जी के चक्रवर्ती
एक लम्बे समय तक सत्ता में बने रहने के बावजूद कांग्रेस येन-केन-प्रकारेण सत्ता पर काबिज होने के लिये इतना छट-पटा उठी है कि उसे सही और गलत का भी भान नही रहा है इसलिये वह सही और गलत का आंकलन नहीं कर ओछी और संकीर्ण मानसिकता वाली राजनीति करने में उतारू हो गयी है।
अभी हाल ही में कृषि विधेयक बिल के पास होते ही इस पर विपक्ष द्वारा नकारात्मक राजनीति और इसका दुष्प्रचार कैसे-कैसे गुल खिलाता है, इस बात के ताजे उदाहरणस्वरूप देश के किसानों द्वारा धरना- प्रदर्शन को जिस तरह से कांग्रेस पार्टी अपना खुला समर्थन दे कर आगे बढ़ा रही है इससे साफ जाहिर होता है कि कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व ने अभी तक कांग्रेस पार्टी के जनाधार हासिये पर पहुँचने के कारणों का सही आंकलन नही कर लगातार एक के बाद एक गलत कदमों को उठा कर पार्टी की और भी फजीहत करने में लगी हुई है।
आज जो कृषि विधेयक बिल देश के किसानों के पक्ष में है उसी बिल को लेकर नकारात्मक राजनीति करना कहाँ तक उनके पक्ष में है यह तो उनके जिम्मेदार नेतृत्व ही जाने लेकिन कांग्रेस द्वारा देश के किसानों को बरगला कर इस बिल के विरोध में धरना-प्रदर्शन से लेकर रास्तों को अवरुद्ध करने के साथ साथ रेल मार्गों भी बाधित कर इस तरह से विरोध जताने का यह तरीका जनता को परेशान करने वाला ही साबित होगा ऐसे में क्या यह कहा जा सकता है कि इस तरह की राजनीति करने से क्या वह भारतीय जनमानस के दिलों में जगह बना पायेगी?
ऐसा में यह लग रहा है कि कांग्रेस द्वारा अपनाये जा रहे इस तरह के विचित्र रवैया अपनाने से अभी चंद दिनों पहले कोरोना वायरस से संक्रमण का हवाला देकर देश के मेडिकल एवं इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाओं का भी विरोध किया जाना और अब देश मे फैले महामारी को नजरअंदाज कर किसानों को सड़कों पर उतार कर इस पर ओछी राजनीति करने में भी परहेज नही कर रही है, इस तरह से यह तो बिल्कुल स्पष्ट है कि यह मात्र संकीर्ण मानसिकता के सहारे देश के किसानों के भलाई के लिये किये जा रहे कार्यों पर विरोध जताना कहां तक उचित है, यह तो उनके हितैषी कार्यकर्ता लोग ही जाने।
अब यह बेहतर हो कि देश के किसान भाई इस तरह की बातों को अच्छी तरह समझें लें कि कांग्रेस अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों को पूरा करने के लिए मंडी समितियों पर एकाधिकार रखने वाले आढ़तियों और बिचौलिये की ओर से उनकी पैरवी कर रही है, न कि देश के किसानों के हित में कार्य कर रही है। देश के किसानों को यह बात अच्छी तरह से समझना होगा कि यदि उनके कृषि उपज बेचने की पुरानी व्यवस्था ही उनके लिए वास्तव में लाभकारी थी तो फिर यह सवाल उठता है कि अभी तक ऐसे किसान जिन्हें अपना उपज अनाज एवं फल-सब्जियों को इन आढ़तियों या बिचौलियों को औने-पौने दामों पर कियूं बेचने पर मजबूर होना पड़ रहा था?
क्या अभी तक के इन स्थितियों पर यह कहा जा सकता है कि विकल्पहीनता की स्थिति देश के किसान भाइयों के लिए अत्यंत लाभ दायक और हितकर थी? हमे यहाँ यह कहना पड़ता है कि यह एक झूठ है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी व्यवस्था को समाप्त किया जा रहा है। इस तरह की बातों को देश के किसान भाइयों को समझना पड़ेगा कि मौजूदा समय मे केंद्र सरकार ने न केवल समय से पहले प्रमुख फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा कर चुकी हैं, बल्कि धान खरीद की तैयारी भी कर ली है। इस सबके मद्देनज़र किसान भाइयों को समझना पड़ेगा कि कहीं उन्हें किसी दूसरे लोगों के द्वारा उकसाया तो नहीं जा रहा है?







