हाथरस मुद्दे पर राजनीति

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  • जी के चक्रवर्ती

हमारे समाज मे आज भी दुर्भाग्य से बलात्कार के मामले में न्याय बहुत देर से मिलने के कारण अपराध और अपराधियों पर किसी तरह की लगाम नही लग पा रही है जबकि दिल्ली के निर्भया कांड के होने के दौरान एक बार तो ऐसा लग रहा था कि देश की बच्चियों, औरतों एवं महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार के मामलों में अंकुश जरूर लगेगा और इसके लिये कड़ी सजा का प्रवधान जरूर किया जायेगा लेकिन अभी तक जो भी कानून बने है वह इस मामलों पर अंकुश लगाने में नाकाफी हैं बल्कि इसके थमने की जगह यह जघन्य अपराध अभी भी रुकने का नाम नही ले रहा है।

किसी भी अपराध के अपराधी की सिर्फ एक परिभाषा होती है और उसे कानून से सजा मिलती है, यदि किसी भी धर्म, समाज के व्यक्ति विशेष, नेतागण, पुलिस या मीडिया समूह के लोगों के अनुसार ही अपराध और अपराधी की परिभाषा बदल दी जायेगी तो उस समाज एवं देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता है।

देश में होने वाले अलग-अलग अपराध के मामलों में हम सब बंटे हुए होने के कारण इसका खामियाजा देश वासियों को भुगतना पड़ता है। इसमें सबसे अधिक दुःखद बात उस समय होती है जब समाज के किसी भी घर के महिला, बच्चियों या युवती के साथ बलात्कार जैसे निकृष्ट अपराध हमारे नेता या समाज के कुछ सम्मानित नागरिक और मीडिया समूह के लोगों द्वारा अंजाम दिया जाये।

ऐसी घटनाओं के घटित होने के बाद घटना को धर्म और जाति में बांट कर देखने की एक गलत परम्परा हमारे समाज मे बहुत दिनों से मौजूद है। जब भी कोई महिला या युवती बलात्कार की शिकार हो जाती है तो मीडिया उस लड़की के साथ बलात्कार, उस दौरान दरिंदों द्वारा की गई हैवानियत की खबरों को उसकी जाति के साथ जोड़कर दिखाता हुआ लिखता है तो उस लड़की की जाति धर्म की है, यह बताने भर से अपराध और अपराधी का स्तर छोटा या बढ़ा नहीं हो जाता है। इस तरह की सोच से लोगों के भीतर विद्वेष की भावना उतेजित होना स्वाभाविक सी बात है और ऐसे में यह लगता है कि यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत राजनीति करने के अतिरिक्त कुछ और नहीं है।

बलात्कार चाहें किसी गांव की लड़की के साथ या फिर किसी शहर के युवती के साथ घटित हुई हो कानून की नजर में यह अपराध है और स्थान या जाति के मामले में सजा एक ही है न कि अलग-अलग। वहीं पर हमारे समाज के कथित बुद्धिजीवी एवं कुछ नेता, लोग अक्सर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की भी ‘श्रेणी’ बदल कर उसे राजनीति मुद्दा बना कर माहौल गर्म करने से गुरेज नहीं करते हैं सिर्फ यही एक कारण है कहीं पर किसी युवती या महिला के बलात्कार की शिकार हो जाने पर उसके पक्ष में कोई नेता खड़ा नजर नहीं आता है यदि पीड़िता किसी विशेष जाति या धर्म से संबंधित होती है तो अपने जाति का वोट बैंक मजबूत करने के लिये उसके पक्ष में कुछ खड़े अवश्य होंगे लेकिन फिर उसमे ‘बाल की खाल निकालना’ प्रारम्भ कर देते हैं और बलात्कार से पीड़िता के पक्ष में खड़े होने का केवल नाटक भर कर अपनी सियासी रोटियां सेंकने का काम करते नजर आते हैं।

यूपी के हाथरस की 19 वर्षीया बेटी जो दंरिदों की हैवानियत के कारण वह अब हमारे बीच भले ही नहीं हो लेकिन उसके परिवार वालों को इंसाफ जरूर मिलना चाहिए चाहे इस अपराध के पीछे कितने ही बडे व्यक्ति का हाथ हो नकि केवल इस वजह सारी कार्यवाही सिथिल कर दी जाये कि वह युवती एक दलित समाज से संम्बंध रखने वाली थी। फिलहाल राज्य सरकार ने त्वरित करवाई करते हुए सभी अभियुक्तों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है इसके अलावा निष्पक्ष जाँच के सीबीआई जाँच की भी शिफारिश कर दी है जिससे पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके।

वैसे मेरा मन्ना है कि जो भी लोग पीड़िता के पक्ष में खड़े हैं, उन लोगों को सम्पूर्ण देश के लोगों का साथ मिलना ही चाहिए, बल्कि ऐसे सभी लड़कियों के पक्ष में आवाज बुलंद करना चाहिए जो किसी वर्ग विशेष में नही आती हैं, आज उत्तर प्रदेश में महिला अपराध से जुड़े मामले लगातार बढ़ते चले जा रहे हैं। अभी कुछ दिनों पहले गाजियाबाद में भांजी को छेड़खानी से बचाने के दौरान पत्रकार विक्रम जोशी की हत्या को लोग भूल नहीं पाये होंगे कि पूर्वी यूपी के भदोही जिले में गत दिनों लापता हुई एक 17 वर्षीय नाबालिग लड़की का शव नदी तट के किनारे मिलना उस नाबालिग के साथ हुये बलात्कार से इनकार नही किया जा सकता है। लड़की के परिजनों का आरोप है कि गांव के पास के ही ईट भट्टा संचालक ने उसके साथ रेप किया है और फिर तेजाब डाल कर उसकी हत्या कर दी। यह उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कहलायेगा कि यहां बेटियों के साथ अपराध का ग्राफ कम होने का नाम ही नहीं लेता है। इस पर अंकुश लगना बहुत जरुरी है। ताकि लोगों के दिलों दिमाग में बसा भय दूर किया जा सके।

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