कहते हैं सियासत में कुछ चलता है अब यूपी की दो ताकतवर क्षेत्रीय पार्टियां समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने सूबे से बाहर अपने गठबंधन का विस्तार करने का फैसला किया है। अब दोनों पार्टियां मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में मिलकर आगामी लोक सभा चुनाव लड़ेंगे। इनके इस सियासी फैसले से एनडीए के खिलाफ विपक्षी गठबंधन को झटका लग सकता है। उत्तर प्रदेश की ही तरह मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में भी सीटों के बंटवारे को लेकर बसपा सपा पर भारी है। इससे बसपा सुप्रीमो मायावती की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा को समझा जा सकता है। वह कांग्रेस और भाजपा का विकल्प बनना चाहती हैं। इसीलिए उन्होंने इन तीनों प्रदेशों में कांग्रेस को अपने गठबंधन में शामिल नहीं होने दिया।
बिहार में भी लोकसभा की सभी सीटों पर मायावती ने अकेले चुनाव लड़ने का संकेत दिया है। यहां राजद और कांग्रेस सहित कई अन्य छोटे-छोटे दल महागठबंधन में शामिल हैं। जाहिर है कि मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और बिहार में यदि मायावती कांग्रेस को साथ लिये बैगर चुनाव लड़ती हैं तो इससे भाजपा ही मजबूत होगी। मध्य प्रदेश में सपा बालाघाट, टीकमगढ़ और खजुराहो सीटों पर चुनाव लड़ेगी और शेष सभी 26 लोक सभा सीटों पर बसपा लड़ेगी। गत लोक सभा चुनाव में यहां सपा-बसपा अलग-अलग चुनाव लड़ी थी। बालाघाट और टीकमगढ़ में सपा को बसपा से ज्यादा वोट मिले थे।

उत्तराखंड में सपा एकमात्र पौड़ी सीट पर लड़ेगी और बसपा शेष चार सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी। 2014 के चुनाव में मध्य प्रदेश में भाजपा को 54.76, कांग्रेस को 35.35 और बसपा को 3.85 फीसद वोट मिले थे। मध्य प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में भी बसपा-सपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं था। हालांकि बसपा को दो और सपा को एक सीट मिली थी और इनका वोट प्रतिशत क्रमश: 5 और 2.3 था।
उत्तराखंड में 2017 के विधान सभा चुनाव में इन दोनों का साझा वोट प्रतिशत 7 था, लेकिन इन दोनों को एक सीट भी नहीं मिली थी।इनके पिछले प्रदर्शन से जाहिर होता है कि इन दोनों सूबों में कांग्रेस को गठबंधन से बाहर रखकर इन्हें कोई चुनावी लाभ नहीं होने जा रहा है बल्कि अपने डूबेंगे और कांग्रेस को भी ले डूबेंगे। सपा-बसपा का उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में गठबंधन यह संकेत देता है कि वह एक-दूसरे का हाथ पकड़कर लंबी दूरी तक चलेंगे।







