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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    पैंतरा बदलने की घिसी पिटी पटकथा

    By December 9, 2018Updated:December 9, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    Post Views: 603
    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    राजनीति में पैंतरा बदलने वाले अपनी सुविधा के अनुसार तर्क गढ़ लेते है। उंसकी सच्चाई से उनका कोई संबन्ध होना जरूरी नहीं होता। ऐसे धुरंधरों की सूची में एक नया नाम जुड़ा। कई महीनों से हमलावर चल रही सावित्री बाई फुले ने भाजपा से त्यागपत्र दे दिया। जिस पार्टी ने उन्हें पूरा सम्मान दिया, जिसने उन्हें पहले विधानसभा फिर लोकसभा तक पहुंचाया, वह आज दलित विरोधी हो गई। इस बात पर कौन विश्वास करेगा। लेकिन भाजपा के साथ यही विडंबना है। उसने बसपा प्रमुख मायावती को अल्पमत के बाबजूद तीन बार बार मुख्यमंत्री बनवाया, गेस्ट हाउस कांड में उनका जीवन भाजपा के ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने बचाया था, इसके बाबजूद भाजपा को दलित विरोधी बताया जा रहा है।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रुचि लेकर डॉ आंबेडकर से संबंधित पंचतीर्थो को गरिमा के अनुकूल भव्य स्वरूप प्रदान कराया, लेकिन सावित्री बाई की नजर में भजपा दलित विरोधी हो गई।
    बताया जाता है कि सावित्री बाई के इस पैंतरे का संबन्ध उनके निर्वाचन क्षेत्र से जुड़ा है। उन्होंने लोकसभा चुनाव जीतने के बाद अपने दायित्वों का उचित निर्वाह नहीं किया। वह आमजन से दूरी रही, उनकी समस्याओं को सुनने तक की फुर्सत उनके पास नहीं थी। कुछ खास लोगों तक ही उनका दायरा सिमटा था। यही कारण था कि उन्हें दुबारा टिकट न देने की मांग की जा रही थी। भाजपा के कई सक्रिय स्थानीय नेता टिकट की दावेदारी करने लगे थे। ऐसे में यह संभावना बन गई थी कि भाजपा सावित्री बाई का टिकट काट सकती है।
    file photo

    सावित्री बाई के विचारों में यहीं से बदलाव होने लगा। भाजपा जब उन्हें टिकट दे, विधायक, संसद सदस्य बनवाये तो दलितों की हितैषी, यदि उनके टिकट पर पुनर्विचार की मांग स्थानीय स्तर पर उठे, किसी अन्य दलित कार्यकर्ता को टिकट देने की बात चले, तो भाजपा पर दलित विरोधी होने के आरोप लगने लगे।

