कांग्रेस को सुप्रीम कोर्ट नहीं खड़गे पर है विश्वास

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
तथ्यों के अभाव में शुरू हुआ कांग्रेस का राफेल प्रलाप अब हास्यस्पद मुकाम पर पहुँच चुका है। कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट के संबंधित निर्णय के प्रति अविश्वास व्यक्त कर रही है। उसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने गलतफहमी में निर्णय दे दिया। कांग्रेस का यह कथन भी निराधार है। फिर भी कुछ पल के लिए इसे सही मान लें, तब भी कांग्रेस की मुहिम को हास्यस्पद ही कहा जायेगा। क्या यह अपने में हास्यस्पद नहीं कि सुप्रीम कोर्ट ने सतही जानकारी पर निर्णय देकर गलत किया। अब  यूपीए सरकार में मंत्री रहे मल्लिकार्जुन खड़गे न्याय करंगे। कांग्रेस नेता के न्याय पर किसे भरोसा हो सकता है। यह सोचना ही किसी माखौल से कम नहीं है।
कांग्रेस केवल यह चाहती है कि यह मामला लोकसभा चुनाव तक खींचता रहे। इसके अलावा उसका कोई उद्देश्य नहीं है। तीन राज्यों में मिली जीत से कांग्रेस के दिमाग आसमान पर है। खड़गे संसद की अति महत्वपूर्ण लोक लेखा समिति के चेयरमैन है। वह  जानते है कि इसके निर्णय बहुमत से होते है। ऐसे में सरकार के विरोध का कोई प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता। मनमोहन सिंह के  सरकार के समय लोकलेखा समिति प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच गई थी।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की बेंच ने केंद्र से निर्णय लेने की प्रक्रिया से संबंधित विस्तृत जानकारी मांगी थी। बेंच ने सरकार से तकनीकी जानकारी और राफेल कीमतों के बिना रिपोर्ट मांगी थी। कोर्ट ने कहा था कि राफेल की तकनीकी और इस सौदे से जुड़े फैसले की सभी जानकारी सरकार को कोर्ट को सौंपनी होंगी। केंद्र सरकार ने इस खरीद सौदे की निर्णय प्रक्रिया का पूरा विवरण सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया था। केंद्र ने तीन सीलबंद लिफाफे में डील की जानकारी सुप्रीम कोर्ट को सौंपी थी।
 कांग्रेस को आपत्ति है कि सरकार ने राफेल पर कैग की रिपोर्ट संबन्धी गलत जानकारी दी। एक शब्द के अंतर से सुप्रीम कोर्ट को यह लगा कि रिपोर्ट संसद की लोक लेखा समिति को मिल गई है। बात सही है, सरकार ने इस संबन्ध में सुप्रीम कोर्ट को वस्तुस्थिति से अवगत करा दिया है।
यहां दो तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए। पहला यह कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इस बात पर आधारित नहीं था कि रिपोर्ट लोक लेखा समिति को मिली है या नहीं। मिल भी जाती ,तब भी सुप्रीम कोर्ट का निर्णय यही रहता। क्योंकि उसने जो कागज सरकार से मांगे थे, वह भेजे गए, उन्हीं का गहन विचार करके विद्वान न्यायधीशों ने तथ्यपरक निर्णय दिया।
दूसरी बात यह कि जिस पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रधानमंत्री के लिए अपशब्दों का प्रयोग करता घूम रहा हो, उस पार्टी के नेता मल्लीकार्जुन खड़गे से क्या उम्मीद की जा सकती है।
ऐसे में लगता नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के लिए यह मसला महत्वपूर्ण रहा होगा। लोक लेखा समिति के प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि  वह  सदस्यों से आग्रह करेंगे कि अटॉर्नी जनरल और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक को बुलाकर पूछा जाए।  लेकिन यह जांच एजेंसी नहीं है। सिर्फ जेपीसी राफेल सौदे की जांच कर सकती है। खड़गे ने आरोप लगाया कि सरकार ने कोर्ट के समक्ष कैग रिपोर्ट तौर पर गलत जानकारी रखी। जिसके कारण  इस तरह का निर्णय आया है। अटॉर्नी जनरल ने इस तरह से पक्ष रखा कि न्यायालय को यह महसूस हुआ कि कैग रिपोर्ट संसद में पेश हो गई है और पीएसी ने रिपोर्ट ने देख ली है।
जबकि संसद की लोक लेखा समिति के ज्यादातर सदस्य एजी और सीएजी को तलब किए जाने के खिलाफ है।  बाईस  सदस्यों वाली समिति में एनडीए के बारह हैं।  टीडीपी और बीजेडी के सदस्य भी खड़गे से असहमत है।
राफेल सौदे में अटर्नी जनरल  और कॉम्पट्रोलर ऐंड ऑडिटर जनरल को लोक लेखा समिति समन नहीं कर सकती है।  क्योंकि विपक्षी दलों सहित अधिकतर सदस्य समिति के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के प्रस्ताव के पक्ष में नहीं हैं। बीजेडी सांसद भतृहरि महताब ने कहा कि खड़गे व्यक्तिगत रूप से  बुला सकते हैं लेकिन पूरी समिति के समक्ष उन्हें तलब नहीं कर सकती। भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने  मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान को गलत बताया है।
