तो अस्पताल के इस काम को अपराध माना जाएगा।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने 4 महीने पहले ही इस पर रोक लगाने के लिए एक मसौदा जारी किया था लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कानून का नियमावली सामने नहीं आ सकी है। अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की इस पहल के बाद देखना यह है कि इन प्रस्तावों पर अस्पतालों की क्या प्रतिक्रिया सामने आती है और वह तथाकथित अस्पताल इससे बचने के लिए क्या चाल चलते हैं।








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