    सावित्री बाई को बताना चाहिए कि उन्हें यह ज्ञान कब प्राप्त हुआ कि भाजपा दलित के विरोध में है।  विधायक और चार वर्ष सांसद रहते हुए उन्हें यह अनुभव क्यों नहीं हुआ।
    यह भी हो सकता है कि उनकी निजी महत्वाकांक्षा जागृत हो गई हो, वह बसपा की जगह लेने की कल्पना कर रही हों। बसपा का लोकसभा चुनाव में खाता तक नहीं खुला था, विधानसभा में नाममात्र सीट मिली। सावित्री बाई को लगा होगा कि भाजपा से टिकट न मिलने से उनका राजनीतिक कैरियर चौपट हो सकता है। ऐसे में कुछ बड़ा किया जाए। वह चुनाव भी लड़ सके और दलितों के बीच अपनी पैठ भी बना सकें। यह पूरी कवायद इसी के अनुरूप चल रही है। इसमें संदेह नहीं कि सावित्री बाई ने अपने को दलित नेता के रूप में उभारने का प्रयास किया है। उन्हें लेकर कई कयास लगाये जा सकते है।
    वह नई पार्टी बना कर अकेले चुनाव में उतर सकती है, वह अन्य विपक्षी दलों से समझौते का प्रयास कर सकती है। लेकिन भाजपा में रह कर बोलना उनके लिए आसान था, लेकिन आगे की राह कठिन होगी। कहा जा सकता है कि उनकी परेशानी अब शुरू होगी। उनका प्रदेश में खास जनाधार कभी नहीं रहा। प्रदेश के स्तर पर उनकी खास पहचान कभी नहीं रही। इतने बड़े प्रदेश में जनाधार वाली पार्टी का गठन सरल नहीं है। नई पार्टी बनाई भी तो वह बसपा के ही कुछ वोट काटेगी। इसके अलावा उसका कोई महत्व नहीं होगा। दूसरा विकल्प अन्य पार्टी में शामिल होने का है।
    सावित्री बाई दलितों के लिए इतना बोल चुकी है कि अब शायद मायावती उन्हें तवज्जो न दें। सावित्री बाई भाजपा में रहकर  बेहिसाब बोल चुकी है। मायावती इतना बोलने वालों को पसंद नहीं करती। यदि वह बसपा में शामिल ही गई, तो सबसे पहले अपना मुंह बंद रखना सीखना होगा। यहाँ उनके सभी तेवर शांत हो जायेगें। सपा ऐसा कोई काम नहीं कर रही है , जिससे मायावती रूष्ट हो, मायावती नहीं चाहेगी की दलितों के मुद्दे पर ऐसे बोलने वाला कोई उस पार्टी में रहे, जिससे उनके समझौते की अटकलें है। वैसे मायावती ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह सपा से समझौता करेंगी।
    वैसे यह सब भविष्य की अटकलें है। फिलहाल यह कहा जा सकता है कि सावित्री बाई ने बिल्कुल घिसे पिटे मुद्दे उठाए है। बसपा ने कई दशक पहले जो मुद्दे उठाकर छोड़ दिये थे, सावित्री उन्हीं खंडहरों पर खड़ी है।
    उनके मुद्दों में न कोई दम है, न वह सच पर आधारित है।
     उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा देश को मनुस्मृति से चलाना चाहती है। इस प्रकार की बातें बेमानी है। भाजपा देश के सबसे बड़ी पार्टी है। सर्वाधिक राज्यों में उंसकी सरकार है। संविधान में उंसकी पूरी आस्था है। इसी प्रकार भाजपा को दलित, पिछड़ा व मुस्लिम विरोधी विरोधी और आरक्षण खत्म करने की साजिश करने वाला बताना लोगों को धोखा देने जैसा है।
    सावित्री बाई ने भाजपा पर देश के संविधान को बदलने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि न तो संविधान लागू किया जा रहा है और न ही आरक्षण। केंद्र सरकार ने मेरी मांगों को ठुकराया है। क्योंकि सरकार दलित विरोधी है। मंदिरों पर उनकी टिप्पणी भी करोड़ो लोगों को आहत करने वाली है। जो सांसद के रूप में अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर सकी, वह आज विकास की बात कर रहीं है। भाजपा ने मुद्रा बैंक योजना के तहत दलितों का पर्याप्त ध्यान दिया। उन्हें रोजगार देने वाला बनाने का प्रयास यह सरकार कर रही है। प्रत्येक कल्याणकारी योजनाओं में दलितों की पर्याप्त हिस्सेदारी सुनिश्चित की गई है।
    सावित्री बाई को समझना चाहिए कि हनुमान जी को हिन्दू चिंतन में महान देव माना जाता है। उनकी साधना सबसे सहज सुलभ मानी जाती है। उनपर टिप्पणी करके सावित्री ने अपनी घृणित मानसिकता उजागर की है। भाजपा में इतने वर्ष रहते हुए वह ऐसी नहीं थी। लेकिन राजनीतिक स्वार्थ ने उन्हें यहां तक पहुचा दिया है।

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