उन्होंने कहा कि पीएसी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना है कि उन्हें कैग रिपोर्ट नहीं मिली है तो हमें उनकी बात को सोचना चाहिए। उन्हें अदालत में हलफनाया या पुनर्विचार याचिका दायर करनी चाहिए। कहना चाहिए कि उन्हें रिपोर्ट नहीं मिली और समिति ने उसकी जांच-परख नहीं की। खड़गे ने कहा था कि वह पीएसी के सदस्यों से आग्रह करेंगे कि अटॉर्नी जनरल और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक  को बुलाकर पूछा जाए कि राफेल मामले में कैग की रिपोर्ट कब और कहां आई है। खड़गे ने आरोप लगाया कि सरकार ने न्यायालय के समक्ष कैग रिपोर्ट तौर पर गलत जानकारी रखी जिस वजह से इस तरह का निर्णय आया है।
लोकसभा में कांग्रेस के नेता ने संवाददाताओं से कहा, राफेल के बारे में न्यायालय के सामने सरकार को जिन चीजों को ठीक ढंग से रखना चाहिए था, वो नहीं रखा। अटॉर्नी जनरल ने इस तरह से पक्ष रखा कि न्यायालय को यह महसूस हुआ कि कैग रिपोर्ट संसद में पेश हो गई है और पीएसी ने रिपोर्ट ने देख ली है। खड़गे का यह सोचना ही गलत है। न्यायिक निर्णय इस बात से प्रभावित नहीं होता कि रिपोर्ट कहा पेश की गई। कोर्ट प्रमाणों ,तथ्यों को देखता है। राफेल मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने यही किया।
कल्पना करिए कि मल्लीकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता वाली समिति कैग रिपोर्ट देख भी लेती तो क्या हो जाता। क्या उसमें खड़गे के विचार निष्पक्ष और न्याय पर आधारित होते, क्या सुप्रीम कोर्ट उनके राजनीतिक विचारों को अपने निर्णय का आधार बनाता, क्या खड़गे अपने नेता राहुल गांधी के विचारों के विरोध में बोलते, ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला था।
 यह ठीक है वित्त मंत्री अरुण जेटली और रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने संयुक्त संसदीय समिति  गठित करने की मांग को खारिज कर दिया। उनके अनुसार न्यायालय का निर्णय अंतिम है। उसके बाद कैग की राय का कोई मतलब नहीं रह है। कांग्रेस झूठ फैलाने के अपने पहले प्रयास में विफल रही और अब न्यायालय के निर्णय पर नए झूठ गढ़ रही है। कांग्रेस चाहती है कि राफेल मामले की जांच के लिए जेपीसी बनायी जाए। जिससे भाजपा और यूपीए  यूपीए सरकार द्वारा निर्धारित मूल्यों की तुलना हो सके।
लेकिन राफेल पर यूपीए और भाजपा की तुलना संभव ही नहीं है। यूपीए आठ वर्ष में एक भी विमान नहीं ला सकी। सेना उंसकी जरूरत बताती रही। ऐसे में यूपीए के दाम का कोई मतलब ही नहीं है। भाजपा ने सौदा पक्का किया, वायु सेना ने उसकी सराहना की , इसलिए यूपीए से तुलना की बात बेमानी है।
कांग्रेस का कहना है कि जेपीसी की जांच से यह भी साफ होगा कि लड़ाकू विमान विनिर्माण का अनुभव नहीं रखने वाले अनिल अंबानी समूह को इस सौदे में राफेल की विनिर्माता फ्रांसीसी कंपनी के आफसेट भागीदार के लिए कैसे चुना गया है। इस आरोप की सफाई अनिल अंबानी दे चुके है। उसका जबाब कांग्रेस ने नहीं दिया।
अरुण जेटली ने भी कांग्रेस की झूठ बोलने के निंदा की है। उन्होंने  कहा कि रक्षा सौदे आडिट के लिए कैग के पास जाते हैं और जो अपनी रिपोर्ट लोकलेखा समिति के लिए भेजता है। इस बात को सरकार ने पर्याप्त तथ्यों के साथ सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखा था। राफेल की आडिट जांच कैग के समक्ष लंबित है। उसके साथ सभी तथ्य साझा किए गए हैं। जब कैग की रिपोर्ट आएगी तो उसे लोकलेखा समिति को भेजा जाएगा। यदि अदालत के आदेश में किसी तरह की कमी है, तो कोई भी न्यायालय के समक्ष उसे ठीक करवाने के लिए अपील कर सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने कॉंग्रेस को उसके घोटाले याद दिलाये है।
यही कारण है कि उसे हर सौदे में घोटाले दिखते है। उन्नीस सौ चालीस  और पचास के दशक में जीप घोटाले से लेकर अस्सी  के दशक के बोफोर्स तक, अगस्ता-वेस्टलैंड और पनडुब्बी घोटाले समेत अन्य घपले कांग्रेस के शासनकाल में ही हुए। अब मामा और अंकल चर्चा में है। मामा मतलब इटली के दलाल क्वात्रोची, और अंकल मतलब अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले के मुख्य आरोपी क्रिश्चियन मिशेल। कांग्रेस नेताओं की नजर रक्षा क्षेत्र से पैसा बनाने में रही है, भले ही इससे सुरक्षा बलों का मनोबल कम होता रहे। हमें अपने सुरक्षा बलों पर गर्व है। जाहिर है कि जब  सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित विषय पर गंभीरता से विचार करके निर्णय दिया हो , तब कांग्रेस द्वारा मल्लीकार्जुन खड़गे को जांच के लिए आगे करने की आवश्यकता नहीं है। न्यायपालिका का निर्णय पूर्वाग्रह से मुक्त है, खड़गे पूर्वाग्रह में डूबे है। उनको केवल राजनीति करनी है।

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